योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
१२२ 卐 योगवाशिष्ठ 卐
रामजी बोले, हे भगवन् ! सब धर्मों के जाननेवाले आपने यह वेदरूपी महाद्रुमकी वार्ता कही। सो मुझे ऐसा निश्चय हुआ कि चैतन्य ही अहंनादिक जगत् हो भासित होता है, भेद किञ्चित् भी नहीं एक या द्वैत कल्पना सब व्यर्थ है। वशिष्ठजी बोले, हे राम ! जैसे ब्रह्माण्ड की मञ्जा सुमेरु आदिक पृथ्वी है, वैसे ही चैतन्य वृक्ष की मञ्जा यह ब्रह्माण्ड है। सब जगत् चैतन्य वृक्षरूप है—भिन्न नहीं, और उस चैतन्य का विनाश नहीं हो सकता। हे राम ! चैतन्यरूपी मिर्च के बीज में जो तिक्तरूपी चमत्कार तीक्ष्णता है सो सुषुप्तवत् निर्मल और शिला के अन्तर्वत् अभिश्रित है। हे राम ! अब और आश्चर्यरूप एक आख्यान सुनो। यह सुन्दर प्रकाशयुक्त स्निग्ध और शीतल स्पर्शवाली विस्तृत एक शिला महानीलरत्न और घनरूप है। उसमें कमल उपजते हैं और उसकी ऊर्ध्व बेल है, अधः मूल है और अनेक शाखाएँ हैं। रामजी बोले, हे भगवान् ! सत्य कहते हो, यह शिला मैंने भी देखी है। वह नदी में विष्णु की मूर्ति शालग्राम है। वशिष्ठजी बोले, हे राम ! ऐसे तो तुम जानते हो और तुमने देखा भी है। परन्तु जो शिला में बताता है, वह अपूर्व शिला है, उसके भीतर ब्रह्माण्ड समूह हैं और कुछ भी नहीं। हे राम ! चैतन्यरूपी शिला जो मैंने तुमसे कही है, उसमें सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड हैं। उस घनचैतन्यता से शिला वर्णन की है। वह घनघन और नीरन्ध्र है। आकाश, पृथ्वी, पर्वत, देश, नदियाँ, समुद्र इत्यादि सभी विश्व उस शिला के भीतर स्थित हैं। जैसे शिला के ऊपर जो कमल खिले होते हैं वे शिलारूप हैं, शिला से भिन्न नहीं; वैसे ही यह जगत् आत्मरूपी शिला में है; आत्मा से भिन्न नहीं। हे राम ! भूत, भविष्यत् और वर्तमान, तीनों काल उस शिला की पुतलियाँ हैं। जैसे शिल्पी पुतलियों की कल्पना करता है, वैसे ही यह जगत् आत्मा में है, उपजा नहीं, क्योंकि मनरूपी शिल्पी कल्पना करता है और उसमें नाना प्रकार का जगत् भासित होता है; आत्मा में कुछ उपजा नहीं। जैसे सुषुप्तरूप शिला के ऊपर जो कमल-रचना लिखी होती है, वह शिला से भिन्न नहीं, वैसे ही यह जगत् आत्मा
✽ निर्वाण प्रकरण ✽ १२३
में है, आत्मा में भिन्न नहीं। जैसे शिला में जो पुतली बनी होती है, उसका उदय-अस्त नहीं होता, शिला ज्यों की त्यों रहती है, वैसे ही आत्मा में जगत् का उदय-अस्त नहीं होता; क्योंकि वास्तव में वह कुछ नहीं है। आत्मा में द्वैतकल्पना अज्ञान से होती है, और जब बोध होता है, तब शान्त हो जाती है। जैसे समुद्र में पड़ी जल की बूंद समुद्ररूप हो जाती है, वैसे ही बोध से कल्पना आत्मा में लीन हो जाती है।
हे राम ! चैतन्यआत्मा अनन्त है। उसमें कोई विकार और कल्पना नहीं है, पर अज्ञान से कल्पना उदित होती है और ज्ञान से लीन हो जाती है। विकार भी आत्मा के आश्रय से प्रतीत होते हैं, पर आत्मा विकार से रहित है। ब्रह्म से विकार उत्पन्न होते हैं और ब्रह्म ही में स्थित हैं, पर वास्तव में कुछ नहीं होता—सब आभासमात्र है। जैसे किरणों में जलाभास होता है, वैसे ही ब्रह्म में जगत्-विकार का आभास होता है। जैसे बीज में पत्र, डाल, फूल और फल का विस्तार होता है और बीजसत्ता सबमें मिली होती है, बीज से कुछ भिन्न नहीं होता, वैसे ही चिद्घन आत्मा के भीतर जगत् का जो विस्तार है, वह चिद्घन आत्मा से भिन्न नहीं; वही अपने आपमें स्थित है और जगत् भी उसी का रूप है। यदि एक मानिये तो द्वैत भी होता है और यदि एक नहीं कहा जाता तो द्वैत कहाँ हो ? जगत् और आत्मा में कुछ भेद नहीं; अद्वैत आत्मा ही अपने आपमें स्थित है। जैसे शिला में लिखी मूर्ति शिलारूप होती है, वैसे ही जगत् आत्मरूप है। और जैसे शिला में भिन्न-भिन्न विषम मूर्तियाँ होती हैं और आधाररूप शिला भिन्न है, वैसे ही आत्मा में जगन्मूर्ति भिन्न-भिन्न विषमरूप भासती है और उसका चैतन्यरूप आधार अभिन्न है, ब्रह्मसत्ता समान सुषुप्तवत् समवस्थित है। उसमें बड़े विकार भी देख पड़ते हैं, परन्तु वास्तव में वह सुषुप्तवत् विकार से रहित है। फुरने से रहित चैतन्यरूप शिला नित्य शान्त चिद्घनरूप सत्ता है, उसी में यह जगत् कल्पित है। अधिष्ठान सत्ता सर्वदा शान्तरूप है। उसमें भेद कदापि नहीं। जैसे
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जल में तरङ्ग और सुवर्ण में भूषण अभिन्नरूप हैं वैसे आत्मा में जगत् अभिन्नरूप है ।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे शिलाकोशउपदेशोनाम पञ्चचत्वारिंशत्तमसर्गः ॥ ४५ ॥
