योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
❇ निर्वाण प्रकरण ❇ ११५
अपनी सृष्टि को देश या काल रोक नहीं सकता। क्योंकि और जगह इनका सद्भाव नहीं है, इससे यह जगत् अपने-अपने काल में सन्रूप है। आत्मा में सद्भाव नहीं, वह संकल्परूप है। हे मुनीश्वर ! जैसे आदि तत्त्व से जीव ईश्वर निकले हैं, वैसे ही कर्म भी रुद्र से लेकर वृक्ष तक सब एक क्षण में उर्मी तत्त्व मे निकल आये हैं। सुमेरु आदि भी अपनी स्थिति में अपने को रोकते हैं, अन्य अणु को भी नहीं रोक सकते; क्योंकि वहाँ अस्तित्व है ही नहीं। इस कारण आत्मा में सृष्टि आभास-रूप है। हे मुनीश्वर ! इस प्रकार सब जगत् मायामात्र है और भावना से भासित होता है। जब आत्मा का अभ्यास होता है, तब भेदकल्पना मिट जाती है और केवल उपशमरूप शिवतत्त्व भासित होता है।
हे मुनीश्वर ! निमेष का जो शत भाग है उसका अर्द्धभाग प्रमाद होने मे नाना प्रकार का जगत् प्रकट भासित होता है। सत्-अमतरूप जगत् मनरूपी विश्वकर्मा बनाता है। आत्मतत्त्व न दूर है, न निकट है, न नीचे है, न ऊपर है, न पूर्व में है और न पश्चिम में है। सत्-असत् के मध्य वह अनुभवरूप सर्वज्ञ है। उसको प्रत्यक्ष आदिक प्रमाण अपना विषय नहीं बना सकते—जैसे जल मे अग्नि नहीं निकलती। हे मुनीश्वर ! जो कुछ तुमने पूछा था सो मैंने कहा। उसमें चित्त लगाने मे तुम्हारा कल्याण न होगा। इतना कह सदाशिव बोले कि अब हम अपने वाञ्छित स्थान को जाते हैं। चलो पार्वती, अपने स्थान को चलें।
इतना कहकर वशिष्ठजी बोले, हे राम ! जब इस प्रकार ईश्वर ने कहा, तब मैंने अर्ध्य-पाद्य से पूजन किया और ईश्वर भी पार्वती और गणों को लेकर आकाशमार्ग को चले। जब तक मुझको देख पड़ते रहे, तब तक मैं उनकी ओर देखता रहा। फिर अपने स्थान में कुशासन पर आकर बैठा और जो कुछ ईश्वर ने उपदेश किया था, वह मैं अपने मन में विचारने लगा।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे परमार्थविचारो नामैकचत्वारिंशत्तमस्सर्गः ॥ ४१ ॥
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वशिष्ठजी बोले, हे राम! जो कुछ ईश्वर ने मुझसे कहा सो में आप भी जानता था और तुम भी जानते हो। यह जगत् भी असत् है और देखनेवाला भी असत् है। इस मायारूप जगत् में में तुमसे सत क्या कहूँ और असत् क्या कहूँ? जैसे जल में द्रवता है, वैसे ही आत्मा में जगत् है। जैसे पवन में स्पन्दन और आकाश में शून्यता है, वैसे ही आत्मा में जगत् है। हे राम! जो कुछ पतित प्रवाह से प्राप्त होता है, उर्मी में से देवअर्चन करना है। इस क्रम से मैं निर्यामानिक हूँ और जगत् की क्रिया से में दुःख-हीन होकर चेष्टा करता हूँ। व्यवहार करता देख पड़ता हूँ, तो भी शान्तरूप हूँ और यथाप्राप्त आचाररूपी फूल से आत्म-देव की अर्चना करता हूँ, मुझको खेद-भेद कोई नहीं होता। हे राम! विषयों और इन्द्रियों का सम्बन्ध सब जीवों को बराबर है, पर जो ज्ञान-वान् हैं, वे सावधान रहते हैं और जो कुछ देखते, सुनते, बोलते, खाते, सूँघते और स्पर्श करते हैं, उसमें आत्मतत्त्व का अर्चन करते हैं और अपने को आत्मा से भिन्न नहीं जानते। अज्ञानियों को कर्तृत्व-भोक्तृत्व का अभिमान होता है और उससे वे दुःखी होते हैं।
