योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें❊ निर्वाण प्रकरण ❊ १३१
राम ने पूछा, हे मुनीश्वर ! जो कुछ जानने योग्य था सो मैंने जाना और जो कुछ देखने योग्य था सो देखा। अब मैं आपके ज्ञानरूपी अमृत से सिंचकर परमपद में पूर्णात्मा हुआ हूँ। हे मुनीश्वर ! यह अब मुझको अनुभव हुआ है कि पूर्ण ने सब विश्व पूर्ण किया है, पूर्ण में पूर्ण प्रतीत है और पूर्ण में पूर्ण ही स्थित है—द्वैत कुछ नहीं। हे मुनीश्वर ! ऐसा जानकर भी मैं लीला और बोध की वृद्धि के निमित्त आपसे पूछता हूँ। जैसे बालक पिता से पूछता है तो पिता बुरा नहीं मानता, वैसे ही आप रुष्ट न होना। हे मुनीश्वर ! श्रवण, नेत्र, त्वचा, रसना और घ्राण, ये पाँचों इन्द्रियाँ प्रत्यक्ष देख पड़ती हैं, पर मरे पर विषय को क्यों नहीं ग्रहण करतीं और जीवित रहने पर कैसे ग्रहण करती हैं ? घटादिक की तरह बाहर से ये जड़ हैं, फिर हृदय में अनुभव कैसे होता है ? और लोहे की शलाका की तरह ये भिन्न-भिन्न हैं, फिर इकट्ठी कैसे हुई हैं ? परस्पर जो एक आत्मा में अनुभव होता है कि मैं देखता हूँ, मैं सुनता हूँ, ये वृत्तियाँ क्योंकर इकट्ठी हुई हैं ? मैं सामान्यभाव से जानता भी हूँ, परन्तु विशेष रूप से आपसे पूछता हूँ।
वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! इन्द्रियाँ, चित्त और घट, पट आदि पदार्थ निर्मल चैतन्यरूप आत्मा से भिन्न नहीं हैं। वह आत्मतत्त्व आकाश से भी सूक्ष्म और स्वच्छ है। हे राम ! जब चैतन्यतत्त्व से पुर्यष्टका (चित्त) की भावना निकली तो उसने आगे इन्द्रियगण को देखा। इन्द्रियगण चित्त से पहले हुए हैं। इनकी घनता से चैतन्यतत्त्व पुर्यष्टका को प्राप्त हुआ है। उसी में सब घटादिक पदार्थ प्रतिबिम्बित हुए हैं और पुर्यष्टका में भानमान हैं। राम ने पूछा, हे मुनीश्वर ! जिसने अनन्त जगत् रचे हैं, जो महाआदर्श में प्रतिबिम्बित हैं, पुर्यष्टका का रूप क्या है, और कैसे हुई ? वशिष्ठजी बोले, हे राम ! आदि-अन्त से रहित जगत् का बीजरूप जो अनादि ब्रह्म है, वह निरामय और प्रकाशरूप है वही अनादि ब्रह्म कल्पना और कलना से रहित, शुद्ध, चिन्मात्र और अचेतन जगत् का बीज है। वह जब कलना के सम्मुख हुआ, तब उसका नाम जीव हुआ। उस जीव ने जब देह को ग्रहण