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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 940, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 940

१३० ❊ योगवाशिष्ठ ❊

वृद्ध को सर्व-ब्रह्म का उपदेश व्यर्थ होता है । मूढ़ युक्ति मे जगता है और बोधवान् को प्रत्यक्ष तत्त्व का उपदेश होता है । हे रामजी ! अब तुम यह धारणा करो कि ब्रह्म, तीनों जगत् और अहं, त्वं आदिक सब ब्रह्म हैं, द्वैत कल्पना कोई नहीं । फिर जो तुम्हारी इच्छा हो सो करो, दृश्य-संवेदन न होगा, सदा आत्मा में स्थित रहोगे । इस प्रकार अनेक कर्मों में भी लिप्त न होगे ।

हे राम ! चैतन्यतत्त्व परमात्मा प्रकाशरूप है । वह सदा अहंभाव मे स्फुरित होता है । ऐसा जो अनुभवरूप है उसी में चलते, बैठते, सोते, पीते, चेष्टा करते स्थित रहो, तब तुम्हारा अहं-ममभाव निवृत्त हो जायगा । सब प्राणियों में स्थित शान्तरूप ब्रह्म को तुम प्राप्त होगे और आदि-अन्त से रहित शुद्ध संवित्मात्र प्रकाशरूप आत्मा को देखोगे । जैसे मृत्तिका के पात्र घट आदि सबमृत्तिका के ही हैं, वैसे ही तुम सब प्राणियों में आत्मा को देखोगे । जैसे मृत्तिका से घट भिन्न नहीं, वैसे ही आत्मा से जगत् भी भिन्न नहीं । जैसे वायु से स्पन्दन और जल से तरङ्ग भिन्न नहीं, वैसे ही आत्मा से प्रकृति भिन्न नहीं । जैसे जल और तरङ्ग शब्दमात्र से दो हैं, वैसे ही आत्मा और प्रकृति शब्दमात्र से दो हैं, पर भेद कुछ नहीं । केवल अज्ञान से भेद दिखता है और ज्ञान से नष्ट हो जाता है । जैसे रम्मी में सर्प दिखता है, वैसे ही आत्मा में प्रकृति है । हे राम ! चित्त वृक्ष है और कल्पना बीज । जब कल्पनारूपी बीज बोया जाता है, तब चित्तरूपी अंकुर उत्पन्न होता है और उसमे जब भावरूप संसार उत्पन्न होता है, तब आत्मज्ञान की अग्नि कल्पनारूपी बीज दग्ध और चित्तरूपी अंकुर नष्ट हो जाता है । हे राम ! चित्तरूपी अंकुर से सुख दुःखरूपी वृक्ष उत्पन्न होता है । जब चित्तरूपी अंकुर नष्ट हो, तब सुख-दुःखरूपी वृक्ष कहाँ उपजे ? हे राम ! जो कुछ द्वैतभ्रम है सो अबोध में उपजता और बोध में नष्ट हो जाता है । आत्मा जो परमार्थ सार है, उसकी भावना करो, तब संसारभ्रम से मुक्त होगे ।

इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे स्मृतिविचारयोगो नामाष्ट-चत्वारिंशत्तमस्सर्गः ॥ ४८ ॥

योगवाशिष्ठ महारामायण · पृष्ठ 940, कुल 1734 में से · BharatKosha