हे राम! तुम भी ऐसी दृष्टि का आश्रय लेकर संसाररूपी वन में निःसंग होकर विचरो तो तुमको कुछ खेद न होगा। जिसकी वृत्ति इस प्रकार समान हो गई है, उसको चाहे बड़ा कष्ट प्राप्त हो, चाहे धन और बान्धवों का वियोग हो, तो भी उसको खेद नहीं होता। यह जो दृष्टि मैंने तुमसे कही है, उसका जब आश्रय ग्रहण करोगे, तब तुमको कोई दुःख न होगा। हे राम! सुख, दुःख, धन और बान्धवों का वियोग, ये सब पदार्थ अनित्य हैं। ये आते भी हैं और जाते भी हैं। इनको 'आगमापायी' जानकर विचरो। यह संसार विषमरूप है, एकरस कभी नहीं रहता। इसको स्थिर या सत् जानकर दुःखी न होना। हे राम! पदार्थ और काल जैसे जाय तैसे जाय और जैसे सुख-दुःख आवें तैसे आवें ये सब आगमापायी पदार्थ हैं, अर्थात् आते भी हैं और जाते भी हैं। इष्ट की प्राप्ति और अनिष्ट की निवृत्ति में हर्षित न होना अनिष्ट की प्राप्ति और इष्ट के वियोग में खिन्न न होना। जैसे जो आपे-
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उसे निर्लिप्त रहकर भोग करो। जिसका आना है वह आवेगा और जिसको जाना है वह जावेगा। ये सुख-दुख प्रवाहरूप हैं। इनमें आस्था करके संतप्त न होना। हे राम! यह सब जगत् तुम्हीं हो और तुम्हीं जगतरूप हो। चिन्मात्र विस्तृत आकार भी तुम्हीं हो। जब सब तुम्हीं हो, तब हर्ष या शोक किस लिए करते हो? इसी दृष्टि का आश्रय करके जगत् में सुषुप्त होकर विचरो तो तुर्यातीत अवस्था को प्राप्त होगे, जो सब प्रकाशरूप है। हे राम! जो कुछ मुझे तुमसे कहना था सो कहा है, आगे जो तुम्हारी इच्छा हो सो करो। पीछे तुमने पूछा था कि अनन्तरूप ब्रह्म में कलङ्क कैसे प्राप्त हुआ है? सो अब फिर प्रश्न करो कि मैं उत्तर दूँ।
रामजी ने कहा, हे ब्रह्मन्! अब मुझको कुछ संशय नहीं रहा; मेरे सब संशय नष्ट हो गये हैं और जो कुछ जानना था सो मैंने जान लिया। अब मैं परम अकृत्रिम तृप्ति को प्राप्त हुआ हूँ। हे मुनीश्वर! आत्मा में न मेल है, न द्वैत है और न एक दो आदि की कोई कल्पना है। पहिले मुझमें अज्ञान था तब मैंने पूछा था; अब तुम्हारे वचनों से मेरा अज्ञान नष्ट हो गया है, इसमें कुछ दोष नहीं भासित होता। आत्मा को न जन्म है, न मरण है। सब ब्रह्म ही है। हे मुनीश्वर! प्रश्न संशय से उपजता है, सो मेरा संशय नष्ट हो गया है। जैसे यन्त्री की कठपुतली न हिलाने से अचल होती है, वैसे ही संशय से रहित मेरा मन स्थिर निश्चल हो गया है। सब मार्गों का सार मुझको प्राप्त हुआ है। जैसे