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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 930, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 930

१२० | ॐ योगवाशिष्ठ ॐ

साक्षात्कार होने पर मन का क्षय हो जाता है। जहाँ चित्त नहीं उपजता, वह जो चित्त से रहित अकृत्रिम सुख है। ऐसा सुख स्वर्ग में भी नहीं होता जैसे मरुस्थल में वृक्ष नहीं होते, वैसे ही चित्त-सहित विषयों में सुख नहीं होता। चित्त के उपशम में जो सुख है, वह वाणी से कहा नहीं जा सकता। उसके समान या उससे बढ़कर कोई भी सुख नहीं है। सुख का नाश हो जाता है, पर आत्मसुख का नाश नहीं होता। वह अविनाशी है और उत्पत्ति-विनाश से रहित है। हे राम! अबोध से चित्त का उदय होता है और आत्मबोध में वह शान्त हो जाता है। जैसे मोह से बालक को वेताल दिखाई देता है और मोह के नष्ट होने पर नष्ट हो जाता है, वैसे ही अज्ञान में चित्त का उदय होता है और अज्ञान के नष्ट होने पर वह नष्ट हो जाता है। यदि चित्त विद्यमान भी भासित होता है, तो भी बोध में वह निर्बीज हो जाता है। जैसे पारस से मिल-कर ताँबा सुवर्ण हो जाता है तो उसका आकार तो वही देख पड़ता है, पर ताँबे के भाव का अभाव हो जाता है, वैसे ही अज्ञान से जगत् भासित होता है और ज्ञान में चित्त अचित्त हो जाता है; जड़जगत् नहीं भासित होता, ब्रह्मसत्ता ही भासित होती है और वह सत्पद को प्राप्त होता है, परन्तु नामरूप वैसे ही भासित होते हैं। हे राम! ज्ञानी का चित्त भी कर्म करता देख पड़ता है, परन्तु चित्त अचित्त हो जाता है। जो अज्ञान में भासित होता है, वह ज्ञान में शून्य हो जाता है। जो जगत् अबोध में भासित था, वह बोध में शान्त हो जाता है, फिर नहीं उपजता। वह चित्त शान्तपद को प्राप्त होता है। कुछ समय तक तो वह भी तुरीयावस्था में स्थित विचरता है, पर फिर तुरीयातीतपद को प्राप्त होता है। अधः, ऊर्ध्व, मध्य, सर्वत्र ब्रह्म ही इस प्रकार अनेक होकर स्थित हुआ है। अनेक सम होने पर भी एक ही है और सर्वात्मा ही है—चित्तादिक कुछ नहीं।

इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे चित्तसत्तासूत्रणन्नाम त्रिचत्वारिंशत्तमस्सर्गः ॥ ४३ ॥

वशिष्ठजी बोले, हे राम! अब तुम संक्षेप में एक अपूर्व और