वशिष्ठजी बोले, हे राम ! बीज के भीतर फूल, फल और सम्पूर्ण वृक्ष होता है । उस वृक्ष का आदि भी बीज है और अन्त भी बीज है । जब फल पकता है, तब बीज भी होता है । वैसे ही आत्मा भी जगत् में है, परन्तु सदा अच्युत और सम है, कभी भेद, विकार और परिणाम को नहीं प्राप्त हुआ, अपनी सत्ता से स्थित है । जगत् के आदि, मध्य, अन्त में वही है, किसी और भाव को नहीं प्राप्त हुआ । देश, काल, कर्म आदि जो कुछ कल्पना भासित होती है, सो वही है । जो कुछ शब्द और अर्थ है, वह आत्मा से भिन्न नहीं । जैसे वृक्ष का आदि भी बीज है और अन्त भी बीज है और मध्य में जो कुछ विस्तार देख पड़ता है, वह भी वही है, भिन्न कुछ नहीं, वैसे जगत् का आदि भी आत्मसत्ता है, अन्त भी आत्मसत्ता है और जो कुछ मध्य में भासित होता है, वह भी वही है । हे राम ! चैतन्यरूपी बड़े दर्पण में सम्पूर्ण जगत् प्रतिबिम्बित होता है । सम्पूर्ण जगत् संकल्प-मात्र है । जैसा-जैसा किसी में इसका स्फुरण दृढ़ होता है, वैसे ही वैसे आत्मसत्ता के आश्रित होकर वह भासित होता है । जैसे चिन्तामणि में जैसा कोई संकल्प रखता है, वैसा ही वह पदार्थ प्रकट होता है, और वह वास्तव में संकल्पमात्र ही होता है, वैसे ही जैसी जैसी भावना कोई करता है, वैसी ही वैसी आत्मा के आश्रय से भासित होता है । अनन्त जगत् आत्मरूपी मणि के आश्रय में स्थित होते हैं । जैसी कोई भावना करता है, वैसी ही उसकी देख पड़ती है । हे राम ! आत्मरूपी सम्पुट में जगतरूपी रत्न निकलते हैं । जैसा स्फुरण होता है, वैसा ही जगत् भासित होता । जैसे शिला के ऊपर रेखाएं होती हैं और उनमें जो नाना प्रकार के चित्र उभरते हैं सो अनन्यरूप हैं, वैसे ही आत्मा में जगत् अनन्यरूप है । जैसे शिला के ऊपर शंख-चक्रादिक
- निर्वाण प्रकरण * १२५
रेखाएँ उभरती हैं, वैसे ही आत्मा में यह जगत् प्रकट है, और वह आत्मा रूप है। आत्मरूपी शिला नीरन्ध्र है, उसमें कोई छिद्र नहीं। जैसे जल में तरङ्ग जलरूप होते हैं तैसे ही ब्रह्म में जगत् ब्रह्मरूप है। वह ब्रह्म सम, शान्तरूप और सुषुप्तवत् स्थित है। उसमें जगत् कुछ उपजा नहीं, वह शिला की रेखाओं सा है। जैसे बेल के भीतर मज्जा होती है, वैसे ही ब्रह्म में जगत् स्थित है। जैसे आकाश में शून्यता, जल में द्रवता और वायु में स्पन्दता होता है, वैसे ही ब्रह्म में जगत् है। ब्रह्म और जगत् में कुछ भेद नहीं। जैसे शाखा और वृक्ष में कुछ भेद नहीं, वैसे ही ब्रह्म और जगत् में कुछ भेद नहीं—ब्रह्म ही जगत् है और जगत् ही ब्रह्म है।
हे राम ! इसमें भाव-अभाव या भेद-कल्पना कोई नहीं। ब्रह्मसत्ता ही प्रकाशती है और ब्रह्म ही जगतरूप होकर देख पड़ता है। जैसे मरुस्थल में सूर्य की किरणें जल के समान चमकती हैं, वैसे ही ब्रह्म जगतरूप होकर दिखता है। हे राम ! सुमेरु आदि पर्वत, तृण, वन और चित्त जगत्-परिणाम से लेकर सब प्राणियों को विभाग देखिये तो सर्वत्र परमसत्ता ही देख पड़ती है और सब पदार्थों में सूक्ष्मभाव से वही सत्ता व्यापी है। जैसे जल का रस वनस्पति में व्यापा हुआ है, वैसे ही सब जगत् में सूक्ष्मरूप से आत्मसत्ता व्यापी हुई है। जैसे एक ही रस-सत्ता, वृक्ष, तृण और गुच्छों में व्यापी हुई है। और एक ही अनेकरूप भासित होती है, वैसे एक ही ब्रह्मसत्ता अनेकरूप भासती है। हे राम ! जैसे मोर के अण्डे में अनेक रङ्ग होते हैं और जब अण्डा फूट जाता है तब उसमें शनैःशनै अनेक रङ्ग प्रकट होते हैं और वह एक ही रस अनेक रूप हो भासित होता है, वैसे एक ही आत्मा अनेकरूप में जगत् के आकार में भासित होती है। जैसे मोर के अण्डे में एक ही रस होता, परन्तु जो दीर्घसूत्री अज्ञानी हैं, उनको भविष्य के अनेक रङ्ग जो उसमें भासित होते हैं सो बिना उपजे ही उपजे भासते हैं, वैसे ही यह जगत् अनउपजा ही अज्ञानी के हृदय में नानात्व युक्त स्थित होता और जो ज्ञानवान् हैं उनको एकरस ब्रह्मसत्ता ही देख पड़ती है। जैसे मोर का रस परिणाम को न प्राप्त होने पर एकरस है, और परिणाम को
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प्राप्त होकर नानारूप होने पर भी एकरूप है, वैसे ही यह जगत् जब परमात्मा में भासित होता है तब भी परमात्मा ही है और जब नानारूप प्रतीत होता है, तब भी भिन्न नहीं है, परिणाम को नहीं प्राप्त हुआ. परन्तु अज्ञानी को नानात्व भासित होता है और ज्ञानी को एकरुपता ही भासित होती है । अथवा इस दृष्टान्त का दूसरा अर्थ यह है कि जैसे मोर के अण्डे में नानात्व कुछ नहीं हुआ, पर जिनकी दुर्दृष्टि है, उसे उसमें अनउपजा नानात्व भासित होता है और जिनकी दुर्दृष्टि नहीं, उसमें बीज ही भासित होता है, नानात्व नहीं भासता, वैसे ही जिनको अज्ञानरूपी दुर्दृष्टि है उनको अनउपजा ही जगत् नानात्वयुक्त देख पड़ता है और जो ज्ञान-दृष्टि से युक्त हैं, उनको एक ही ब्रह्म दिखता है और कुछ नहीं । हे राम ! नानात्व जब भासित होता है तब भी वह कुछ नहीं है । जैसे मोर के अण्डे में नानारङ्ग होने पर भी वह एकरूप है, वैसे ही इस जगत् में भिन्न-भिन्न पदार्थ भासित होने पर भी एक ब्रह्मसत्ता है; इत कुछ नहीं ।
इति श्रीयोगवासिष्ठे निर्वाणप्रकरणे महाउपदेशो नाम षट्चत्वारिंशत्तमस्सर्गः ॥ ४६ ॥
वशिष्ठजी बोले, हे राम ! जैसे अनउपजे रङ्ग जो मयूर के अण्डे में होते हैं, वे बीज से भिन्न कुछ नहीं, वैसे ही अहं-त्व आदि जगत् आत्मा में असत् होकर भी प्रतीत होता है । जैसे बीज में उन रङ्गों का उदय भी अनुदयरूप है, वैसे ही आत्मा में जगत् का उदय भी अनुदय-रूप है । आत्मसत्ता अनिर्वचनीय अशब्द पद है, वाणी से उसका वर्णन नहीं हो सकता । ऐसा सुख स्वर्ग तथा और किसी स्थान में भी नहीं है जैसा सुख आत्मा में स्थित होकर पाया जाता है । हे राम ! आत्मसुख में विश्रान्ति पाने के निमित्त मुनीश्वर, देवता, सिद्ध और महाऋषि दृश्य-दर्शन का सम्बन्ध जानने को त्यागकर स्थित होते हैं, इससे वह उत्तम सुख है । संवित् में संवेदन का फुरना जिनका निवृत्त हुआ है, उन पुरुषों का कोई दृश्यभावना नहीं रहती और न कोई कर्म उनको स्पर्श करता है । प्राण भी उनके निःस्पन्द होते हैं । वे निजचेतन के सम्बन्ध
