योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें❇ निर्वाण प्रकरण ❇ ११५
अपनी सृष्टि को देश या काल रोक नहीं सकता। क्योंकि और जगह इनका सद्भाव नहीं है, इससे यह जगत् अपने-अपने काल में सन्रूप है। आत्मा में सद्भाव नहीं, वह संकल्परूप है। हे मुनीश्वर ! जैसे आदि तत्त्व से जीव ईश्वर निकले हैं, वैसे ही कर्म भी रुद्र से लेकर वृक्ष तक सब एक क्षण में उर्मी तत्त्व मे निकल आये हैं। सुमेरु आदि भी अपनी स्थिति में अपने को रोकते हैं, अन्य अणु को भी नहीं रोक सकते; क्योंकि वहाँ अस्तित्व है ही नहीं। इस कारण आत्मा में सृष्टि आभास-रूप है। हे मुनीश्वर ! इस प्रकार सब जगत् मायामात्र है और भावना से भासित होता है। जब आत्मा का अभ्यास होता है, तब भेदकल्पना मिट जाती है और केवल उपशमरूप शिवतत्त्व भासित होता है।
हे मुनीश्वर ! निमेष का जो शत भाग है उसका अर्द्धभाग प्रमाद होने मे नाना प्रकार का जगत् प्रकट भासित होता है। सत्-अमतरूप जगत् मनरूपी विश्वकर्मा बनाता है। आत्मतत्त्व न दूर है, न निकट है, न नीचे है, न ऊपर है, न पूर्व में है और न पश्चिम में है। सत्-असत् के मध्य वह अनुभवरूप सर्वज्ञ है। उसको प्रत्यक्ष आदिक प्रमाण अपना विषय नहीं बना सकते—जैसे जल मे अग्नि नहीं निकलती। हे मुनीश्वर ! जो कुछ तुमने पूछा था सो मैंने कहा। उसमें चित्त लगाने मे तुम्हारा कल्याण न होगा। इतना कह सदाशिव बोले कि अब हम अपने वाञ्छित स्थान को जाते हैं। चलो पार्वती, अपने स्थान को चलें।
इतना कहकर वशिष्ठजी बोले, हे राम ! जब इस प्रकार ईश्वर ने कहा, तब मैंने अर्ध्य-पाद्य से पूजन किया और ईश्वर भी पार्वती और गणों को लेकर आकाशमार्ग को चले। जब तक मुझको देख पड़ते रहे, तब तक मैं उनकी ओर देखता रहा। फिर अपने स्थान में कुशासन पर आकर बैठा और जो कुछ ईश्वर ने उपदेश किया था, वह मैं अपने मन में विचारने लगा।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे परमार्थविचारो नामैकचत्वारिंशत्तमस्सर्गः ॥ ४१ ॥