योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
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वशिष्ठजी बोले, हे राम! जो कुछ ईश्वर ने मुझसे कहा सो में आप भी जानता था और तुम भी जानते हो। यह जगत् भी असत् है और देखनेवाला भी असत् है। इस मायारूप जगत् में में तुमसे सत क्या कहूँ और असत् क्या कहूँ? जैसे जल में द्रवता है, वैसे ही आत्मा में जगत् है। जैसे पवन में स्पन्दन और आकाश में शून्यता है, वैसे ही आत्मा में जगत् है। हे राम! जो कुछ पतित प्रवाह से प्राप्त होता है, उर्मी में से देवअर्चन करना है। इस क्रम से मैं निर्यामानिक हूँ और जगत् की क्रिया से में दुःख-हीन होकर चेष्टा करता हूँ। व्यवहार करता देख पड़ता हूँ, तो भी शान्तरूप हूँ और यथाप्राप्त आचाररूपी फूल से आत्म-देव की अर्चना करता हूँ, मुझको खेद-भेद कोई नहीं होता। हे राम! विषयों और इन्द्रियों का सम्बन्ध सब जीवों को बराबर है, पर जो ज्ञान-वान् हैं, वे सावधान रहते हैं और जो कुछ देखते, सुनते, बोलते, खाते, सूँघते और स्पर्श करते हैं, उसमें आत्मतत्त्व का अर्चन करते हैं और अपने को आत्मा से भिन्न नहीं जानते। अज्ञानियों को कर्तृत्व-भोक्तृत्व का अभिमान होता है और उससे वे दुःखी होते हैं।
हे राम! तुम भी ऐसी दृष्टि का आश्रय लेकर संसाररूपी वन में निःसंग होकर विचरो तो तुमको कुछ खेद न होगा। जिसकी वृत्ति इस प्रकार समान हो गई है, उसको चाहे बड़ा कष्ट प्राप्त हो, चाहे धन और बान्धवों का वियोग हो, तो भी उसको खेद नहीं होता। यह जो दृष्टि मैंने तुमसे कही है, उसका जब आश्रय ग्रहण करोगे, तब तुमको कोई दुःख न होगा। हे राम! सुख, दुःख, धन और बान्धवों का वियोग, ये सब पदार्थ अनित्य हैं। ये आते भी हैं और जाते भी हैं। इनको 'आगमापायी' जानकर विचरो। यह संसार विषमरूप है, एकरस कभी नहीं रहता। इसको स्थिर या सत् जानकर दुःखी न होना। हे राम! पदार्थ और काल जैसे जाय तैसे जाय और जैसे सुख-दुःख आवें तैसे आवें ये सब आगमापायी पदार्थ हैं, अर्थात् आते भी हैं और जाते भी हैं। इष्ट की प्राप्ति और अनिष्ट की निवृत्ति में हर्षित न होना अनिष्ट की प्राप्ति और इष्ट के वियोग में खिन्न न होना। जैसे जो आपे-