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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 933, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 933

✽ निर्वाण प्रकरण ✽ १२३

में है, आत्मा में भिन्न नहीं। जैसे शिला में जो पुतली बनी होती है, उसका उदय-अस्त नहीं होता, शिला ज्यों की त्यों रहती है, वैसे ही आत्मा में जगत् का उदय-अस्त नहीं होता; क्योंकि वास्तव में वह कुछ नहीं है। आत्मा में द्वैतकल्पना अज्ञान से होती है, और जब बोध होता है, तब शान्त हो जाती है। जैसे समुद्र में पड़ी जल की बूंद समुद्ररूप हो जाती है, वैसे ही बोध से कल्पना आत्मा में लीन हो जाती है।

हे राम ! चैतन्यआत्मा अनन्त है। उसमें कोई विकार और कल्पना नहीं है, पर अज्ञान से कल्पना उदित होती है और ज्ञान से लीन हो जाती है। विकार भी आत्मा के आश्रय से प्रतीत होते हैं, पर आत्मा विकार से रहित है। ब्रह्म से विकार उत्पन्न होते हैं और ब्रह्म ही में स्थित हैं, पर वास्तव में कुछ नहीं होता—सब आभासमात्र है। जैसे किरणों में जलाभास होता है, वैसे ही ब्रह्म में जगत्-विकार का आभास होता है। जैसे बीज में पत्र, डाल, फूल और फल का विस्तार होता है और बीजसत्ता सबमें मिली होती है, बीज से कुछ भिन्न नहीं होता, वैसे ही चिद्घन आत्मा के भीतर जगत् का जो विस्तार है, वह चिद्घन आत्मा से भिन्न नहीं; वही अपने आपमें स्थित है और जगत् भी उसी का रूप है। यदि एक मानिये तो द्वैत भी होता है और यदि एक नहीं कहा जाता तो द्वैत कहाँ हो ? जगत् और आत्मा में कुछ भेद नहीं; अद्वैत आत्मा ही अपने आपमें स्थित है। जैसे शिला में लिखी मूर्ति शिलारूप होती है, वैसे ही जगत् आत्मरूप है। और जैसे शिला में भिन्न-भिन्न विषम मूर्तियाँ होती हैं और आधाररूप शिला भिन्न है, वैसे ही आत्मा में जगन्मूर्ति भिन्न-भिन्न विषमरूप भासती है और उसका चैतन्यरूप आधार अभिन्न है, ब्रह्मसत्ता समान सुषुप्तवत् समवस्थित है। उसमें बड़े विकार भी देख पड़ते हैं, परन्तु वास्तव में वह सुषुप्तवत् विकार से रहित है। फुरने से रहित चैतन्यरूप शिला नित्य शान्त चिद्घनरूप सत्ता है, उसी में यह जगत् कल्पित है। अधिष्ठान सत्ता सर्वदा शान्तरूप है। उसमें भेद कदापि नहीं। जैसे