योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 937, कुल 1734 में से
संदर्भ में पढ़ें☸ निर्वाण प्रकरण ☸ १२७
से रहित चित्र की मूर्ति में निश्चल शान्तरूप स्थित होते हैं। हे राम! जब चित्तकला फुरती है, तब संसारभ्रम प्राप्त होता है और जब चित्त का फुरना मिट जाता है तब शान्तरूप अद्वैत स्थित होता है। जैसे युद्ध राजा की सेना करती है और जीत-हार राजा की होती है, वैसे ही चित्त के स्फुरण द्वारा आत्मा में बन्धन व मोक्ष होता है। यद्यपि आत्मा समरूप और अच्युत है, तथापि मन, बुद्धि और अन्तः-करण के द्वारा आत्मा में बन्धन व मोक्ष भानित होता है। आत्मा सबका प्रकाशक है—जैसे चन्द्रमा की चाँदनी वृक्षादि को प्रकाशित करती है, वैसे ही आत्मा सब पदार्थों को प्रकाशित करता है।
वह आत्मा न दृश्य है, न उपदेश का विषय है, न विस्ताररूप है, न दूर है; केवल चैतन्यरूप अनुभव आत्मा है। वह न देह है, न इन्द्रिय है, न गुण है, न चित्त है, न वासना है, न जीव है, न स्पन्दन है, न और को स्पर्श करता है। न आकाश है, न सत् है, न असत् है, न मध्य है, न शून्य है, न अशून्य है, न देश, काल, वस्तु है, न यह है, न इतर इत्यादिक है। वह सब शब्दों से परे और केवल अनुभव गम्य है। उसका न आदि है, न अन्त है। न उसे शस्त्र काट सकते हैं, न अग्नि जला सकती है, न जल गला सकता है। न यह है, न वह है। न उसे वायु सोख सकती है और न किसी की सामर्थ्य उस पर चलती है। वह चित्तरूपी आत्मतत्त्व न जन्मता है और न मरता है। देहरूपी घट अनेक बार उपजते हैं और अनेक बार नष्ट होते हैं। आत्मारूपी आकाश सबके भीतर-बाहर अखण्ड अविनाशी है। जैसे अनेक घटों में एक ही आकाश स्थित होता है, वैसे ही अनेक पदार्थों में एकही ब्रह्मसत्ता आत्मरूप से स्थित है।
हे राम! जो कुछ स्थावर-जङ्गम जगत देख पड़ता है सो सब ब्रह्मरूप है। ब्रह्म निर्धर्म, निर्गुण, निरवयव, निराकार, निर्मल, निर्विकार, आदि-अन्त से रहित, सम और शान्तरूप है—ऐसी दृष्टि का आश्रय लेकर स्थित होओ। हे राम! इस दृष्टि का आश्रय ग्रहण करोगे तो बड़े-बड़े कर्म भी तुमको स्पर्श न करेंगे। जैसे आकाश को बादल