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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 951, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 951

❇ निर्वाण प्रकरण ❇ १४१

स्वर्गादिक सुख प्राप्त होता है और पाप से नरक होता है । यह मर्यादा लोकपाल प्रजापति ने स्थापित की है । इस प्रकार संसाररूपी नदी में जीव बहते हैं। संसाररूपी नदी अविच्छिन्न निरंतर बहती देख पड़ती है, पर यह क्षण-क्षण में नष्ट होती है । इस जगत् में सूर्य के पुत्र यमराज बड़े प्रतापी और तेजस्वी लोकपाल हैं । वही सब जीवों को मारते हैं और उस प्रवाह कार्य को चलाते हैं । उनका जीवों का मारना और दण्ड देना ही नियम है; परन्तु चित्त में वह पहाड़ की तरह अचल हैं । वह यमराज हरएक चौजुगी में कभी आठ, कभी सात, कभी बारह वा सोलह वर्षों का नियम रखकर किसी जीव को नहीं मारते और उदासीन की तरह स्थित होते हैं ।

जब पृथ्वी में अधिक प्राणी हो जाते हैं, चलने को मार्ग नहीं रहता और कोई दुष्टजीव जीवों को दुःख देते हैं, जिससे पृथ्वी भारी और दुःखी होती है, तब पृथ्वी के भार को उतारने के निमित्त विष्णु भगवान् अवतार लेकर दुष्टजीवों के नाश और धर्ममार्ग की रक्षा करते हैं । हे राम ! इस प्रकार नियम के पालक यम को अपना काम करते अनन्त युग व्यतीत हो गये हैं । वैसे ही प्राणी और जगत् भी असंख्य हो गये हैं । इस सृष्टि का अब वैवस्वत यम (मनु) है । वह आगे द्वादश-वर्ष पर्यन्त नियम करेगा और किसी को न मारेगा । तब जीव अक्रूरकर्म करने लगेंगे और पृथ्वी प्राणियों से भर जायगी । जैसे वृक्ष गुच्छों के साथ गुँथ जाते हैं, वैसे ही पृथ्वी भी प्राणियों से गुँथ जायगी, और जैसे चोर से डरकर स्त्री भर्ता की शरण जाती है, वैसे ही पृथ्वी भी दुःखित होकर विष्णु की शरण जायगी । तब विष्णुजी दो देह धारण कर पृथ्वी का भार उतारेंगे और सन्मार्ग स्थापित करेंगे । सब देवता भी अवतार लेकर उनके साथ आवेंगे और नरनायक होंगे । एक देह से विष्णु भगवान् वसुदेव के घर पुत्ररूप में प्रकट होंगे । उनका कृष्ण नाम होगा । और दूसरी देह में पाण्डु के गृह में अर्जुन नाम से युधिष्ठिर नामक धर्मपुत्र के भाई होंगे और समुद्र पर्यन्त पृथ्वी का राज्य करेंगे । उनके चाचा के पुत्र का नाम दुर्योधन होगा । उनका और