सुमेरु अचल है, वैसे ही मैं अचल हूँ। मुझको कोई क्षोभ नहीं। ऐसा कोई पदार्थ नहीं, जो मेरे लिए त्यागने योग्य हो और ऐसा भी कोई पदार्थ नहीं, जो ग्रहण करने योग्य हो। किसी पदार्थ की मुझको न इच्छा है, न अनिच्छा। मैं शान्तरूप स्थित हूँ। न स्वर्ग की मुझको इच्छा है, न नरक से द्वेष है। सब ब्रह्मरूप मुझको भासित होता है। मन्दराचल पर्वत की तरह मैं आत्मतत्त्व में स्थित हूँ।
हे मुनीश्वर! जिसको अवस्तु में वस्तु-बुद्धि होती है और हृदय में कल्पना स्थित होती है, वह किसी को ग्रहण करता है; किसी का
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त्याग करता है और दीनता को प्राप्त होता है । हे मुनीश्वर ! यह संसार महासमुद्ररूप है । उसमें राग द्वेषरूपी लहरें हैं और शुभ-अशुभ-रूपी मच्छ रहते हैं । ऐसे भयानक संसारसमुद्र में अब मैं आपके प्रसाद से तर गया हूँ और परम-परम सम्पदा को प्राप्त होकर मेरे दुःख नष्ट हो गये हैं । सबके सार को प्राप्त होकर में पूर्ण आत्मा हूँ । अदीन पद और परम शान्त अभेदसत्ता मुझे मिल गई है । आशारूपी हाथी को मैंने सिंह बनकर मारा है । अब मुझको आत्मा से भिन्न कुछ नहीं देख पड़ता । मेरे सब विकल्प-जाल कट गये हैं, इच्छादिक विकार नष्ट हो गये हैं और दीनता जाती रही है । तीनों जगत में मेरी जय है और में सदा उदितरूप हूँ ।
इति श्रीयोगवाशिष्टे निर्वाणप्रकरणे विश्रान्ति आगमनं नाम द्विचत्वारिंशत्तमस्सर्गः ॥ ४२ ॥
वशिष्ठजी बोले, हे राम ! जो केवल देह और इन्द्रियों से करता है और मन से नहीं करता, वह जो कुछ करता है सो कुछ नहीं करता । जो कुछ इन्द्रियों से दृष्ट मान होता है, उससे अणुमात्र सुख प्राप्त होता है । उस अणुमात्र की प्रसन्नता में जो बँध जाता है, वह बालबुद्धि मूर्ख है । जो ज्ञानवान् है, वह उसमें कभी नहीं बँधता । हे राम ! वाञ्छा ही इसको दुःखी करती है । सुन्दर विषयों की वाञ्छा होने पर जब जीव यत्न से उनको प्राप्त करता है, तब क्षणभर सुख होता है और जब उनका वियोग होता है, तब दुःखी होता है । इस कारण इन विषयों की वाञ्छा त्यागना ही उचित है । इनकी वाञ्छा तब होती है, जब स्वरूप का ज्ञान नहीं होता और देहादिक में अहंभाव होता है । जब देहादिक में अहंभाव होता है, तब अनेक अनर्थ उपस्थित होते हैं । इससे हे राम ! ज्ञानरूपी पर्वत पर चढ़ रहना और अहंतारूपी गढ़े में न गिरना । हे राम ! आत्मज्ञानरूपी सुमेरु पर्वत पर चढ़कर फिर अहंता ( अभिमान ) के गढ़े में गिरना बड़ी मूर्खता है । जब दृश्यभाव को त्यागोगे, तब अपनी स्वभावसत्ता को प्राप्त होगे । यह राम और
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शान्तरूप है और उससे विकल्पजाल सब मिट जायगा । तब समुद्र की तरह पूर्ण होगे और द्वैतरूप न प्रतीत होगा ।