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से रहित चित्र की मूर्ति में निश्चल शान्तरूप स्थित होते हैं। हे राम! जब चित्तकला फुरती है, तब संसारभ्रम प्राप्त होता है और जब चित्त का फुरना मिट जाता है तब शान्तरूप अद्वैत स्थित होता है। जैसे युद्ध राजा की सेना करती है और जीत-हार राजा की होती है, वैसे ही चित्त के स्फुरण द्वारा आत्मा में बन्धन व मोक्ष होता है। यद्यपि आत्मा समरूप और अच्युत है, तथापि मन, बुद्धि और अन्तः-करण के द्वारा आत्मा में बन्धन व मोक्ष भानित होता है। आत्मा सबका प्रकाशक है—जैसे चन्द्रमा की चाँदनी वृक्षादि को प्रकाशित करती है, वैसे ही आत्मा सब पदार्थों को प्रकाशित करता है।
वह आत्मा न दृश्य है, न उपदेश का विषय है, न विस्ताररूप है, न दूर है; केवल चैतन्यरूप अनुभव आत्मा है। वह न देह है, न इन्द्रिय है, न गुण है, न चित्त है, न वासना है, न जीव है, न स्पन्दन है, न और को स्पर्श करता है। न आकाश है, न सत् है, न असत् है, न मध्य है, न शून्य है, न अशून्य है, न देश, काल, वस्तु है, न यह है, न इतर इत्यादिक है। वह सब शब्दों से परे और केवल अनुभव गम्य है। उसका न आदि है, न अन्त है। न उसे शस्त्र काट सकते हैं, न अग्नि जला सकती है, न जल गला सकता है। न यह है, न वह है। न उसे वायु सोख सकती है और न किसी की सामर्थ्य उस पर चलती है। वह चित्तरूपी आत्मतत्त्व न जन्मता है और न मरता है। देहरूपी घट अनेक बार उपजते हैं और अनेक बार नष्ट होते हैं। आत्मारूपी आकाश सबके भीतर-बाहर अखण्ड अविनाशी है। जैसे अनेक घटों में एक ही आकाश स्थित होता है, वैसे ही अनेक पदार्थों में एकही ब्रह्मसत्ता आत्मरूप से स्थित है।
हे राम! जो कुछ स्थावर-जङ्गम जगत देख पड़ता है सो सब ब्रह्मरूप है। ब्रह्म निर्धर्म, निर्गुण, निरवयव, निराकार, निर्मल, निर्विकार, आदि-अन्त से रहित, सम और शान्तरूप है—ऐसी दृष्टि का आश्रय लेकर स्थित होओ। हे राम! इस दृष्टि का आश्रय ग्रहण करोगे तो बड़े-बड़े कर्म भी तुमको स्पर्श न करेंगे। जैसे आकाश को बादल
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स्पर्श नहीं करते, वैसे ही तुमको कर्म स्पर्श न करेंगे। यह काल, क्रिया, कारण, कार्य, जन्म, स्थिति, संहार आदि संसरणरूप संसार सब ब्रह्म रूप है—इसी दृष्टि का आश्रय ग्रहण करके विचरो।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे ब्रह्मेकताप्रतिपादनं नाम सप्तचत्वारिंशत्तमस्सर्गः ॥ ४७ ॥
राम ने पूछा, हे भगवन् ! यदि ब्रह्म में कोई विकार नहीं तो भाव-अभावरूप जगत कैसे भासित होता है ? वशिष्टजी बोले, हे राम ! प्रथम तो यह सुनो कि विकार किसको कहते हैं। वस्तु अपने पूर्वरूप को त्यागकर विपरीत रूप को प्राप्त हो और फिर पूर्व के स्वरूप को न प्राप्त हो, उसको विकार कहते हैं। जैसे दूध से दही होकर फिर दूध नहीं होता, जैसे बालक अवस्था बीत जाती है तो फिर नहीं आती और जैसे युवा अवस्था गई हुई फिर नहीं आती; इसका नाम विकार है। परब्रह्म निर्मल है। आदि में निर्विकार है, अन्त में भी निर्विकार है। मध्य में जो उसमें कुछ विकार या मल भासित होता है, उसका मूल अज्ञान है। मध्य में भी ब्रह्म ज्यों का त्यों अविकारी है। हे राम! जो पदार्थ विपर्ययरूप हो जाता है, वह फिर अपने रूप को नहीं प्राप्त होता। ब्रह्मसत्ता सदा ज्यों की त्यों अद्वैतरूप है और आत्मानुभव से प्रकाशित होती है। जो कभी अन्यथारूप को प्राप्त न हो, उसको विकार कैसे कहिये ? हे राम ! जो वस्तु विचार और ज्ञान से निवृत्त हो जाय, उसको भ्रममात्र जानिये। वह वास्तव में कुछ नहीं। जो कुछ विकार है, वह अज्ञान से भासित होता है और जब आत्मबोध होता है तब निवृत्त हो जाता है। जिसके बोध से विकार नष्ट हो जाय, उसे विकार कैसे कहिये ? ब्रह्म शब्द से जिसका निरूपण होता है, वह निद्वैतरूप आत्मा है। जो आदि अन्त में सत् हो, उसे मध्य में भी सत् जानिये। जो इससे भिन्न हो, उसे अज्ञान जानिये। आत्मरूप सदा सर्वदा समरूप है। आकाश और पवन भी अन्यभाव को प्राप्त हो जाते हैं, परन्तु आत्मतत्त्व कदापि अन्यभाव को नहीं प्राप्त होता। वह तो प्रकाशरूप एक नित्य और निर्विकार ईश्वर है; भाव अभाव विकार
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को कभी नहीं प्राप्त होता। राम ने पूछा, हे भगवन्! जब एकतत्त्व विद्यमान और ब्रह्म सर्वदा निर्मलरूप है तो उस संवित् ब्रह्म में यह अविद्या कहाँ से आई? वशिष्ठजी बोले, हे राम यह सब ब्रह्म है; आगे भी ब्रह्म था और पीछे भी ब्रह्म होगा। उस निर्विकार और आदि, अन्त, मध्य से रहित ब्रह्म में अविद्या कभी नहीं रहती, यह निश्चय है। जो वाच्य-वाचक शब्द से उपदेश के निमित्त ब्रह्म कहता है, उसमें अविद्या कहाँ है? हे राम! 'अहं' 'त्वं' आदिक जगत् भ्रम और अग्नि, वायु आदिक सब ब्रह्मसत्ता है, अविद्या रञ्चकमात्र नहीं। जिसका नाम ही अविद्या है, उसे भ्रममात्र और असत जानो। जो विद्यमान ही नहीं, उसका नाम क्या कहिये?
