सामग्री पर जाएँ
भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 948, कुल 1734 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 948

१३= ❇ योगवाशिष्ठ

कमी स्वप्न में स्थित होते हैं। इसी प्रकार दोनों अवस्थाओं में जीव भटकते हैं। हे राम! सबकी देह अन्तवाहक है, और उशी देह से सब चेष्टा करते हैं। कभी स्थावर में जाकर वृक्ष और पत्थर आदि की योनि पाते हैं और कभी जब स्वप्न में होते हैं, तब जङ्गमयोनि पाते हैं। वह भी कर्मवासना के अनुसार पाते हैं। जब तामसी वासना घनी होती है, तब कल्पवृक्ष चिन्तामणि आदि स्वरूप को प्राप्त होते हैं। जब केवल तामसी वासना घनी मोहरूप होती है, तब वृक्ष और पत्थर आदि की योनि पाते हैं। इसका नाम सुषुप्ति है। सो लय घना मोह रूप है और इससे भिन्न जङ्गम विक्षेपरूप स्वप्न अवस्था है, कभी उसमें होता है और कभी सुषुप्तिरूप स्थावर होता है।

हे राम! सुषुप्ति अवस्था में वासना सुषुप्तिरूप होती है। वह फिर उगती है, इसमें मोहरूप है। उस सुषुप्ति में जब उतरता है, तब विक्षेप रूप स्वप्नावस्था होती है और जब बोध होता है, तब जाग्रत अवस्था प्राप्त होती है। जाग्रत अवस्था दो प्रकार की है। जाग्रत वही है जो लय और विक्षेप से रहित चेतन अवस्था है। उससे रहित और मनो-राज्य सब स्वप्नरूप है। एक जीवन्मुक्त जाग्रत, और दूसरी विदेहमुक्ति है। जीवन्मुक्ति तुरीयारूप और विदेहमुक्ति तुरीयातीत है। यह अवस्था जीव को बोध में प्राप्त होती है और जीव को बोध पुरुष-प्रयत्न से होता है—अन्यथा नहीं होता। हे राम! जीव का उदय ज्ञानरूप है। यदि दृश्य की ओर लगता है, तो वही हो जाता है और यदि मन की ओर लगता है, तो सतरूप हो जाता है। जब दृश्य के सम्मुख होता है, तब दीर्घ भ्रम को देखता है। जीव के भीतर जो सृष्टिरूप होकर स्फुरित होता है, वह भी आत्मसत्ता से भिन्न कोई वस्तु नहीं है। जैसे बटनाही में दोनों के समान जल भी उछलता है और वह उस जल से भिन्न वस्तु नहीं होता, वैसे ही आत्मा के सिवा जीव के भीतर और कुछ वस्तु नहीं है। यह सृष्टि जो भाषित होती है, सो मायामात्र है। हे राम! जीव को स्वरूप के प्रमाद से सृष्टि भाषित होती है और सत् जैसी लगती है। उसे नाना प्रकार का विश्व प्रतीत होता है