हे राम ! जब हृदय में विषय को विष जाने, तब मन भी नीरस हो जाता है और चित्त निम्मग्न होता है । वास्तव में देखो तो सबमें सत्ता ब्रह्म चिद्धन समानरूप से स्थित है, पर अद्वैतस्वरूप के प्रमाद से वह नहीं भासित होता । हे राम ! आत्मा का अज्ञान ही बन्धन और आत्मा का बोध ही मुक्ति है । इससे बलपूर्वक मोह-निद्रा को छोड़ आप ही जागो, तब इस बन्धन से मुक्त होगे । हे राम ! जिसमें विषय का स्वाद नहीं और जिसमें आत्म तत्त्व का अनुभव होता है, वह आकाश-सदृश निर्मल सत्ता वासना से रहित है । वासना से रहित होकर जो पुरुष कर्म करता है, वह विकार को नहीं प्राप्त होता । यदि अनेक क्षोभ आकर प्राप्त हों तो भी उसको विकार नहीं होता । ज्ञाता, ज्ञान, ज्ञेय, ये तीनों आत्मरूप भासित होते हैं । जब ऐसा ज्ञान होता है, तब किसी का भय नहीं रहता । चित्त के चेतन से जगत् उत्पन्न होता है और चित्त के मिटने पर लीन हो जाता है । जब वासना-सहित प्राण उदय होते हैं, तब जगत् का उदय होता है और जब वासना-सहित प्राण लीन होते हैं, तब जगत् भी लीन हो जाता है । अभ्यास करके वासना और प्राणों को स्थित करो । जब मूर्खता उदय होती है तब कर्म उदय होते हैं और मूर्खता के लीन होने पर कर्म भी लीन होते हैं । इससे मत्संग और मनशास्त्रों के विचार से मूर्खता को नष्ट करो । जैसे वायु के संग में उड़कर धूल बादल का आकार धारण करती है, वैसे ही चित्त के चेतन से जगत् स्थित होता है । हे राम ! जब चित्त-जगता है, तब नाना प्रकार का जगत् प्रकट होता है, और चित्त के न जगने पर जगत् लीन हो जाता है ।
हे राम ! वासना शान्त हो अथवा प्राणों का निरोध हो, तब चित्त अचित्त हो जाता है और जब चित्त अचित्त हुआ तब जीव परमपद को प्राप्त होता है । हे राम ! दृश्य और दर्शन सम्बन्ध के बीच में जो परमात्मसुख और एकान्तसुख है, वह संवित् ब्रह्मरूप है । उसका
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साक्षात्कार होने पर मन का क्षय हो जाता है। जहाँ चित्त नहीं उपजता, वह जो चित्त से रहित अकृत्रिम सुख है। ऐसा सुख स्वर्ग में भी नहीं होता जैसे मरुस्थल में वृक्ष नहीं होते, वैसे ही चित्त-सहित विषयों में सुख नहीं होता। चित्त के उपशम में जो सुख है, वह वाणी से कहा नहीं जा सकता। उसके समान या उससे बढ़कर कोई भी सुख नहीं है। सुख का नाश हो जाता है, पर आत्मसुख का नाश नहीं होता। वह अविनाशी है और उत्पत्ति-विनाश से रहित है। हे राम! अबोध से चित्त का उदय होता है और आत्मबोध में वह शान्त हो जाता है। जैसे मोह से बालक को वेताल दिखाई देता है और मोह के नष्ट होने पर नष्ट हो जाता है, वैसे ही अज्ञान में चित्त का उदय होता है और अज्ञान के नष्ट होने पर वह नष्ट हो जाता है। यदि चित्त विद्यमान भी भासित होता है, तो भी बोध में वह निर्बीज हो जाता है। जैसे पारस से मिल-कर ताँबा सुवर्ण हो जाता है तो उसका आकार