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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 938, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 938

१२८ ✤ योगवाशिष्ठ ✤

स्पर्श नहीं करते, वैसे ही तुमको कर्म स्पर्श न करेंगे। यह काल, क्रिया, कारण, कार्य, जन्म, स्थिति, संहार आदि संसरणरूप संसार सब ब्रह्म रूप है—इसी दृष्टि का आश्रय ग्रहण करके विचरो।

इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे ब्रह्मेकताप्रतिपादनं नाम सप्तचत्वारिंशत्तमस्सर्गः ॥ ४७ ॥

राम ने पूछा, हे भगवन् ! यदि ब्रह्म में कोई विकार नहीं तो भाव-अभावरूप जगत कैसे भासित होता है ? वशिष्टजी बोले, हे राम ! प्रथम तो यह सुनो कि विकार किसको कहते हैं। वस्तु अपने पूर्वरूप को त्यागकर विपरीत रूप को प्राप्त हो और फिर पूर्व के स्वरूप को न प्राप्त हो, उसको विकार कहते हैं। जैसे दूध से दही होकर फिर दूध नहीं होता, जैसे बालक अवस्था बीत जाती है तो फिर नहीं आती और जैसे युवा अवस्था गई हुई फिर नहीं आती; इसका नाम विकार है। परब्रह्म निर्मल है। आदि में निर्विकार है, अन्त में भी निर्विकार है। मध्य में जो उसमें कुछ विकार या मल भासित होता है, उसका मूल अज्ञान है। मध्य में भी ब्रह्म ज्यों का त्यों अविकारी है। हे राम! जो पदार्थ विपर्ययरूप हो जाता है, वह फिर अपने रूप को नहीं प्राप्त होता। ब्रह्मसत्ता सदा ज्यों की त्यों अद्वैतरूप है और आत्मानुभव से प्रकाशित होती है। जो कभी अन्यथारूप को प्राप्त न हो, उसको विकार कैसे कहिये ? हे राम ! जो वस्तु विचार और ज्ञान से निवृत्त हो जाय, उसको भ्रममात्र जानिये। वह वास्तव में कुछ नहीं। जो कुछ विकार है, वह अज्ञान से भासित होता है और जब आत्मबोध होता है तब निवृत्त हो जाता है। जिसके बोध से विकार नष्ट हो जाय, उसे विकार कैसे कहिये ? ब्रह्म शब्द से जिसका निरूपण होता है, वह निद्वैतरूप आत्मा है। जो आदि अन्त में सत् हो, उसे मध्य में भी सत् जानिये। जो इससे भिन्न हो, उसे अज्ञान जानिये। आत्मरूप सदा सर्वदा समरूप है। आकाश और पवन भी अन्यभाव को प्राप्त हो जाते हैं, परन्तु आत्मतत्त्व कदापि अन्यभाव को नहीं प्राप्त होता। वह तो प्रकाशरूप एक नित्य और निर्विकार ईश्वर है; भाव अभाव विकार