योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 949, कुल 1734 में से
संदर्भ में पढ़ें✻ निर्वाण प्रकरण ✻ १३६
और नाना प्रकार की वासनाएँ उठती हैं। उसमे जीव बंधन को प्राप्त हुआ है। जब वासना का क्षय हो तब मुक्ति हो। हे राम! मोहरूप घनी वासना का नाम सुषुप्ति या जड़ अवस्था है। वह क्षीण स्वप्न-रूप है। जब स्वरूप का प्रमाद होता है, तब दृश्य में मन्बुद्धि होती है और जब उसमें प्रतीत होती है तब नाना प्रकार की वासनाओं का उदय होता है। पर जब स्वरूप का साक्षात्कार होता है, तब संसार की सत्यता नष्ट हो जाती है, फिर वासना नहीं उठती।
हे राम! घनी वासना तब तक उठती है, जब तक दृश्य में मन्बुद्धि होती है। जब जगत् का अत्यन्त अभाव होता है, तब वासना भी नहीं रहती। जैसे भूषण पिघलाकर जब सुवर्ण बन गया, तब भूषण-बुद्धि नहीं रहती। जो वस्तु अज्ञान में उपजी है, वह ज्ञान में लीन हो जाती है। वासना का भ्रम अबोध में उपजा है, वह बोध में लीन हो जाता है। हे राम! घनी वासना से सुषुप्तिरूप जड़ अवस्था होती है, और क्षीण वासना में जीव स्वप्न देखता है। घनी वासना रूप मोह में जीव स्थावर अवस्था को प्राप्त होता है, मध्यवासना में तिर्यक्यौनि पाता है अर्थात् पशु, पक्षी और सर्पादिक होता है; क्षीण वासना में मनुष्यादिक शरीर और नष्टवासना से मोक्ष पाता है। हे राम! यह सब जगत् संकल्प में रचा है। घट-पट आदि जो बाहर देखते और ग्रहण करते हो, वे ही हृदय में स्थित हो जाते हैं, और जब उनको ग्रहण करते हो, तो ग्राह्य-ग्राहक का सम्वन्ध देखते हो कि यह मैंने ग्रहण किया है और यह मैंने लिया है। जो ज्ञानवान् है, वह न ग्रहण करने का अभिमान करता है और न कुछ त्यागने का अभिमान करता है। उसको भीतर-बाहर सब चिदाकाश भासित होता है। चैतन्यसत्ता का यह चमत्कार है; तीनों जगतरूप होकर वही प्रकाशता है, रञ्चकमात्र भी कुछ अन्य नहीं-केवल आत्मसत्ता अपने आपमें स्थित है। जैसे समुद्र में तरङ्ग और बुलबुले उठकर भासित होते हैं, परन्तु सब जल ही जल है-जल से भिन्न कुछ नहीं। वैसे ही आत्मा जगतरूप होकर भासित होता है, द्वैत नहीं है।
इति श्रीयो० वा० नि० यथार्थोपदेशो नाम पञ्चाशत्तमम्सर्गः ॥ ५० ॥