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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 924, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 924

११४ ✻ योगवाशिष्ठ ✻

उसका यह निश्चय रहा कि मैं सनातन, नित्य, शुद्ध, परमानन्द और अनन्तकला परमपुरुष हूँ। आत्मा की अपेक्षा से उसको जीव कहा है और सृष्टि जगत् की अपेक्षा करके उसको ईश्वर कहा। हे मुनीश्वर! वह जो आदि जीव है सो कर्त्ता विष्णुरूप होकर ब्रह्मा को नाभिकमल से उत्पन्न करता है। वह किसी सृष्टि में प्रथम ब्रह्मा हुआ है और विष्णु और रुद्र उससे उत्पन्न हुए हैं। किसी सृष्टि में वह प्रथम रुद्र हुआ, उससे विष्णु और ब्रह्मा हुए। चैतन्य आकाश में जैसा-जैसा संकल्प प्रकट हुआ है, वैसा ही वैसा होकर वह स्थित हुआ है। आदि जीव ने उपजकर जिस-जिस प्रकार का संकल्प किया, वैसा-वैसा होकर स्थित हुआ। वास्तव में सब असतरूप है और अज्ञानरूप भ्रम से भासित हुआ है। जैसे पाषाण में वेताल होता है, वैसे ही अज्ञान से यह सद्रूप भासित होता है। आदि-पुरुष से लेकर सारी सृष्टि परमाकाश के एक निमेष में हुई है और उन्मेष में लय भी हो जाती है। एक निमेष के प्रमाद से कल्प के समूह व्यतीत हो जाते हैं और परमाणु परमाणु में सृष्टियाँ प्रकट होती हैं। उनमें कल्प और महाकल्प भासित होते हैं। कुछ सृष्टियाँ परस्पर दिखती हैं और कुछ अन्योन्य अदृश्यरूप हैं। इसी प्रकार सृष्टियाँ उसकी स्पन्दनकला में उपजी हैं और चमत्कार हुआ है। जब स्पन्दनकला स्वरूप की ओर आती है, तब उसमें लीन हो जाती है। जैसे स्वप्न का देखा पर्वत जागने पर लीन हो जाता है, वैसे ही जाग्रत की सृष्टि लीन हो जाती है।

हे मुनीश्वर! जीव-जीव प्रति अपनी-अपनी सृष्टियाँ हैं। उन सृष्टियों को कोई देश या काल रोक नहीं सकता; क्योंकि वे अपने-अपने संकल्प में स्थित हैं और यह सब आत्मा का चमत्कार है। जैसा स्फुरण स्फुरित होता है, वैसा चमत्कार भासित होता है। हे मुनीश्वर! न कुछ उपजा है, न कुछ नष्ट होता है; स्वतः चैतन्यतत्त्व अपने आपमें चमकता है। जैसे स्वप्ननगर उपजकर नष्ट हो जाता है और संकल्प का पहाड़ उपजकर मिट जाता है, वैसे ही जगत् उपजकर नष्ट हो जाता है। जैसे स्वप्न और संकल्प के पहाड़ को कोई रोक नहीं सकता, वैसे ही अपनी-