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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 928, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 928

११८ ॐ योगवाशिष्ट ॐ

त्याग करता है और दीनता को प्राप्त होता है । हे मुनीश्वर ! यह संसार महासमुद्ररूप है । उसमें राग द्वेषरूपी लहरें हैं और शुभ-अशुभ-रूपी मच्छ रहते हैं । ऐसे भयानक संसारसमुद्र में अब मैं आपके प्रसाद से तर गया हूँ और परम-परम सम्पदा को प्राप्त होकर मेरे दुःख नष्ट हो गये हैं । सबके सार को प्राप्त होकर में पूर्ण आत्मा हूँ । अदीन पद और परम शान्त अभेदसत्ता मुझे मिल गई है । आशारूपी हाथी को मैंने सिंह बनकर मारा है । अब मुझको आत्मा से भिन्न कुछ नहीं देख पड़ता । मेरे सब विकल्प-जाल कट गये हैं, इच्छादिक विकार नष्ट हो गये हैं और दीनता जाती रही है । तीनों जगत में मेरी जय है और में सदा उदितरूप हूँ ।

इति श्रीयोगवाशिष्टे निर्वाणप्रकरणे विश्रान्ति आगमनं नाम द्विचत्वारिंशत्तमस्सर्गः ॥ ४२ ॥

वशिष्ठजी बोले, हे राम ! जो केवल देह और इन्द्रियों से करता है और मन से नहीं करता, वह जो कुछ करता है सो कुछ नहीं करता । जो कुछ इन्द्रियों से दृष्ट मान होता है, उससे अणुमात्र सुख प्राप्त होता है । उस अणुमात्र की प्रसन्नता में जो बँध जाता है, वह बालबुद्धि मूर्ख है । जो ज्ञानवान् है, वह उसमें कभी नहीं बँधता । हे राम ! वाञ्छा ही इसको दुःखी करती है । सुन्दर विषयों की वाञ्छा होने पर जब जीव यत्न से उनको प्राप्त करता है, तब क्षणभर सुख होता है और जब उनका वियोग होता है, तब दुःखी होता है । इस कारण इन विषयों की वाञ्छा त्यागना ही उचित है । इनकी वाञ्छा तब होती है, जब स्वरूप का ज्ञान नहीं होता और देहादिक में अहंभाव होता है । जब देहादिक में अहंभाव होता है, तब अनेक अनर्थ उपस्थित होते हैं । इससे हे राम ! ज्ञानरूपी पर्वत पर चढ़ रहना और अहंतारूपी गढ़े में न गिरना । हे राम ! आत्मज्ञानरूपी सुमेरु पर्वत पर चढ़कर फिर अहंता ( अभिमान ) के गढ़े में गिरना बड़ी मूर्खता है । जब दृश्यभाव को त्यागोगे, तब अपनी स्वभावसत्ता को प्राप्त होगे । यह राम और