तो वही देख पड़ता है, पर ताँबे के भाव का अभाव हो जाता है, वैसे ही अज्ञान से जगत् भासित होता है और ज्ञान में चित्त अचित्त हो जाता है; जड़जगत् नहीं भासित होता, ब्रह्मसत्ता ही भासित होती है और वह सत्पद को प्राप्त होता है, परन्तु नामरूप वैसे ही भासित होते हैं। हे राम! ज्ञानी का चित्त भी कर्म करता देख पड़ता है, परन्तु चित्त अचित्त हो जाता है। जो अज्ञान में भासित होता है, वह ज्ञान में शून्य हो जाता है। जो जगत् अबोध में भासित था, वह बोध में शान्त हो जाता है, फिर नहीं उपजता। वह चित्त शान्तपद को प्राप्त होता है। कुछ समय तक तो वह भी तुरीयावस्था में स्थित विचरता है, पर फिर तुरीयातीतपद को प्राप्त होता है। अधः, ऊर्ध्व, मध्य, सर्वत्र ब्रह्म ही इस प्रकार अनेक होकर स्थित हुआ है। अनेक सम होने पर भी एक ही है और सर्वात्मा ही है—चित्तादिक कुछ नहीं।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे चित्तसत्तासूत्रणन्नाम त्रिचत्वारिंशत्तमस्सर्गः ॥ ४३ ॥
वशिष्ठजी बोले, हे राम! अब तुम संक्षेप में एक अपूर्व और
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आश्चर्यरूप बोध देनेवाला दृष्टान्त सुनो। एक बेलफल है, जिसका विस्तार अनन्त योजन पर्यन्त है। जिमे अनन्त युग व्यतीत हो गये हैं। पर वह जर्जर कभी नहीं होता। वह अनादि है, उसमें अविनाशी रस है, इसमें कभी नाश नहीं होता। वह चन्द्रमा की तरह सुन्दर है। सुमेरु आदिक जो बड़े पहाड़ हैं उनको महाप्रलय का पवन तृण की तरह उड़ाता है; पर वह पवन भी उसको नहीं हिला सकता। हे राम! योजनों की अनन्त कोटि संख्या है, पर उसकी संख्या नहीं की जा सकती। वह बेलफल ऐसा और बहुत बड़ा है। जैसे सुमेरु के आगे राई का दाना सूक्ष्म और तुच्छ लगता है, वैसे ही उस बेलफल के आगे ब्रह्माण्ड सूक्ष्म और तुच्छ लगता है। वह बेल रस से पूर्ण है, कभी गिरता नहीं और पुरातन है। ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र, इन्द्रादिक भी उसका आदि, अन्त और मध्य नहीं जान सकते। न उसके मूल को कोई जान सकता है, न मध्य को कोई जान सकता है। उसका अदृष्ट आकार है और अदृष्ट फल है। वह अपने प्रकाश से प्रकाशित है। उसका घन आकार है। वह सदा अचल है, किसी विकार को नहीं प्राप्त होता। वह सत्, निर्मल, निर्विकार, निरन्तररूप, नीरन्ध्र और चन्द्रमा की तरह शीतल, सुन्दर है। उसमें ज्ञान-संवित्तरूपी रस है। वह अपना रस आप ही पीता है और सबको देता है। सबका प्रकाशक भी वही है। उसमें अनेक चित्ररेखाओं ने नियम किया है, परन्तु वह अपने स्वरूप को नहीं छोड़ता। अनेकरूपी भासित होता है। उसमें स्पन्दनरूपी रस भरा है। तत्वं, इदं, देश, काल, क्रिया, नीति, राग, द्वेष, हेयोपादेय, भूत, भविष्यत, काल, प्रकाश, तम, विद्या, अविद्या इत्यादि कल्पना-जाल उस रस के चेतने से चेतते हैं। वह बेल आत्मरूप है। उसमें अनुभवरूपी रस है। वह सदा अपने आपमें स्थित और नित्य शान्तरूप है। उसको जानकर पुरुष कृतकृत्य होता है।
