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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 952, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 952

१९२ ॐ योगवाशिष्ठ ॐ

भीमसेन आदि पाण्डवों का बड़ा युद्ध होगा । दोनों ओर संग्राम की लालसा में अठारह अक्षौहिणी सेना इकट्ठी होगी और बड़े भयानक युद्ध होंगे । उनके द्वारा हरि पृथ्वी का भार उतारेंगे ।

हे राम ! उस सेना के युद्ध में विष्णु का अर्जुन नाम अवतार होगा । वह अर्जुन गाण्डीव धनुष धारण कर मानव स्वभाव में स्थित हो, हर्ष-शोकादिक-विकार-संयुक्त मोहाभिभूत होंगे । युद्ध में अपने बांधवों को देखकर मूच्छित होंगे और मोह और करूणा से उनके हाथ में धनुष गिर पड़ेगा । वह जब आतुर होंगे, तब बोध-देह में उनको हरि उपदेश करेंगे । जब दोनों सेनाओं के मध्य में अर्जुन मोहित होकर गिरेंगे, तब हरि कहेंगे कि हे राजसिंह अर्जुन ! तुम मनुष्यभाव को प्राप्त हो क्यों मोहित हुए हो ? इस कायरपन को त्याग करो । तुम तो परम प्रकाश आत्मतत्त्व हो । तुम सबका आत्मा, आनन्द, अविनाशी, आदि-अन्त-मध्य से रहित, सर्वव्यापी, परमअंकुशरूप, निर्मल, दुःख के स्पर्श से रहित, नित्य, शुद्ध, निरामय हो । हे अर्जुन ! आत्मा न जन्मता है, न मरता है; होकर भी फिर कुछ नाश नहीं होता, क्योंकि वह अजन्मा, निरन्तर, पुरातन और सबका आदि है । शरीर का नाश होने पर उसका नाश नहीं होता । तुम क्यों वृथा कातर हो रहे हो ?

इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे नारायणावतारे नामकपञ्चाशत्तमस्सर्गः ॥ ५२ ॥

श्रीभगवान बोले, हे अर्जुन ! जो इस आत्मा को मारनेवाला और मरता मानते हैं, वे आत्मा को नहीं जानते । यह आत्मा न मरता है और न मारता है, क्योंकि जो अक्षयरूप निराकार आकाश से भी सूक्ष्म है उस आत्मा परमेश्वर को कोई किस प्रकार मार सकता है ? हे अर्जुन ! तुम अहंकाररूप नहीं हो । इस अनात्म अभिमानरूपी मल का त्याग करो । तुम जन्म-मरण से रहित मुक्तरूप हो । जिस पुरुष का अनात्म में अहंभाव नहीं और जिसकी बुद्धि कर्तृत्व-भोक्तृत्व में लिप्त नहीं होती, वह पुरुष सब विश्व को भी यदि मारे तो भी उसको नहीं मारता और न उसे बन्धन होता है । हे अर्जुन ! जिसको