योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 945, कुल 1734 में से
संदर्भ में पढ़ें- निर्वाण प्रकरण * १३५
प्रवेशकर स्थित हुआ है । उमी को पुर्यष्टका कहते हैं । परन्तु यह पुर्यष्टका भी स्पन्दन में उपजी है । आत्मा से कुछ नहीं उपजा । वह आत्मा न एक है, न अनेक । परमात्मतत्त्व अस्ति अनामय है, और उसमें संवेदन भी अनन्यरूप है । हे राम ! उसमें न कोई द्वैत कल्पना है और न कुछ मनशक्ति है; केवल शान्त सत्ता है । उमी को परमात्मा कहते हैं । वह मनसहित षट् इन्द्रियों से अतीत अ-चैत्य ( चित्त से रहित ) और चिन्मात्र है । उमसे जीव उत्पन्न हुआ है । यह भी मैं उपदेश के निमित्त कहता हूँ; वास्तव में कुछ उपजा नहीं, केवल भ्रममात्र है । जहाँ जीव उपजा है, वहाँ उमको अहंभावरूप विपर्यय हुआ है । यही अविद्या है, जो उपदेश मे लय हो जाती है ।
जैमे निर्मली मे जल की मलिनता दूर हो जाती है, वैमे ही गुरु और शास्त्र के उपदेश मे जब अविद्या मिट जाती है, तब भ्रमरूप आकाश शान्त हो जाते हैं और ज्ञानरूप आत्मा शेष रहता है, जो आकाश में भी सूक्ष्म है । जैमे परमाणु के मुकाबले में सुमेरु स्थूल होता है, वैमे ही आत्मा के मुकाबले में आकाश स्थूल है । हे राम ! आत्मा के आगे जो स्थूलता भासित होती है, वह भी भ्रममात्र है । जो बड़े-बड़े आरम्भ दिखते हैं, वे भी असत् हैं, तब और पदार्थों की क्या बात है ? हे राम ! आत्मा में जगत् नहीं पाया जाता; क्योंकि वस्तु असम्यक् ज्ञान से भासित होती है, सम्यक्ज्ञान में नहीं रहती । जो कुछ-जगत् के प्रपंच देख पड़ते हैं, वे सब मायामात्र हैं । उनमे कुछ अर्थ सिद्ध नहीं होता । जैमे मृगतृष्णा का जल पिया नहीं जाता, वैमे ही जगत् के पदार्थों में कोई परमार्थ नहीं सिद्ध होता । वे सब अज्ञान से भासित होते हैं । हे राम ! जो वस्तु सम्यक्ज्ञान में प्राप्त हो, उमे मत जानिये और जो सम्यक्ज्ञान में न रहे, उमे भ्रममात्र जानिये । यह जीव-पुर्यष्टका अवि-द्यक भ्रम है, अर्थात् असत् ही मन भासित होता है । जब गुरु और शास्त्रों का विचार होता है, तब जगत् का भ्रम मिट जाता है ।
पुर्यष्टका में स्थित होकर जीव जैमी भावना करता है, वैमे ही सिद्धि होती है । जैमे बालक अपनी परछाहीं में वैताल की कल्पना करता है,