इति श्रीयोगवाशिष्टे निर्वाणप्रकरणे बिल्वोपाख्यानं नाम चतुश्चत्वारिंशत्तमस्सर्गः ॥ ४४ ॥
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रामजी बोले, हे भगवन् ! सब धर्मों के जाननेवाले आपने यह वेदरूपी महाद्रुमकी वार्ता कही। सो मुझे ऐसा निश्चय हुआ कि चैतन्य ही अहंनादिक जगत् हो भासित होता है, भेद किञ्चित् भी नहीं एक या द्वैत कल्पना सब व्यर्थ है। वशिष्ठजी बोले, हे राम ! जैसे ब्रह्माण्ड की मञ्जा सुमेरु आदिक पृथ्वी है, वैसे ही चैतन्य वृक्ष की मञ्जा यह ब्रह्माण्ड है। सब जगत् चैतन्य वृक्षरूप है—भिन्न नहीं, और उस चैतन्य का विनाश नहीं हो सकता। हे राम ! चैतन्यरूपी मिर्च के बीज में जो तिक्तरूपी चमत्कार तीक्ष्णता है सो सुषुप्तवत् निर्मल और शिला के अन्तर्वत् अभिश्रित है। हे राम ! अब और आश्चर्यरूप एक आख्यान सुनो। यह सुन्दर प्रकाशयुक्त स्निग्ध और शीतल स्पर्शवाली विस्तृत एक शिला महानीलरत्न और घनरूप है। उसमें कमल उपजते हैं और उसकी ऊर्ध्व बेल है, अधः मूल है और अनेक शाखाएँ हैं। रामजी बोले, हे भगवान् ! सत्य कहते हो, यह शिला मैंने भी देखी है। वह नदी में विष्णु की मूर्ति शालग्राम है। वशिष्ठजी बोले, हे राम ! ऐसे तो तुम जानते हो और तुमने देखा भी है। परन्तु जो शिला में बताता है, वह अपूर्व शिला है, उसके भीतर ब्रह्माण्ड समूह हैं और कुछ भी नहीं। हे राम ! चैतन्यरूपी शिला जो मैंने तुमसे कही है, उसमें सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड हैं। उस घनचैतन्यता से शिला वर्णन की है। वह घनघन और नीरन्ध्र है। आकाश, पृथ्वी, पर्वत, देश, नदियाँ, समुद्र इत्यादि सभी विश्व उस शिला के भीतर स्थित हैं। जैसे शिला के ऊपर जो कमल खिले होते हैं वे शिलारूप हैं, शिला से भिन्न नहीं; वैसे ही यह जगत् आत्मरूपी शिला में है; आत्मा से भिन्न नहीं। हे राम ! भूत, भविष्यत् और वर्तमान, तीनों काल उस शिला की पुतलियाँ हैं। जैसे शिल्पी पुतलियों की कल्पना करता है, वैसे ही यह जगत् आत्मा में है, उपजा नहीं, क्योंकि मनरूपी शिल्पी कल्पना करता है और उसमें नाना प्रकार का जगत् भासित होता है; आत्मा में कुछ उपजा नहीं। जैसे सुषुप्तरूप शिला के ऊपर जो कमल-रचना लिखी होती है, वह शिला से भिन्न नहीं, वैसे ही यह जगत् आत्मा
✽ निर्वाण प्रकरण ✽ १२३
में है, आत्मा में भिन्न नहीं। जैसे शिला में जो पुतली बनी होती है, उसका उदय-अस्त नहीं होता, शिला ज्यों की त्यों रहती है, वैसे ही आत्मा में जगत् का उदय-अस्त नहीं होता; क्योंकि वास्तव में वह कुछ नहीं है। आत्मा में द्वैतकल्पना अज्ञान से होती है, और जब बोध होता है, तब शान्त हो जाती है। जैसे समुद्र में पड़ी जल की बूंद समुद्ररूप हो जाती है, वैसे ही बोध से कल्पना आत्मा में लीन हो जाती है।
