योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
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जल में तरङ्ग और सुवर्ण में भूषण अभिन्नरूप हैं वैसे आत्मा में जगत् अभिन्नरूप है ।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे शिलाकोशउपदेशोनाम पञ्चचत्वारिंशत्तमसर्गः ॥ ४५ ॥
वशिष्ठजी बोले, हे राम ! बीज के भीतर फूल, फल और सम्पूर्ण वृक्ष होता है । उस वृक्ष का आदि भी बीज है और अन्त भी बीज है । जब फल पकता है, तब बीज भी होता है । वैसे ही आत्मा भी जगत् में है, परन्तु सदा अच्युत और सम है, कभी भेद, विकार और परिणाम को नहीं प्राप्त हुआ, अपनी सत्ता से स्थित है । जगत् के आदि, मध्य, अन्त में वही है, किसी और भाव को नहीं प्राप्त हुआ । देश, काल, कर्म आदि जो कुछ कल्पना भासित होती है, सो वही है । जो कुछ शब्द और अर्थ है, वह आत्मा से भिन्न नहीं । जैसे वृक्ष का आदि भी बीज है और अन्त भी बीज है और मध्य में जो कुछ विस्तार देख पड़ता है, वह भी वही है, भिन्न कुछ नहीं, वैसे जगत् का आदि भी आत्मसत्ता है, अन्त भी आत्मसत्ता है और जो कुछ मध्य में भासित होता है, वह भी वही है । हे राम ! चैतन्यरूपी बड़े दर्पण में सम्पूर्ण जगत् प्रतिबिम्बित होता है । सम्पूर्ण जगत् संकल्प-मात्र है । जैसा-जैसा किसी में इसका स्फुरण दृढ़ होता है, वैसे ही वैसे आत्मसत्ता के आश्रित होकर वह भासित होता है । जैसे चिन्तामणि में जैसा कोई संकल्प रखता है, वैसा ही वह पदार्थ प्रकट होता है, और वह वास्तव में संकल्पमात्र ही होता है, वैसे ही जैसी जैसी भावना कोई करता है, वैसी ही वैसी आत्मा के आश्रय से भासित होता है । अनन्त जगत् आत्मरूपी मणि के आश्रय में स्थित होते हैं । जैसी कोई भावना करता है, वैसी ही उसकी देख पड़ती है । हे राम ! आत्मरूपी सम्पुट में जगतरूपी रत्न निकलते हैं । जैसा स्फुरण होता है, वैसा ही जगत् भासित होता । जैसे शिला के ऊपर रेखाएं होती हैं और उनमें जो नाना प्रकार के चित्र उभरते हैं सो अनन्यरूप हैं, वैसे ही आत्मा में जगत् अनन्यरूप है । जैसे शिला के ऊपर शंख-चक्रादिक