फिर रामजी ने पूछा, हे भगवन्! उपशम प्रकरण में आपने क्यों कहा था कि अविद्या है और अब कैसे कहते हो कि वह विद्यमान नहीं है। वशिष्ठजी बोले, हे राम! इतने काल तक तुम अबोध थे, इस निमित्त मैंने तुम्हें जगाने के निमित्त युक्ति कल्पना कर वैसा कहा था और अब तुम प्रबुद्ध हुए हो, इसलिए मैंने कहा कि अविद्या अविद्यमान है।
हे राम! अविद्या, जीव और जगत् आदिक का क्रम अप्रबुद्ध को जगाने के निमित्त वेदवादियों ने वर्णन किया है। जब तक मन अप्रबुद्ध होता है, तब तक अविद्या का भ्रम बना रहता है और युक्ति के बिना अनेक उपायों से भी उसे बोध नहीं होता। जब बोधवान् होता है, तब सिद्धान्त को उपदेश की युक्ति के बिना भी पाता है। पर अबोध मन युक्ति के बिना नहीं पा सकता। हे राम! जो कार्य युक्ति से सिद्ध होता है, वह और यत्न से नहीं सिद्ध होता। जैसे युक्तिरूपी दीपक से अन्धकार दूर होता है, और बल यत्न से नहीं निवृत्त होता, वैसे ही युक्ति के बिना अन्य यत्न से अज्ञान की निद्रा निवृत्त नहीं होती। यदि अप्रबुद्ध को सर्वब्रह्म सिद्धान्त का उपदेश कीजिये तो वह उपदेश व्यर्थ होता है। जैसे कोई दुःखी अपना दुःख दीवाल के आगे जाकर कहे तो उसका कहा वह नहीं सुनती और उसका कहना वृथा होता है, वैसे ही अप्र-
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वृद्ध को सर्व-ब्रह्म का उपदेश व्यर्थ होता है । मूढ़ युक्ति मे जगता है और बोधवान् को प्रत्यक्ष तत्त्व का उपदेश होता है । हे रामजी ! अब तुम यह धारणा करो कि ब्रह्म, तीनों जगत् और अहं, त्वं आदिक सब ब्रह्म हैं, द्वैत कल्पना कोई नहीं । फिर जो तुम्हारी इच्छा हो सो करो, दृश्य-संवेदन न होगा, सदा आत्मा में स्थित रहोगे । इस प्रकार अनेक कर्मों में भी लिप्त न होगे ।
हे राम ! चैतन्यतत्त्व परमात्मा प्रकाशरूप है । वह सदा अहंभाव मे स्फुरित होता है । ऐसा जो अनुभवरूप है उसी में चलते, बैठते, सोते, पीते, चेष्टा करते स्थित रहो, तब तुम्हारा अहं-ममभाव निवृत्त हो जायगा । सब प्राणियों में स्थित शान्तरूप ब्रह्म को तुम प्राप्त होगे और आदि-अन्त से रहित शुद्ध संवित्मात्र प्रकाशरूप आत्मा को देखोगे । जैसे मृत्तिका के पात्र घट आदि सबमृत्तिका के ही हैं, वैसे ही तुम सब प्राणियों में आत्मा को देखोगे । जैसे मृत्तिका से घट भिन्न नहीं, वैसे ही आत्मा से जगत् भी भिन्न नहीं । जैसे वायु से स्पन्दन और जल से तरङ्ग भिन्न नहीं, वैसे ही आत्मा से प्रकृति भिन्न नहीं । जैसे जल और तरङ्ग शब्दमात्र से दो हैं, वैसे ही आत्मा और प्रकृति शब्दमात्र से दो हैं, पर भेद कुछ नहीं । केवल अज्ञान से भेद दिखता है और ज्ञान से नष्ट हो जाता है । जैसे रम्मी में सर्प दिखता है, वैसे ही आत्मा में प्रकृति है । हे राम ! चित्त वृक्ष है और कल्पना बीज । जब कल्पनारूपी बीज बोया जाता है, तब चित्तरूपी अंकुर उत्पन्न होता है और उसमे जब भावरूप संसार उत्पन्न होता है, तब आत्मज्ञान की अग्नि कल्पनारूपी बीज दग्ध और चित्तरूपी अंकुर नष्ट हो जाता है । हे राम ! चित्तरूपी अंकुर से सुख दुःखरूपी वृक्ष उत्पन्न होता है । जब चित्तरूपी अंकुर नष्ट हो, तब सुख-दुःखरूपी वृक्ष कहाँ उपजे ? हे राम ! जो कुछ द्वैतभ्रम है सो अबोध में उपजता और बोध में नष्ट हो जाता है । आत्मा जो परमार्थ सार है, उसकी भावना करो, तब संसारभ्रम से मुक्त होगे ।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे स्मृतिविचारयोगो नामाष्ट-चत्वारिंशत्तमस्सर्गः ॥ ४८ ॥
❊ निर्वाण प्रकरण ❊ १३१
राम ने पूछा, हे मुनीश्वर ! जो कुछ जानने योग्य था सो मैंने जाना और जो कुछ देखने योग्य था सो देखा। अब मैं आपके ज्ञानरूपी अमृत से सिंचकर परमपद में पूर्णात्मा हुआ हूँ। हे मुनीश्वर ! यह अब मुझको अनुभव हुआ है कि पूर्ण ने सब विश्व पूर्ण किया है, पूर्ण में पूर्ण प्रतीत है और पूर्ण में पूर्ण ही स्थित है—द्वैत कुछ नहीं। हे मुनीश्वर ! ऐसा जानकर भी मैं लीला और बोध की वृद्धि के निमित्त आपसे पूछता हूँ। जैसे बालक पिता से पूछता है तो पिता बुरा नहीं मानता, वैसे ही आप रुष्ट न होना। हे मुनीश्वर ! श्रवण, नेत्र, त्वचा, रसना और घ्राण, ये पाँचों इन्द्रियाँ प्रत्यक्ष देख पड़ती हैं, पर मरे पर विषय को क्यों नहीं ग्रहण करतीं और जीवित रहने पर कैसे ग्रहण करती हैं ? घटादिक की तरह बाहर से ये जड़ हैं, फिर हृदय में अनुभव कैसे होता है ? और लोहे की शलाका की तरह ये भिन्न-भिन्न हैं, फिर इकट्ठी कैसे हुई हैं ? परस्पर जो एक आत्मा में अनुभव होता है कि मैं देखता हूँ, मैं सुनता हूँ, ये वृत्तियाँ क्योंकर इकट्ठी हुई हैं ? मैं सामान्यभाव से जानता भी हूँ, परन्तु विशेष रूप से आपसे पूछता हूँ।
वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! इन्द्रियाँ, चित्त और घट, पट आदि पदार्थ निर्मल चैतन्यरूप आत्मा से भिन्न नहीं हैं। वह आत्मतत्त्व आकाश से भी सूक्ष्म और स्वच्छ है। हे राम ! जब चैतन्यतत्त्व से पुर्यष्टका (चित्त) की भावना निकली तो उसने आगे इन्द्रियगण को देखा। इन्द्रियगण चित्त से पहले हुए हैं। इनकी घनता से चैतन्यतत्त्व पुर्यष्टका को प्राप्त हुआ है। उसी में सब घटादिक पदार्थ प्रतिबिम्बित हुए हैं और पुर्यष्टका में भानमान हैं। राम ने पूछा, हे मुनीश्वर ! जिसने अनन्त जगत् रचे हैं, जो महाआदर्श में प्रतिबिम्बित हैं, पुर्यष्टका का रूप क्या है, और कैसे हुई ? वशिष्ठजी बोले, हे राम ! आदि-अन्त से रहित जगत् का बीजरूप जो अनादि ब्रह्म है, वह निरामय और प्रकाशरूप है वही अनादि ब्रह्म कल्पना और कलना से रहित, शुद्ध, चिन्मात्र और अचेतन जगत् का बीज है। वह जब कलना के सम्मुख हुआ, तब उसका नाम जीव हुआ। उस जीव ने जब देह को ग्रहण
