योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 950, कुल 1734 में से
संदर्भ में पढ़ें१४० ॐ योगवाशिष्ठ ॐ
वशिष्ठजी बोले, हे राम! जैसे जीव को स्वप्न में जो संसार उदय होता है, वह कल्पनामात्र होता है, न सत् है और न असत् है, जीव के चेतन में ही भ्रम भासित होता है; वैसे ही यह जाग्रत अवस्था भ्रम-मात्र है—स्वप्न और जाग्रत एकरूप हैं। जैसे स्वप्न में जाग्रत का एक अणु भी दीर्घकाल होता है, वैसे ही स्वरूप के प्रमाद में जाग्रत भी एक दीर्घकाल का भ्रम हुआ है, जिसमें जीव सत् का असत् और असत् को सत् जानता है; जड़ को चेतन और चेतन को विपर्यय ज्ञान से जड़ जानता है। जैसे स्वप्न में एक ही जीव अनेकता को प्राप्त होता है, वैसे ही आदि-जीव एक से अनेक होकर भासित होता है। जैसे किसी स्थान में चोर का भ्रम भासित होता है, वैसे ही आत्मा में तीनों जगत का भ्रम भासित होता है। जैसे सुषुप्ति से स्वप्नभ्रम उदय होता है, वैसे ही अद्वैततत्त्व आत्मा में जगत का भ्रम होता है। आत्मा अनन्त, सर्वगत जीव का बीजरूप है, जैसा उसके आश्रय में स्फुरण होता है, वैसे ही सिद्ध होकर वह भासित होता है। हे राम! जिस पुरुष की स्वरूप में स्थिति हुई है, वह सदा निसंग होकर विचरता है। जैसे आगे चलकर द्वापर में विष्णुजी के निसंगता के उपदेश से अर्जुन मुक्त होकर विचरेंगे, वैसे ही हे महाबाहो! तुम भी विचरोगे। हे राम! पांडु के पुत्र अर्जुन जैसे सुख से जन्म व्यतीत करेंगे और सब व्यवहारों में भी सुखी और स्वस्थ रहेंगे, वैसे ही तुम भी निसंग होकर विचरोगे।
राम ने पूछा, हे ब्राह्मण! पांडु के पुत्र अर्जुन कब होंगे और कैसे विष्णु भगवान् उनको निसंग होने का उपदेश करेंगे? वशिष्ठजी बोले, हे राम! अस्ति-सन्मात्रतत्त्व में आध्यात्मिक संज्ञा कल्पित ही है। जैसे आकाश में आकाश स्थित है, वैसे ही निर्मलतत्त्व आप अपनेमें स्थित है। जैसे सुवर्ण में भूषण और समुद्र में तरङ्ग उठते हैं, वैसे ही आत्मा में चौदह प्रकार के प्राणी फिरते हैं। जैसे जाल में पक्षी भ्रमते हैं, वैसे ही जगत् में जीव भ्रमते हैं। वहाँ ब्रह्मा, चन्द्रमा, सूर्य, लोकपाल आदि होकर स्थित हैं और उन्होंने पञ्चभूतों के कर्म रचे हैं कि यह पुण्य ग्रहण करने योग्य है और यह पाप त्यागने योग्य है; पुण्य से