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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 932, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 932

१२२ 卐 योगवाशिष्ठ 卐

रामजी बोले, हे भगवन् ! सब धर्मों के जाननेवाले आपने यह वेदरूपी महाद्रुमकी वार्ता कही। सो मुझे ऐसा निश्चय हुआ कि चैतन्य ही अहंनादिक जगत् हो भासित होता है, भेद किञ्चित् भी नहीं एक या द्वैत कल्पना सब व्यर्थ है। वशिष्ठजी बोले, हे राम ! जैसे ब्रह्माण्ड की मञ्जा सुमेरु आदिक पृथ्वी है, वैसे ही चैतन्य वृक्ष की मञ्जा यह ब्रह्माण्ड है। सब जगत् चैतन्य वृक्षरूप है—भिन्न नहीं, और उस चैतन्य का विनाश नहीं हो सकता। हे राम ! चैतन्यरूपी मिर्च के बीज में जो तिक्तरूपी चमत्कार तीक्ष्णता है सो सुषुप्तवत् निर्मल और शिला के अन्तर्वत् अभिश्रित है। हे राम ! अब और आश्चर्यरूप एक आख्यान सुनो। यह सुन्दर प्रकाशयुक्त स्निग्ध और शीतल स्पर्शवाली विस्तृत एक शिला महानीलरत्न और घनरूप है। उसमें कमल उपजते हैं और उसकी ऊर्ध्व बेल है, अधः मूल है और अनेक शाखाएँ हैं। रामजी बोले, हे भगवान् ! सत्य कहते हो, यह शिला मैंने भी देखी है। वह नदी में विष्णु की मूर्ति शालग्राम है। वशिष्ठजी बोले, हे राम ! ऐसे तो तुम जानते हो और तुमने देखा भी है। परन्तु जो शिला में बताता है, वह अपूर्व शिला है, उसके भीतर ब्रह्माण्ड समूह हैं और कुछ भी नहीं। हे राम ! चैतन्यरूपी शिला जो मैंने तुमसे कही है, उसमें सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड हैं। उस घनचैतन्यता से शिला वर्णन की है। वह घनघन और नीरन्ध्र है। आकाश, पृथ्वी, पर्वत, देश, नदियाँ, समुद्र इत्यादि सभी विश्व उस शिला के भीतर स्थित हैं। जैसे शिला के ऊपर जो कमल खिले होते हैं वे शिलारूप हैं, शिला से भिन्न नहीं; वैसे ही यह जगत् आत्मरूपी शिला में है; आत्मा से भिन्न नहीं। हे राम ! भूत, भविष्यत् और वर्तमान, तीनों काल उस शिला की पुतलियाँ हैं। जैसे शिल्पी पुतलियों की कल्पना करता है, वैसे ही यह जगत् आत्मा में है, उपजा नहीं, क्योंकि मनरूपी शिल्पी कल्पना करता है और उसमें नाना प्रकार का जगत् भासित होता है; आत्मा में कुछ उपजा नहीं। जैसे सुषुप्तरूप शिला के ऊपर जो कमल-रचना लिखी होती है, वह शिला से भिन्न नहीं, वैसे ही यह जगत् आत्मा