योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१३२ योगवाशिष्ठ
किया और अहंभाव उपजा, तब अहंकार हुआ। वह जब मनन करने लगा, तब मन हुआ। जब निश्चय करने लगा, तब बुद्धि हुई। जब पदार्थों के देखनेवाली इन्द्रियों की भावना हुई, तब इन्द्रियाँ हुई। जब देह की भावना करने लगा, तब देह हुई। जब घट-पट की भावना हुई, तब घट-पट हुए। इसी प्रकार जैसी-जैसी भावना होती गई, वैसे ही पदार्थ होते गये। हे राम! यही जिसका स्वभाव है, उसे पुर्यष्टका कहते हैं। स्वरूप से विपर्ययरूपी दृश्य की ओर भावना होने से और चित्तकलना से हुए कर्तृत्व, भोक्तृत्व, सुख, दुःख आदि की भावना, कल्पना और अभिमान से उसको जीव कहते हैं।
निदान जैसी-जैसी भावना का आकार हुआ वैसे ही वैसी वासना वह करता गया। जैसे जल में सींचा हुआ बीज डाल, पत्ते, फूल और फल के रूप को प्राप्त होता है, वैसे ही वासना से सींचा हुआ जीव स्वरूप के प्रमाद से महाभ्रमजाल में गिरता है और जानता है कि मैं मनुष्य-देह सहित हूँ अथवा देवता या स्थावर हूँ, पर यह नहीं जानता कि मैं चिदात्मा हूँ। वह अपने को देह में मिला हुआ परिच्छिन्न और तुच्छरूप देखता है। इस मिथ्याज्ञान में डूबता है और देहाभिमान में वासना के वश चिरकाल पर्यन्त ऊँचे, नीचे और बीच में भ्रमता है। जैसे समुद्र में आया हुआ काष्ठ तरङ्गों में उछलता है। और घटीयन्त्र का लंगर नीचे ऊपर जाता है, वैसे ही जीव वासना के वश हो नीचे और ऊपर भ्रमता है। जब विचार और अभ्यास करके आत्मबोध को प्राप्त होता है, तब संसार-बन्धन से मुक्त होकर आदि-अन्त से रहित आत्मपद को प्राप्त होता है। बहुत काल तक योनिरेखा का भोग कर फिर आत्म-ज्ञान से परमपद को प्राप्त होता है। हे राम! स्वरूप से गिरे हुए जीव इस प्रकार भ्रमते और शरीर पाते हैं। अब वह सुनो कि इन्द्रियाँ मृतक होने पर विषयों को क्यों नहीं ग्रहण करतीं। हे राम! जब शुद्धतत्त्व में चित्तकलना उठती है, तब वह जीवरूपी होती है और मन सहित षड्इन्द्रियों को लेकर देहरूपी गृह में स्थित हो बाहर के विषयों को ग्रहण करती है। मन सहित षड्इन्द्रियों में सम्बन्ध से विषय का ग्रहण