योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
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प्राप्त होकर नानारूप होने पर भी एकरूप है, वैसे ही यह जगत् जब परमात्मा में भासित होता है तब भी परमात्मा ही है और जब नानारूप प्रतीत होता है, तब भी भिन्न नहीं है, परिणाम को नहीं प्राप्त हुआ. परन्तु अज्ञानी को नानात्व भासित होता है और ज्ञानी को एकरुपता ही भासित होती है । अथवा इस दृष्टान्त का दूसरा अर्थ यह है कि जैसे मोर के अण्डे में नानात्व कुछ नहीं हुआ, पर जिनकी दुर्दृष्टि है, उसे उसमें अनउपजा नानात्व भासित होता है और जिनकी दुर्दृष्टि नहीं, उसमें बीज ही भासित होता है, नानात्व नहीं भासता, वैसे ही जिनको अज्ञानरूपी दुर्दृष्टि है उनको अनउपजा ही जगत् नानात्वयुक्त देख पड़ता है और जो ज्ञान-दृष्टि से युक्त हैं, उनको एक ही ब्रह्म दिखता है और कुछ नहीं । हे राम ! नानात्व जब भासित होता है तब भी वह कुछ नहीं है । जैसे मोर के अण्डे में नानारङ्ग होने पर भी वह एकरूप है, वैसे ही इस जगत् में भिन्न-भिन्न पदार्थ भासित होने पर भी एक ब्रह्मसत्ता है; इत कुछ नहीं ।
इति श्रीयोगवासिष्ठे निर्वाणप्रकरणे महाउपदेशो नाम षट्चत्वारिंशत्तमस्सर्गः ॥ ४६ ॥
वशिष्ठजी बोले, हे राम ! जैसे अनउपजे रङ्ग जो मयूर के अण्डे में होते हैं, वे बीज से भिन्न कुछ नहीं, वैसे ही अहं-त्व आदि जगत् आत्मा में असत् होकर भी प्रतीत होता है । जैसे बीज में उन रङ्गों का उदय भी अनुदयरूप है, वैसे ही आत्मा में जगत् का उदय भी अनुदय-रूप है । आत्मसत्ता अनिर्वचनीय अशब्द पद है, वाणी से उसका वर्णन नहीं हो सकता । ऐसा सुख स्वर्ग तथा और किसी स्थान में भी नहीं है जैसा सुख आत्मा में स्थित होकर पाया जाता है । हे राम ! आत्मसुख में विश्रान्ति पाने के निमित्त मुनीश्वर, देवता, सिद्ध और महाऋषि दृश्य-दर्शन का सम्बन्ध जानने को त्यागकर स्थित होते हैं, इससे वह उत्तम सुख है । संवित् में संवेदन का फुरना जिनका निवृत्त हुआ है, उन पुरुषों का कोई दृश्यभावना नहीं रहती और न कोई कर्म उनको स्पर्श करता है । प्राण भी उनके निःस्पन्द होते हैं । वे निजचेतन के सम्बन्ध