१३२ योगवाशिष्ठ
किया और अहंभाव उपजा, तब अहंकार हुआ। वह जब मनन करने लगा, तब मन हुआ। जब निश्चय करने लगा, तब बुद्धि हुई। जब पदार्थों के देखनेवाली इन्द्रियों की भावना हुई, तब इन्द्रियाँ हुई। जब देह की भावना करने लगा, तब देह हुई। जब घट-पट की भावना हुई, तब घट-पट हुए। इसी प्रकार जैसी-जैसी भावना होती गई, वैसे ही पदार्थ होते गये। हे राम! यही जिसका स्वभाव है, उसे पुर्यष्टका कहते हैं। स्वरूप से विपर्ययरूपी दृश्य की ओर भावना होने से और चित्तकलना से हुए कर्तृत्व, भोक्तृत्व, सुख, दुःख आदि की भावना, कल्पना और अभिमान से उसको जीव कहते हैं।
निदान जैसी-जैसी भावना का आकार हुआ वैसे ही वैसी वासना वह करता गया। जैसे जल में सींचा हुआ बीज डाल, पत्ते, फूल और फल के रूप को प्राप्त होता है, वैसे ही वासना से सींचा हुआ जीव स्वरूप के प्रमाद से महाभ्रमजाल में गिरता है और जानता है कि मैं मनुष्य-देह सहित हूँ अथवा देवता या स्थावर हूँ, पर यह नहीं जानता कि मैं चिदात्मा हूँ। वह अपने को देह में मिला हुआ परिच्छिन्न और तुच्छरूप देखता है। इस मिथ्याज्ञान में डूबता है और देहाभिमान में वासना के वश चिरकाल पर्यन्त ऊँचे, नीचे और बीच में भ्रमता है। जैसे समुद्र में आया हुआ काष्ठ तरङ्गों में उछलता है। और घटीयन्त्र का लंगर नीचे ऊपर जाता है, वैसे ही जीव वासना के वश हो नीचे और ऊपर भ्रमता है। जब विचार और अभ्यास करके आत्मबोध को प्राप्त होता है, तब संसार-बन्धन से मुक्त होकर आदि-अन्त से रहित आत्मपद को प्राप्त होता है। बहुत काल तक योनिरेखा का भोग कर फिर आत्म-ज्ञान से परमपद को प्राप्त होता है। हे राम! स्वरूप से गिरे हुए जीव इस प्रकार भ्रमते और शरीर पाते हैं। अब वह सुनो कि इन्द्रियाँ मृतक होने पर विषयों को क्यों नहीं ग्रहण करतीं। हे राम! जब शुद्धतत्त्व में चित्तकलना उठती है, तब वह जीवरूपी होती है और मन सहित षड्इन्द्रियों को लेकर देहरूपी गृह में स्थित हो बाहर के विषयों को ग्रहण करती है। मन सहित षड्इन्द्रियों में सम्बन्ध से विषय का ग्रहण
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होता है; इनमें रहित होने पर विषयों का कदापि ग्रहण नहीं हो सकता। इस प्रकार इनमें स्थित होकर जीवकला विषय को ग्रहण करती है। यद्यपि इन्द्रियाँ भिन्न-भिन्न हैं, तो भी इनको जीवकला एकत्र कर लेती है और ये अहंकाररूपी तागे में इकट्ठी होती हैं। देह और इन्द्रियाँ मन की तरह हैं इनको इकट्ठा करके जीव कहता है कि में देखता, सूँघता, सुनता, फिरता, बोलता हूँ और इन्हीं के अभिमान से विषय को ग्रहण करता है।
हे राम ! देह, इन्द्रियाँ और मन आदि जड़ हैं, परन्तु आत्मा की सत्ता पाकर अपने-अपने विषय को ग्रहण करते हैं। जबतक पुर्यष्टका देह में होती है, तबतक इन्द्रियाँ भी विषयों को ग्रहण करती हैं। जब पुर्यष्टका देह से निकल जाती है, तब इन्द्रियाँ भी विषयों को नहीं ग्रहण करतीं। हे राम ! ये जो प्रत्यक्ष नेत्र, नासिका, कान, जिह्वा और त्वचा आदि अंग देख पड़ते हैं, ये इन्द्रियाँ नहीं हैं। इन्द्रियाँ तो सूक्ष्म तन्मात्रा हैं। ये तो उनके रहने के स्थान हैं। जैसे गृह में झरोखे होते हैं, वैसे ही ये स्थान हैं। हे राम ! अब जीव का रूप सुनो। आत्मतत्त्व सब जगह व्याप्त है, परन्तु उसका प्रतिबिम्ब वही भासित होता है, जहाँ निर्मल स्थान होता है। जैसे निर्मल जल में प्रतिबिम्ब पड़ता है, अथवा जैसे दो कुण्ड हों, एक जल से पूर्ण और दूसरा जल से रहित, तो सूर्य का प्रकाश तो दोनों में तुल्य होता है, पर जिसमें जल है उसमें प्रति-बिम्बित होता है और जल के डोलने से प्रतिबिम्ब भी हिलता दिखता है, पर जहाँ जल नहीं है वहाँ प्रतिबिम्ब भी नहीं, वैसे ही जहाँ सात्त्विक अंश अन्तःकरण होता है, वहाँ आत्मा का प्रतिबिम्ब जीव भी होता है और जब तक जीव शरीर में रहता है, तब तक शरीर चेतन भासित होता है; पर जब वह जीवकला पुर्यष्टकारूप शरीर को त्याग जाती है, तब शरीर जड़ भासित होता है। जैसे कुण्ड से जल निकल जाय तो कुण्ड सूर्य के प्रतिबिम्ब से हीन हो जाता है, वैसे ही अन्तःकरण और तन्मात्र पुर्यष्टका में आत्मा का प्रतिबिम्ब होता है। जब पुर्यष्टका शरीर को त्याग जाती है, तब शरीर जड़ भासित होता है।
१३४ ❈ योगवाशिष्ठ ❈
हे राम ! जैसे झरोखे के आगे कोई पदार्थ रखिये तो झरोखे को पदार्थ का ज्ञान नहीं होता और जब उसका स्वामी देखता है तब पदार्थ का ग्रहण करता है, वैसे ही इन्द्रियों के स्थानों में जो सूक्ष्मतन्मात्रा ग्रहण करनेवाली होती है, वही विषयों को ग्रहण करती है, और जब तन्मात्रा नहीं होती, तब इन्द्रियाँ ग्रहण नहीं कर सकतीं। हे राम ! प्रत्यक्ष देखो कि कथा का श्रोता पुरुष कथा में बैठा होता है, पर यदि उसका चित्त और जगह निकल जाता है, तब प्रत्यक्ष बैठा रहता है; किन्तु कुछ नहीं सुनता, क्योंकि उसकी श्रवण इन्द्रिय मन के साथ गई है; वैसे ही जब पुर्यष्टका निकल जाती है तब मृतक होता है और इन्द्रियाँ भी विषयों को ग्रहण नहीं करतीं। हे राम ! अहं-मम आदि दृश्य भी सर्ग के आदि में आत्मरूपी समुद्र में तरङ्ग की तरह निकला है, उसके पश्चात् दृश्य कल्पना हुई है। अतएव न देश है, न काल है, न क्रिया है। यह सब असतरूप है; वास्तव में कुछ नहीं। यह जानकर संसार के सुख, दुःख, हर्ष, शोक, राग, द्वेष से रहित होकर विचरो, तब तुम माया से मुक्त हो जाओगे।
