योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 931, कुल 1734 में से
संदर्भ में पढ़ें* निर्वाण प्रकरण * १२१
आश्चर्यरूप बोध देनेवाला दृष्टान्त सुनो। एक बेलफल है, जिसका विस्तार अनन्त योजन पर्यन्त है। जिमे अनन्त युग व्यतीत हो गये हैं। पर वह जर्जर कभी नहीं होता। वह अनादि है, उसमें अविनाशी रस है, इसमें कभी नाश नहीं होता। वह चन्द्रमा की तरह सुन्दर है। सुमेरु आदिक जो बड़े पहाड़ हैं उनको महाप्रलय का पवन तृण की तरह उड़ाता है; पर वह पवन भी उसको नहीं हिला सकता। हे राम! योजनों की अनन्त कोटि संख्या है, पर उसकी संख्या नहीं की जा सकती। वह बेलफल ऐसा और बहुत बड़ा है। जैसे सुमेरु के आगे राई का दाना सूक्ष्म और तुच्छ लगता है, वैसे ही उस बेलफल के आगे ब्रह्माण्ड सूक्ष्म और तुच्छ लगता है। वह बेल रस से पूर्ण है, कभी गिरता नहीं और पुरातन है। ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र, इन्द्रादिक भी उसका आदि, अन्त और मध्य नहीं जान सकते। न उसके मूल को कोई जान सकता है, न मध्य को कोई जान सकता है। उसका अदृष्ट आकार है और अदृष्ट फल है। वह अपने प्रकाश से प्रकाशित है। उसका घन आकार है। वह सदा अचल है, किसी विकार को नहीं प्राप्त होता। वह सत्, निर्मल, निर्विकार, निरन्तररूप, नीरन्ध्र और चन्द्रमा की तरह शीतल, सुन्दर है। उसमें ज्ञान-संवित्तरूपी रस है। वह अपना रस आप ही पीता है और सबको देता है। सबका प्रकाशक भी वही है। उसमें अनेक चित्ररेखाओं ने नियम किया है, परन्तु वह अपने स्वरूप को नहीं छोड़ता। अनेकरूपी भासित होता है। उसमें स्पन्दनरूपी रस भरा है। तत्वं, इदं, देश, काल, क्रिया, नीति, राग, द्वेष, हेयोपादेय, भूत, भविष्यत, काल, प्रकाश, तम, विद्या, अविद्या इत्यादि कल्पना-जाल उस रस के चेतने से चेतते हैं। वह बेल आत्मरूप है। उसमें अनुभवरूपी रस है। वह सदा अपने आपमें स्थित और नित्य शान्तरूप है। उसको जानकर पुरुष कृतकृत्य होता है।
इति श्रीयोगवाशिष्टे निर्वाणप्रकरणे बिल्वोपाख्यानं नाम चतुश्चत्वारिंशत्तमस्सर्गः ॥ ४४ ॥