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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 947, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 947

☀️ निर्वाण प्रकरण ☀️

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मरता है, वैसे ही आत्मसत्ता देहादिक अनेक आकार रखती है। जैसे स्वप्न में एक ही मनुष्य अनेक रूप रचकर चेष्टा करता है, वैसे ही जगत् में आत्मसत्ता नानारूप रखती है।

हे राम! आत्मा नित्य शुद्ध और सबका आत्मरूप है। अपने स्वरूप के प्रमाद से वह अपने जन्म-मरण को जानता है, पर वे जन्म-मरण असत् हैं। जैसे कोई पुरुष अपने को स्वप्न में श्वानरूप देखे, वैसे ही यह अपने को जन्मता-मरता देखता है। जैसे इसको पूर्वभावना है, भ्रम में असत् को सत् जानता है और जैसे स्वप्न में वस्तु को अवस्तु और अवस्तु को वस्तु देखता है, वैसे ही वह जाग्रत् में विपर्यय (उल्टा) देखता है। जैसे जाग्रत् के ज्ञान से स्वप्न का भ्रम निवृत्त हो जाता है, वैसे ही आत्माधिष्ठान के ज्ञान से जगत् का भ्रम निवृत्त हो जाता है। जैसे पहले का किया दुष्कृत हो तो उसके पीछे सुकृत करने से वह घट जाता है, वैसे ही पूर्व-संस्कार से जब नीच वासना होती है और फिर आत्मतत्त्व का अभ्यास करता है तो पुरुष के प्रयत्न से मलिन वासना नष्ट हो जाती है। जब तक वासना मलिन होती है, तब तक जीव उपजता, मरता और गोते खाता है। जब सन्तों के संग और सत्शास्त्रों के विचार से आत्मज्ञान होता है, तब संसारबन्धन से छूटता है—अन्यथा नहीं छूटता।

हे राम! वासणारूपी कलङ्क से जीव घिरा हुआ है और देहरूपी मन्दिर में बैठकर अनेक भ्रम के दृश्य देखता है। आदि-जीव को जो भ्रम हुआ है सो अपने स्वरूप को त्यागकर अनात्म भ्रम को देखने से जैसे बालक परछाहीं में भूत की कल्पना करे वैसे ही जीव ने कल्पना कर जैसी भावना की, वैसा ही भासित होने लगा। आदि-जीव पुर्यष्टका में स्थित हुआ है। बुद्धि, मन, अहंकार और तन्मात्रा का नाम पुर्यष्टका है और देह अन्तर्वाहक है। चैतन्य आत्मा अमूर्ति है। आकाश भी उसके आगे स्थूल है। प्राणवायु गुच्छा के और देह सुमेरु के समान है। ऐसा जीव सूक्ष्म है। सुषुप्ति में जडरूप और स्वप्नभ्रम, दोनों अवस्थाओं में स्थावर-जङ्गमरूपी जीव भटकते हैं, कभी सुषुप्ति में और

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