योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें११२ ❇ योगवाशिष्ठ ❇
मत्ता हुई, जिसमे प्रकाशमत्ता प्रकट हुई । आकाश से नेत्रमत्ता प्रकट हुई । फिर जलमत्ता हुई, जिसमे स्वादरूप—रसमत्ता हुई । उसमे जिह्वा प्रकट हुई । फिर गन्धमत्ता मे भूमि, भूमि मे घ्राणमत्ता और उसमे पिण्डमत्ता प्रकट हुई । फिर देशमत्ता, कालमत्ता और सर्वगत्ता हुई, जिनको इकट्ठा करके अहम्मत्ता प्रकट हुई । जैसे बीज, पत्र, फूल, फल आदिक का आश्रय होता है, वैसे ही पुर्यष्टका को जानो । यही अन्तर्वाहक देह है । इन सबका आशय ब्रह्ममत्ता है । वास्तव में कुछ उपजा नहीं, केवल परमात्ममत्ता अपने आप में स्थित है । जैसे तरङ्गादि में जल स्थित है, वैसे ही आत्ममत्ता अपने आप में स्थित है ।
हे मुनीश्वर ! संवित् में जो संवेदन पृथक्रूप होकर स्फुरित और उसे निःस्पन्दन करके जब स्वरूप को जाने, तब वह नष्ट हो जाता है । जैसे संकल्प का रचा नगर संकल्प के अभाव में अभाव हो जाता है, वैसे ही आत्मा के ज्ञान में संवेदन का अभाव हो जाता है । हे मुनीश्वर ! संवेदन तब तक भासित होता है, जब तक उसको जाना नहीं, जब जान लिया, तब संवेदन का अभाव हो जाता है और वह संवित् में लीन हो जाता है, भिन्न सत्ता इसकी नहीं रहती । हे मुनीश्वर ! जो प्रथम अणु तन्मात्र था, वह भावना-वश स्थूल देह को प्राप्त हुई और स्थूल देह होकर भासित होने लगा । आगे जैसे-जैसे देश-काल-पदार्थ की भावना होती गई, वैसे-वैसे भासित होने लगा । जैसे स्वप्न में गन्धर्वनगर और स्वप्नपुर देख पड़ता है, वैसे ही भावना के कारण ये पदार्थ भासित होने लगे हैं । मैंने पूछा, हे भगवन् ! गन्धर्वनगर और स्वप्नपुर के समान इसको कैसे कहते हो ? यह जगत तो प्रत्यक्ष देख पड़ता है ?
ईश्वर बोले, हे मुनीश्वर ! संसार का दुःख वासना-वश दीखता है । अविद्यमान में स्वरूप के प्रमाद से विद्यमान बुद्धि हुई है । जगत् के पदार्थों को सत् मानकर जो वासना जागती है, उसमें दुःख होता है । हे मुनीश्वर ! यह जगत् अविद्यमान है । जैसे मृगतृष्णा का जल असत्य होता है, वैसे ही यह जगत् असत्य है । उसमें वासना, बाधक