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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 953, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 953

❈ निर्वाण प्रकरण ❈ १४३

जैसा दृढ़ निश्चय होता है, उसे वैसा ही अनुभव होता है। इसमें यह मैं, मेरा इत्यादि जो मलिन संवित् निश्चय है, उसे त्यागकर स्वरूप में स्थित होओ। जो ऐसी भावना में स्थित नहीं होते और आपको नष्ट होता मानते हैं, वे सुख-दुःख भोगते और रागद्वेष में जलते हैं। हे अर्जुन ! वे अपने त्रिगुणरूप असंख्य कर्मों में बँधते हैं। शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध, इनमें पाँचों तत्त्व-आकाश, वायु, अग्नि जल और पृथ्वी उपजे हैं और उन भूतों के अंश श्रवण, त्वचा, नेत्र, जिह्वा और नामिका अपने विषयों में स्थित हैं। ये इन्द्रियाँ अपने विषयों को ग्रहण करती हैं। नेत्र रूप को, त्वचा स्पर्श को, जिह्वा रस को, नामिका गन्ध को और श्रवण शब्द को ग्रहण करते हैं। उसमें अहंकार विमूढ़ व्यक्ति अपने को कर्त्ता मानता है। सोचता है कि मैं देखता हूँ, सुनता हूँ, स्पर्श करता हूँ, स्वाद और गन्ध लेता हूँ।

हे अर्जुन ! ये सब कर्म कलना से रचे गये हैं। इन्द्रियों से कर्म होते हैं और अहंभाव से जीव वृथा क्लेश का भागी होता है। बहुतों ने मिलकर कर्म किया और उनका अभिमानी होकर एक ही दुःख पाता है। बड़ा आश्चर्य है कि देह और इन्द्रियों से कर्म होते हैं और जीव उनका अभिमानी होकर सुख, दुःख और राग, द्वेष में जलता है। इससे इनका संग और अभिमान त्यागकर अपने स्वरूप में स्थित हो। योगी केवल इन्द्रियों से कर्म करता है, उनमें अभिमान वृत्ति नहीं करता। हे अर्जुन ! इस जीव को अहंकार ही दुःखदायक है, क्योंकि उससे वह अनात्म में आत्म-अभिमान करता है। जो अभिमानरूपी विष से रहित होकर चेष्टा करता है, वह दुःख का कारण नहीं होता। वह सदा सुखरूप है। हे अर्जुन ! जैसे सुन्दर शरीर विष्ठा और मल से मलिन हुआ हो तो उसकी शोभा जाती रहती है, वैसे ही बुद्धिमान, पुरुष यदि शास्त्र का वेत्ता और गुणों से सम्पन्न भी हो, पर यदि अनात्म में आत्म-अभिमान करे तो उसकी शोभा जाती रहती है। जो निर्मल, निरहंकार, सुख-दुःख में सम और क्षमावान् है, वह शुभ कर्म करे अथवा अशुभ कर्म करे, उसको कोई कर्म स्पर्श नहीं करता। हे अर्जुन !