इति श्रीयोगवाशिष्टे निर्वाणप्रकरणे संवेदनविचारो नामैकोन- पञ्चाशत्तमस्सर्गः ॥ ४९ ॥
वशिष्ठजी बोले, हे राम ! वास्तव में इन्द्रियादिक गण कुछ उपजे नहीं हैं। आदि-ब्रह्मा की उत्पत्ति मैंने तुमसे कही और तुमने सुनी है। जैसे आदि-जीव पुर्यष्टकारूप ब्रह्मा उपजे हैं, वैसे ही और भी सब उपजे हैं। हे राम ! जीव पुर्यष्टका में स्थित होकर जैसी-जैसी भावना करता गया, वैसा ही वैसा भासित होने लगा है और फिर उसी की सत्ता पाकर अपने-अपने विषय को ग्रहण करने लगा है। वास्तव में इन्द्रियाँ भी कुछ वस्तु नहीं। जब आत्मा के आभास में चेतता है, इन्द्रियाँ और इन्द्रियों के विषय संवेदन में उपजे हैं। ये जैसे उपजे हैं, सो तुमसे कह चुके हैं। हे राम ! शुद्ध संवित् सत्तामात्र में जो अहं का उन्मेष हुआ, वही संवेदन है। वही संवेदन जीवरूप पुर्यष्टकाभाव को प्राप्त होकर बुद्धि, मन और पञ्चतन्मात्रा को उपजाकर आपही उनमें
- निर्वाण प्रकरण * १३५
प्रवेशकर स्थित हुआ है । उमी को पुर्यष्टका कहते हैं । परन्तु यह पुर्यष्टका भी स्पन्दन में उपजी है । आत्मा से कुछ नहीं उपजा । वह आत्मा न एक है, न अनेक । परमात्मतत्त्व अस्ति अनामय है, और उसमें संवेदन भी अनन्यरूप है । हे राम ! उसमें न कोई द्वैत कल्पना है और न कुछ मनशक्ति है; केवल शान्त सत्ता है । उमी को परमात्मा कहते हैं । वह मनसहित षट् इन्द्रियों से अतीत अ-चैत्य ( चित्त से रहित ) और चिन्मात्र है । उमसे जीव उत्पन्न हुआ है । यह भी मैं उपदेश के निमित्त कहता हूँ; वास्तव में कुछ उपजा नहीं, केवल भ्रममात्र है । जहाँ जीव उपजा है, वहाँ उमको अहंभावरूप विपर्यय हुआ है । यही अविद्या है, जो उपदेश मे लय हो जाती है ।
जैमे निर्मली मे जल की मलिनता दूर हो जाती है, वैमे ही गुरु और शास्त्र के उपदेश मे जब अविद्या मिट जाती है, तब भ्रमरूप आकाश शान्त हो जाते हैं और ज्ञानरूप आत्मा शेष रहता है, जो आकाश में भी सूक्ष्म है । जैमे परमाणु के मुकाबले में सुमेरु स्थूल होता है, वैमे ही आत्मा के मुकाबले में आकाश स्थूल है । हे राम ! आत्मा के आगे जो स्थूलता भासित होती है, वह भी भ्रममात्र है । जो बड़े-बड़े आरम्भ दिखते हैं, वे भी असत् हैं, तब और पदार्थों की क्या बात है ? हे राम ! आत्मा में जगत् नहीं पाया जाता; क्योंकि वस्तु असम्यक् ज्ञान से भासित होती है, सम्यक्ज्ञान में नहीं रहती । जो कुछ-जगत् के प्रपंच देख पड़ते हैं, वे सब मायामात्र हैं । उनमे कुछ अर्थ सिद्ध नहीं होता । जैमे मृगतृष्णा का जल पिया नहीं जाता, वैमे ही जगत् के पदार्थों में कोई परमार्थ नहीं सिद्ध होता । वे सब अज्ञान से भासित होते हैं । हे राम ! जो वस्तु सम्यक्ज्ञान में प्राप्त हो, उमे मत जानिये और जो सम्यक्ज्ञान में न रहे, उमे भ्रममात्र जानिये । यह जीव-पुर्यष्टका अवि-द्यक भ्रम है, अर्थात् असत् ही मन भासित होता है । जब गुरु और शास्त्रों का विचार होता है, तब जगत् का भ्रम मिट जाता है ।
पुर्यष्टका में स्थित होकर जीव जैमी भावना करता है, वैमे ही सिद्धि होती है । जैमे बालक अपनी परछाहीं में वैताल की कल्पना करता है,
१३६ ❊ योगवाशिष्ठ ❊
वैसे ही जीवकला अपने में देश, काल, तत्त्व आदिकी कल्पना करती है और भावना के अनुसार उसको वे भासित होते हैं। जैसे बीज में पत्ते, डाल, फूल, फल आदि का विस्तार होता है, वैसे ही तन्मात्रा में सब प्राणी, भीतर, बाहर, देश, काल, क्रिया, कर्म आदि सब प्रकट हुआ है। आदि-जीव चेतकर जैसा संकल्प रचता है, वैसा ही भासित होता है। यह संवेदन भी आत्मा से भिन्न नहीं है। जैसे मिरच में तीक्ष्णता और आकाश में शून्यता अलग नहीं है, वैसे ही आत्मा से संवेदन अलग नहीं। उस संवेदन ने उपजकर निश्चय जाना है कि ये पदार्थ ऐसे हैं, ये ऐसे हैं, इसी से वे वैसे ही स्थित हुए, अन्यथा कभी नहीं होते। आदिजीव ने प्रकट होकर जो निश्चय धारण किया, उर्मी का नाम नीति है। वह स्वरूप में सर्वव्यापी आत्मसत्ता है। आत्मसत्ता ही ये सब रूप रचकर स्थित हुई है। जैसे एक ही ऊख का रस, गुड़, शक्कर आदि के और मृत्तिका घट, पटादि के आकार को रचती है, वैसे ही आत्मसत्ता सर्व ज्ञान को पाती है। जैसे एक ही जल का रस पत्ते, डाल, फूल, फलादिक होकर भासित होता है, वैसे एक ही आत्मसत्ता घट, पट और दीवाल आदि के आकार में भासित होती है।
हे राम ! आदि-जीव ने जैसे निश्चय किया, वैसे ही स्थित है अन्यथा कदापि नहीं होता, परन्तु जगत् वास्तव में भ्रममात्र है; वास्तव में न बिम्ब है और न प्रतिबिम्ब। ये द्वैत में होते हैं और द्वैत कुछ नहीं केवल चिदानन्द ब्रह्म आत्मतत्त्व अपने आप में स्थित है। देहादिक भी सब चिन्मात्र है। हे राम ! जो कुछ जगत् दिखता है, सो आत्मा का किञ्चनरूप है। जैसे रस्सी सर्परूपा जान पड़ती है, वैसे ही आत्मा जगत्-रूप देख पड़ता है। जैसे सुवर्ण भूषण के रूप में भासित होता है, वैसे ही आत्मा दृश्यरूप होकर भासित होता है । जैसे सुवर्ण में भूषण वास्तविक नहीं होते, वैसे ही आत्मा में दृश्य वास्तविक नहीं। जैसे स्वप्न का विषय देश असत् है, पर सत्-सा लगता है, वैसे ही जीव को देह पृथक् भासित होती है। हे राम ! आत्मसत्ता ज्यों की त्यों है परन्तु स्फुरित होने से अनेक रूप रचती है । जैसे एक नट अनेक स्वाँग
