योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 927, कुल 1734 में से
संदर्भ में पढ़ें॥ निर्वाण प्रकरण ॥
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उसे निर्लिप्त रहकर भोग करो। जिसका आना है वह आवेगा और जिसको जाना है वह जावेगा। ये सुख-दुख प्रवाहरूप हैं। इनमें आस्था करके संतप्त न होना। हे राम! यह सब जगत् तुम्हीं हो और तुम्हीं जगतरूप हो। चिन्मात्र विस्तृत आकार भी तुम्हीं हो। जब सब तुम्हीं हो, तब हर्ष या शोक किस लिए करते हो? इसी दृष्टि का आश्रय करके जगत् में सुषुप्त होकर विचरो तो तुर्यातीत अवस्था को प्राप्त होगे, जो सब प्रकाशरूप है। हे राम! जो कुछ मुझे तुमसे कहना था सो कहा है, आगे जो तुम्हारी इच्छा हो सो करो। पीछे तुमने पूछा था कि अनन्तरूप ब्रह्म में कलङ्क कैसे प्राप्त हुआ है? सो अब फिर प्रश्न करो कि मैं उत्तर दूँ।
रामजी ने कहा, हे ब्रह्मन्! अब मुझको कुछ संशय नहीं रहा; मेरे सब संशय नष्ट हो गये हैं और जो कुछ जानना था सो मैंने जान लिया। अब मैं परम अकृत्रिम तृप्ति को प्राप्त हुआ हूँ। हे मुनीश्वर! आत्मा में न मेल है, न द्वैत है और न एक दो आदि की कोई कल्पना है। पहिले मुझमें अज्ञान था तब मैंने पूछा था; अब तुम्हारे वचनों से मेरा अज्ञान नष्ट हो गया है, इसमें कुछ दोष नहीं भासित होता। आत्मा को न जन्म है, न मरण है। सब ब्रह्म ही है। हे मुनीश्वर! प्रश्न संशय से उपजता है, सो मेरा संशय नष्ट हो गया है। जैसे यन्त्री की कठपुतली न हिलाने से अचल होती है, वैसे ही संशय से रहित मेरा मन स्थिर निश्चल हो गया है। सब मार्गों का सार मुझको प्राप्त हुआ है। जैसे सुमेरु अचल है, वैसे ही मैं अचल हूँ। मुझको कोई क्षोभ नहीं। ऐसा कोई पदार्थ नहीं, जो मेरे लिए त्यागने योग्य हो और ऐसा भी कोई पदार्थ नहीं, जो ग्रहण करने योग्य हो। किसी पदार्थ की मुझको न इच्छा है, न अनिच्छा। मैं शान्तरूप स्थित हूँ। न स्वर्ग की मुझको इच्छा है, न नरक से द्वेष है। सब ब्रह्मरूप मुझको भासित होता है। मन्दराचल पर्वत की तरह मैं आत्मतत्त्व में स्थित हूँ।
हे मुनीश्वर! जिसको अवस्तु में वस्तु-बुद्धि होती है और हृदय में कल्पना स्थित होती है, वह किसी को ग्रहण करता है; किसी का