योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें❊ निर्वाण प्रकरण ❊ १२६
को कभी नहीं प्राप्त होता। राम ने पूछा, हे भगवन्! जब एकतत्त्व विद्यमान और ब्रह्म सर्वदा निर्मलरूप है तो उस संवित् ब्रह्म में यह अविद्या कहाँ से आई? वशिष्ठजी बोले, हे राम यह सब ब्रह्म है; आगे भी ब्रह्म था और पीछे भी ब्रह्म होगा। उस निर्विकार और आदि, अन्त, मध्य से रहित ब्रह्म में अविद्या कभी नहीं रहती, यह निश्चय है। जो वाच्य-वाचक शब्द से उपदेश के निमित्त ब्रह्म कहता है, उसमें अविद्या कहाँ है? हे राम! 'अहं' 'त्वं' आदिक जगत् भ्रम और अग्नि, वायु आदिक सब ब्रह्मसत्ता है, अविद्या रञ्चकमात्र नहीं। जिसका नाम ही अविद्या है, उसे भ्रममात्र और असत जानो। जो विद्यमान ही नहीं, उसका नाम क्या कहिये?
फिर रामजी ने पूछा, हे भगवन्! उपशम प्रकरण में आपने क्यों कहा था कि अविद्या है और अब कैसे कहते हो कि वह विद्यमान नहीं है। वशिष्ठजी बोले, हे राम! इतने काल तक तुम अबोध थे, इस निमित्त मैंने तुम्हें जगाने के निमित्त युक्ति कल्पना कर वैसा कहा था और अब तुम प्रबुद्ध हुए हो, इसलिए मैंने कहा कि अविद्या अविद्यमान है।
हे राम! अविद्या, जीव और जगत् आदिक का क्रम अप्रबुद्ध को जगाने के निमित्त वेदवादियों ने वर्णन किया है। जब तक मन अप्रबुद्ध होता है, तब तक अविद्या का भ्रम बना रहता है और युक्ति के बिना अनेक उपायों से भी उसे बोध नहीं होता। जब बोधवान् होता है, तब सिद्धान्त को उपदेश की युक्ति के बिना भी पाता है। पर अबोध मन युक्ति के बिना नहीं पा सकता। हे राम! जो कार्य युक्ति से सिद्ध होता है, वह और यत्न से नहीं सिद्ध होता। जैसे युक्तिरूपी दीपक से अन्धकार दूर होता है, और बल यत्न से नहीं निवृत्त होता, वैसे ही युक्ति के बिना अन्य यत्न से अज्ञान की निद्रा निवृत्त नहीं होती। यदि अप्रबुद्ध को सर्वब्रह्म सिद्धान्त का उपदेश कीजिये तो वह उपदेश व्यर्थ होता है। जैसे कोई दुःखी अपना दुःख दीवाल के आगे जाकर कहे तो उसका कहा वह नहीं सुनती और उसका कहना वृथा होता है, वैसे ही अप्र-