☀️ निर्वाण प्रकरण ☀️
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मरता है, वैसे ही आत्मसत्ता देहादिक अनेक आकार रखती है। जैसे स्वप्न में एक ही मनुष्य अनेक रूप रचकर चेष्टा करता है, वैसे ही जगत् में आत्मसत्ता नानारूप रखती है।
हे राम! आत्मा नित्य शुद्ध और सबका आत्मरूप है। अपने स्वरूप के प्रमाद से वह अपने जन्म-मरण को जानता है, पर वे जन्म-मरण असत् हैं। जैसे कोई पुरुष अपने को स्वप्न में श्वानरूप देखे, वैसे ही यह अपने को जन्मता-मरता देखता है। जैसे इसको पूर्वभावना है, भ्रम में असत् को सत् जानता है और जैसे स्वप्न में वस्तु को अवस्तु और अवस्तु को वस्तु देखता है, वैसे ही वह जाग्रत् में विपर्यय (उल्टा) देखता है। जैसे जाग्रत् के ज्ञान से स्वप्न का भ्रम निवृत्त हो जाता है, वैसे ही आत्माधिष्ठान के ज्ञान से जगत् का भ्रम निवृत्त हो जाता है। जैसे पहले का किया दुष्कृत हो तो उसके पीछे सुकृत करने से वह घट जाता है, वैसे ही पूर्व-संस्कार से जब नीच वासना होती है और फिर आत्मतत्त्व का अभ्यास करता है तो पुरुष के प्रयत्न से मलिन वासना नष्ट हो जाती है। जब तक वासना मलिन होती है, तब तक जीव उपजता, मरता और गोते खाता है। जब सन्तों के संग और सत्शास्त्रों के विचार से आत्मज्ञान होता है, तब संसारबन्धन से छूटता है—अन्यथा नहीं छूटता।
हे राम! वासणारूपी कलङ्क से जीव घिरा हुआ है और देहरूपी मन्दिर में बैठकर अनेक भ्रम के दृश्य देखता है। आदि-जीव को जो भ्रम हुआ है सो अपने स्वरूप को त्यागकर अनात्म भ्रम को देखने से जैसे बालक परछाहीं में भूत की कल्पना करे वैसे ही जीव ने कल्पना कर जैसी भावना की, वैसा ही भासित होने लगा। आदि-जीव पुर्यष्टका में स्थित हुआ है। बुद्धि, मन, अहंकार और तन्मात्रा का नाम पुर्यष्टका है और देह अन्तर्वाहक है। चैतन्य आत्मा अमूर्ति है। आकाश भी उसके आगे स्थूल है। प्राणवायु गुच्छा के और देह सुमेरु के समान है। ऐसा जीव सूक्ष्म है। सुषुप्ति में जडरूप और स्वप्नभ्रम, दोनों अवस्थाओं में स्थावर-जङ्गमरूपी जीव भटकते हैं, कभी सुषुप्ति में और
१३= ❇ योगवाशिष्ठ ❇
कमी स्वप्न में स्थित होते हैं। इसी प्रकार दोनों अवस्थाओं में जीव भटकते हैं। हे राम! सबकी देह अन्तवाहक है, और उशी देह से सब चेष्टा करते हैं। कभी स्थावर में जाकर वृक्ष और पत्थर आदि की योनि पाते हैं और कभी जब स्वप्न में होते हैं, तब जङ्गमयोनि पाते हैं। वह भी कर्मवासना के अनुसार पाते हैं। जब तामसी वासना घनी होती है, तब कल्पवृक्ष चिन्तामणि आदि स्वरूप को प्राप्त होते हैं। जब केवल तामसी वासना घनी मोहरूप होती है, तब वृक्ष और पत्थर आदि की योनि पाते हैं। इसका नाम सुषुप्ति है। सो लय घना मोह रूप है और इससे भिन्न जङ्गम विक्षेपरूप स्वप्न अवस्था है, कभी उसमें होता है और कभी सुषुप्तिरूप स्थावर होता है।
हे राम! सुषुप्ति अवस्था में वासना सुषुप्तिरूप होती है। वह फिर उगती है, इसमें मोहरूप है। उस सुषुप्ति में जब उतरता है, तब विक्षेप रूप स्वप्नावस्था होती है और जब बोध होता है, तब जाग्रत अवस्था प्राप्त होती है। जाग्रत अवस्था दो प्रकार की है। जाग्रत वही है जो लय और विक्षेप से रहित चेतन अवस्था है। उससे रहित और मनो-राज्य सब स्वप्नरूप है। एक जीवन्मुक्त जाग्रत, और दूसरी विदेहमुक्ति है। जीवन्मुक्ति तुरीयारूप और विदेहमुक्ति तुरीयातीत है। यह अवस्था जीव को बोध में प्राप्त होती है और जीव को बोध पुरुष-प्रयत्न से होता है—अन्यथा नहीं होता। हे राम! जीव का उदय ज्ञानरूप है। यदि दृश्य की ओर लगता है, तो वही हो जाता है और यदि मन की ओर लगता है, तो सतरूप हो जाता है। जब दृश्य के सम्मुख होता है, तब दीर्घ भ्रम को देखता है। जीव के भीतर जो सृष्टिरूप होकर स्फुरित होता है, वह भी आत्मसत्ता से भिन्न कोई वस्तु नहीं है। जैसे बटनाही में दोनों के समान जल भी उछलता है और वह उस जल से भिन्न वस्तु नहीं होता, वैसे ही आत्मा के सिवा जीव के भीतर और कुछ वस्तु नहीं है। यह सृष्टि जो भाषित होती है, सो मायामात्र है। हे राम! जीव को स्वरूप के प्रमाद से सृष्टि भाषित होती है और सत् जैसी लगती है। उसे नाना प्रकार का विश्व प्रतीत होता है
✻ निर्वाण प्रकरण ✻ १३६
और नाना प्रकार की वासनाएँ उठती हैं। उसमे जीव बंधन को प्राप्त हुआ है। जब वासना का क्षय हो तब मुक्ति हो। हे राम! मोहरूप घनी वासना का नाम सुषुप्ति या जड़ अवस्था है। वह क्षीण स्वप्न-रूप है। जब स्वरूप का प्रमाद होता है, तब दृश्य में मन्बुद्धि होती है और जब उसमें प्रतीत होती है तब नाना प्रकार की वासनाओं का उदय होता है। पर जब स्वरूप का साक्षात्कार होता है, तब संसार की सत्यता नष्ट हो जाती है, फिर वासना नहीं उठती।
