योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
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वैसे ही जीवकला अपने में देश, काल, तत्त्व आदिकी कल्पना करती है और भावना के अनुसार उसको वे भासित होते हैं। जैसे बीज में पत्ते, डाल, फूल, फल आदि का विस्तार होता है, वैसे ही तन्मात्रा में सब प्राणी, भीतर, बाहर, देश, काल, क्रिया, कर्म आदि सब प्रकट हुआ है। आदि-जीव चेतकर जैसा संकल्प रचता है, वैसा ही भासित होता है। यह संवेदन भी आत्मा से भिन्न नहीं है। जैसे मिरच में तीक्ष्णता और आकाश में शून्यता अलग नहीं है, वैसे ही आत्मा से संवेदन अलग नहीं। उस संवेदन ने उपजकर निश्चय जाना है कि ये पदार्थ ऐसे हैं, ये ऐसे हैं, इसी से वे वैसे ही स्थित हुए, अन्यथा कभी नहीं होते। आदिजीव ने प्रकट होकर जो निश्चय धारण किया, उर्मी का नाम नीति है। वह स्वरूप में सर्वव्यापी आत्मसत्ता है। आत्मसत्ता ही ये सब रूप रचकर स्थित हुई है। जैसे एक ही ऊख का रस, गुड़, शक्कर आदि के और मृत्तिका घट, पटादि के आकार को रचती है, वैसे ही आत्मसत्ता सर्व ज्ञान को पाती है। जैसे एक ही जल का रस पत्ते, डाल, फूल, फलादिक होकर भासित होता है, वैसे एक ही आत्मसत्ता घट, पट और दीवाल आदि के आकार में भासित होती है।
हे राम ! आदि-जीव ने जैसे निश्चय किया, वैसे ही स्थित है अन्यथा कदापि नहीं होता, परन्तु जगत् वास्तव में भ्रममात्र है; वास्तव में न बिम्ब है और न प्रतिबिम्ब। ये द्वैत में होते हैं और द्वैत कुछ नहीं केवल चिदानन्द ब्रह्म आत्मतत्त्व अपने आप में स्थित है। देहादिक भी सब चिन्मात्र है। हे राम ! जो कुछ जगत् दिखता है, सो आत्मा का किञ्चनरूप है। जैसे रस्सी सर्परूपा जान पड़ती है, वैसे ही आत्मा जगत्-रूप देख पड़ता है। जैसे सुवर्ण भूषण के रूप में भासित होता है, वैसे ही आत्मा दृश्यरूप होकर भासित होता है । जैसे सुवर्ण में भूषण वास्तविक नहीं होते, वैसे ही आत्मा में दृश्य वास्तविक नहीं। जैसे स्वप्न का विषय देश असत् है, पर सत्-सा लगता है, वैसे ही जीव को देह पृथक् भासित होती है। हे राम ! आत्मसत्ता ज्यों की त्यों है परन्तु स्फुरित होने से अनेक रूप रचती है । जैसे एक नट अनेक स्वाँग