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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 929, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 929
# * निर्वाण प्रकरण *

**११६**

शान्तरूप है और उससे विकल्पजाल सब मिट जायगा । तब समुद्र की तरह पूर्ण होगे और द्वैतरूप न प्रतीत होगा ।

हे राम ! जब हृदय में विषय को विष जाने, तब मन भी नीरस हो जाता है और चित्त निम्मग्न होता है । वास्तव में देखो तो सबमें सत्ता ब्रह्म चिद्धन समानरूप से स्थित है, पर अद्वैतस्वरूप के प्रमाद से वह नहीं भासित होता । हे राम ! आत्मा का अज्ञान ही बन्धन और आत्मा का बोध ही मुक्ति है । इससे बलपूर्वक मोह-निद्रा को छोड़ आप ही जागो, तब इस बन्धन से मुक्त होगे । हे राम ! जिसमें विषय का स्वाद नहीं और जिसमें आत्म तत्त्व का अनुभव होता है, वह आकाश-सदृश निर्मल सत्ता वासना से रहित है । वासना से रहित होकर जो पुरुष कर्म करता है, वह विकार को नहीं प्राप्त होता । यदि अनेक क्षोभ आकर प्राप्त हों तो भी उसको विकार नहीं होता । ज्ञाता, ज्ञान, ज्ञेय, ये तीनों आत्मरूप भासित होते हैं । जब ऐसा ज्ञान होता है, तब किसी का भय नहीं रहता । चित्त के चेतन से जगत् उत्पन्न होता है और चित्त के मिटने पर लीन हो जाता है । जब वासना-सहित प्राण उदय होते हैं, तब जगत् का उदय होता है और जब वासना-सहित प्राण लीन होते हैं, तब जगत् भी लीन हो जाता है । अभ्यास करके वासना और प्राणों को स्थित करो । जब मूर्खता उदय होती है तब कर्म उदय होते हैं और मूर्खता के लीन होने पर कर्म भी लीन होते हैं । इससे मत्संग और मनशास्त्रों के विचार से मूर्खता को नष्ट करो । जैसे वायु के संग में उड़कर धूल बादल का आकार धारण करती है, वैसे ही चित्त के चेतन से जगत् स्थित होता है । हे राम ! जब चित्त-जगता है, तब नाना प्रकार का जगत् प्रकट होता है, और चित्त के न जगने पर जगत् लीन हो जाता है ।

हे राम ! वासना शान्त हो अथवा प्राणों का निरोध हो, तब चित्त अचित्त हो जाता है और जब चित्त अचित्त हुआ तब जीव परमपद को प्राप्त होता है । हे राम ! दृश्य और दर्शन सम्बन्ध के बीच में जो परमात्मसुख और एकान्तसुख है, वह संवित् ब्रह्मरूप है । उसका