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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 923, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 923

❋ निर्वाण प्रकरण ❋ १२३

और वास्य तीनों मिथ्या हैं। जैसे मृगतृष्णा का जल पान करके कोई तृप्त नहीं होता, क्योंकि जल ही असत् है, वैसे ही यह जगत् स्वयं ही असत् है, अतः इसके पदार्थों की वासना करना वृथा है। ब्रह्मा से तृणपर्यन्त सब जगत् मिथ्या है। वासना, वासक और वास्य पदार्थों का अभाव होने पर केवल आत्मतत्त्व रहता है और सब भ्रम शान्त हो जाता है।

हे मुनीश्वर ! यह जगत् भ्रममात्र है—वास्तव में कुछ नहीं। जैसे बालक को अज्ञान से अपनी परछाईं में वेताल देख पड़ता है और जब विचार करके देखे तब वेताल का अभाव हो जाता है, वैसे ही अज्ञान से यह जगत् भासित होता है और आत्मविचार से इसका अभाव हो जाता है। जैसे मृगतृष्णा की नदी और आकाश में नीलता और दूसरा चन्द्रमा भासित होता है, वैसे ही आत्मा में अज्ञान से देह भासित होती है। जिसकी बुद्धि देहादिक में स्थिर है, वह हमारे उपदेश के योग्य नहीं है। जो विचारवान् है, उसको उपदेश करना उचित है। जो मूर्ख भ्रांत असत्वादी और सत्कर्म से रहित अनार्य है, उसको ज्ञानवान् कभी उपदेश न करे। जिनमें विचार, वैराग्य, कोमलता और शुभ आचार हों, उनको उपदेश करना चाहिए। जो इन गुणों से रहित हों उनको उपदेश करना ऐसे होता है, जैसे कोई महासुन्दर और सुवर्ण सदृश कान्तिवाली कन्या को नपुंसकपुरुष के साथ ब्याह देने की इच्छा करे।

इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे जगन्मिथ्यात्वप्रतिपादनं नाम चत्वारिंशत्तमस्सर्गः ॥ ४० ॥

वशिष्ठजी बोले, हे भगवन् ! वह जीव, जो आदि में उत्पन्न हुआ और अपने साथ देहभ्रम देखने लगा, उसके अनन्तर वह कैसे स्थित हुआ ? ईश्वर बोले, हे मुनीश्वर ! उस जीव ने स्वप्न की तरह सर्वगत चिद्घन आत्मा के आश्रय से उपजकर अपने शरीर को देखा। हे मुनीश्वर ! जो आदि जीव प्रकट होकर प्रमाद को नहीं प्राप्त हुआ और अपने स्वरूप ही में अहंप्रत्यय रहा, वह इस कारण ईश्वर होकर स्थित हुआ।