हे राम! घनी वासना तब तक उठती है, जब तक दृश्य में मन्बुद्धि होती है। जब जगत् का अत्यन्त अभाव होता है, तब वासना भी नहीं रहती। जैसे भूषण पिघलाकर जब सुवर्ण बन गया, तब भूषण-बुद्धि नहीं रहती। जो वस्तु अज्ञान में उपजी है, वह ज्ञान में लीन हो जाती है। वासना का भ्रम अबोध में उपजा है, वह बोध में लीन हो जाता है। हे राम! घनी वासना से सुषुप्तिरूप जड़ अवस्था होती है, और क्षीण वासना में जीव स्वप्न देखता है। घनी वासना रूप मोह में जीव स्थावर अवस्था को प्राप्त होता है, मध्यवासना में तिर्यक्यौनि पाता है अर्थात् पशु, पक्षी और सर्पादिक होता है; क्षीण वासना में मनुष्यादिक शरीर और नष्टवासना से मोक्ष पाता है। हे राम! यह सब जगत् संकल्प में रचा है। घट-पट आदि जो बाहर देखते और ग्रहण करते हो, वे ही हृदय में स्थित हो जाते हैं, और जब उनको ग्रहण करते हो, तो ग्राह्य-ग्राहक का सम्वन्ध देखते हो कि यह मैंने ग्रहण किया है और यह मैंने लिया है। जो ज्ञानवान् है, वह न ग्रहण करने का अभिमान करता है और न कुछ त्यागने का अभिमान करता है। उसको भीतर-बाहर सब चिदाकाश भासित होता है। चैतन्यसत्ता का यह चमत्कार है; तीनों जगतरूप होकर वही प्रकाशता है, रञ्चकमात्र भी कुछ अन्य नहीं-केवल आत्मसत्ता अपने आपमें स्थित है। जैसे समुद्र में तरङ्ग और बुलबुले उठकर भासित होते हैं, परन्तु सब जल ही जल है-जल से भिन्न कुछ नहीं। वैसे ही आत्मा जगतरूप होकर भासित होता है, द्वैत नहीं है।
इति श्रीयो० वा० नि० यथार्थोपदेशो नाम पञ्चाशत्तमम्सर्गः ॥ ५० ॥
१४० ॐ योगवाशिष्ठ ॐ
वशिष्ठजी बोले, हे राम! जैसे जीव को स्वप्न में जो संसार उदय होता है, वह कल्पनामात्र होता है, न सत् है और न असत् है, जीव के चेतन में ही भ्रम भासित होता है; वैसे ही यह जाग्रत अवस्था भ्रम-मात्र है—स्वप्न और जाग्रत एकरूप हैं। जैसे स्वप्न में जाग्रत का एक अणु भी दीर्घकाल होता है, वैसे ही स्वरूप के प्रमाद में जाग्रत भी एक दीर्घकाल का भ्रम हुआ है, जिसमें जीव सत् का असत् और असत् को सत् जानता है; जड़ को चेतन और चेतन को विपर्यय ज्ञान से जड़ जानता है। जैसे स्वप्न में एक ही जीव अनेकता को प्राप्त होता है, वैसे ही आदि-जीव एक से अनेक होकर भासित होता है। जैसे किसी स्थान में चोर का भ्रम भासित होता है, वैसे ही आत्मा में तीनों जगत का भ्रम भासित होता है। जैसे सुषुप्ति से स्वप्नभ्रम उदय होता है, वैसे ही अद्वैततत्त्व आत्मा में जगत का भ्रम होता है। आत्मा अनन्त, सर्वगत जीव का बीजरूप है, जैसा उसके आश्रय में स्फुरण होता है, वैसे ही सिद्ध होकर वह भासित होता है। हे राम! जिस पुरुष की स्वरूप में स्थिति हुई है, वह सदा निसंग होकर विचरता है। जैसे आगे चलकर द्वापर में विष्णुजी के निसंगता के उपदेश से अर्जुन मुक्त होकर विचरेंगे, वैसे ही हे महाबाहो! तुम भी विचरोगे। हे राम! पांडु के पुत्र अर्जुन जैसे सुख से जन्म व्यतीत करेंगे और सब व्यवहारों में भी सुखी और स्वस्थ रहेंगे, वैसे ही तुम भी निसंग होकर विचरोगे।
राम ने पूछा, हे ब्राह्मण! पांडु के पुत्र अर्जुन कब होंगे और कैसे विष्णु भगवान् उनको निसंग होने का उपदेश करेंगे? वशिष्ठजी बोले, हे राम! अस्ति-सन्मात्रतत्त्व में आध्यात्मिक संज्ञा कल्पित ही है। जैसे आकाश में आकाश स्थित है, वैसे ही निर्मलतत्त्व आप अपनेमें स्थित है। जैसे सुवर्ण में भूषण और समुद्र में तरङ्ग उठते हैं, वैसे ही आत्मा में चौदह प्रकार के प्राणी फिरते हैं। जैसे जाल में पक्षी भ्रमते हैं, वैसे ही जगत् में जीव भ्रमते हैं। वहाँ ब्रह्मा, चन्द्रमा, सूर्य, लोकपाल आदि होकर स्थित हैं और उन्होंने पञ्चभूतों के कर्म रचे हैं कि यह पुण्य ग्रहण करने योग्य है और यह पाप त्यागने योग्य है; पुण्य से
❇ निर्वाण प्रकरण ❇ १४१
स्वर्गादिक सुख प्राप्त होता है और पाप से नरक होता है । यह मर्यादा लोकपाल प्रजापति ने स्थापित की है । इस प्रकार संसाररूपी नदी में जीव बहते हैं। संसाररूपी नदी अविच्छिन्न निरंतर बहती देख पड़ती है, पर यह क्षण-क्षण में नष्ट होती है । इस जगत् में सूर्य के पुत्र यमराज बड़े प्रतापी और तेजस्वी लोकपाल हैं । वही सब जीवों को मारते हैं और उस प्रवाह कार्य को चलाते हैं । उनका जीवों का मारना और दण्ड देना ही नियम है; परन्तु चित्त में वह पहाड़ की तरह अचल हैं । वह यमराज हरएक चौजुगी में कभी आठ, कभी सात, कभी बारह वा सोलह वर्षों का नियम रखकर किसी जीव को नहीं मारते और उदासीन की तरह स्थित होते हैं ।
जब पृथ्वी में अधिक प्राणी हो जाते हैं, चलने को मार्ग नहीं रहता और कोई दुष्टजीव जीवों को दुःख देते हैं, जिससे पृथ्वी भारी और दुःखी होती है, तब पृथ्वी के भार को उतारने के निमित्त विष्णु भगवान् अवतार लेकर दुष्टजीवों के नाश और धर्ममार्ग की रक्षा करते हैं । हे राम ! इस प्रकार नियम के पालक यम को अपना काम करते अनन्त युग व्यतीत हो गये हैं । वैसे ही प्राणी और जगत् भी असंख्य हो गये हैं । इस सृष्टि का अब वैवस्वत यम (मनु) है । वह आगे द्वादश-वर्ष पर्यन्त नियम करेगा और किसी को न मारेगा । तब जीव अक्रूरकर्म करने लगेंगे और पृथ्वी प्राणियों से भर जायगी । जैसे वृक्ष गुच्छों के साथ गुँथ जाते हैं, वैसे ही पृथ्वी भी प्राणियों से गुँथ जायगी, और जैसे चोर से डरकर स्त्री भर्ता की शरण जाती है, वैसे ही पृथ्वी भी दुःखित होकर विष्णु की शरण जायगी । तब विष्णुजी दो देह धारण कर पृथ्वी का भार उतारेंगे और सन्मार्ग स्थापित करेंगे । सब देवता भी अवतार लेकर उनके साथ आवेंगे और नरनायक होंगे । एक देह से विष्णु भगवान् वसुदेव के घर पुत्ररूप में प्रकट होंगे । उनका कृष्ण नाम होगा । और दूसरी देह में पाण्डु के गृह में अर्जुन नाम से युधिष्ठिर नामक धर्मपुत्र के भाई होंगे और समुद्र पर्यन्त पृथ्वी का राज्य करेंगे । उनके चाचा के पुत्र का नाम दुर्योधन होगा । उनका और