हे राम ! चैतन्यआत्मा अनन्त है। उसमें कोई विकार और कल्पना नहीं है, पर अज्ञान से कल्पना उदित होती है और ज्ञान से लीन हो जाती है। विकार भी आत्मा के आश्रय से प्रतीत होते हैं, पर आत्मा विकार से रहित है। ब्रह्म से विकार उत्पन्न होते हैं और ब्रह्म ही में स्थित हैं, पर वास्तव में कुछ नहीं होता—सब आभासमात्र है। जैसे किरणों में जलाभास होता है, वैसे ही ब्रह्म में जगत्-विकार का आभास होता है। जैसे बीज में पत्र, डाल, फूल और फल का विस्तार होता है और बीजसत्ता सबमें मिली होती है, बीज से कुछ भिन्न नहीं होता, वैसे ही चिद्घन आत्मा के भीतर जगत् का जो विस्तार है, वह चिद्घन आत्मा से भिन्न नहीं; वही अपने आपमें स्थित है और जगत् भी उसी का रूप है। यदि एक मानिये तो द्वैत भी होता है और यदि एक नहीं कहा जाता तो द्वैत कहाँ हो ? जगत् और आत्मा में कुछ भेद नहीं; अद्वैत आत्मा ही अपने आपमें स्थित है। जैसे शिला में लिखी मूर्ति शिलारूप होती है, वैसे ही जगत् आत्मरूप है। और जैसे शिला में भिन्न-भिन्न विषम मूर्तियाँ होती हैं और आधाररूप शिला भिन्न है, वैसे ही आत्मा में जगन्मूर्ति भिन्न-भिन्न विषमरूप भासती है और उसका चैतन्यरूप आधार अभिन्न है, ब्रह्मसत्ता समान सुषुप्तवत् समवस्थित है। उसमें बड़े विकार भी देख पड़ते हैं, परन्तु वास्तव में वह सुषुप्तवत् विकार से रहित है। फुरने से रहित चैतन्यरूप शिला नित्य शान्त चिद्घनरूप सत्ता है, उसी में यह जगत् कल्पित है। अधिष्ठान सत्ता सर्वदा शान्तरूप है। उसमें भेद कदापि नहीं। जैसे
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जल में तरङ्ग और सुवर्ण में भूषण अभिन्नरूप हैं वैसे आत्मा में जगत् अभिन्नरूप है ।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे शिलाकोशउपदेशोनाम पञ्चचत्वारिंशत्तमसर्गः ॥ ४५ ॥
वशिष्ठजी बोले, हे राम ! बीज के भीतर फूल, फल और सम्पूर्ण वृक्ष होता है । उस वृक्ष का आदि भी बीज है और अन्त भी बीज है । जब फल पकता है, तब बीज भी होता है । वैसे ही आत्मा भी जगत् में है, परन्तु सदा अच्युत और सम है, कभी भेद, विकार और परिणाम को नहीं प्राप्त हुआ, अपनी सत्ता से स्थित है । जगत् के आदि, मध्य, अन्त में वही है, किसी और भाव को नहीं प्राप्त हुआ । देश, काल, कर्म आदि जो कुछ कल्पना भासित होती है, सो वही है । जो कुछ शब्द और अर्थ है, वह आत्मा से भिन्न नहीं । जैसे वृक्ष का आदि भी बीज है और अन्त भी बीज है और मध्य में जो कुछ विस्तार देख पड़ता है, वह भी वही है, भिन्न कुछ नहीं, वैसे जगत् का आदि भी आत्मसत्ता है, अन्त भी आत्मसत्ता है और जो कुछ मध्य में भासित होता है, वह भी वही है । हे राम ! चैतन्यरूपी बड़े दर्पण में सम्पूर्ण जगत् प्रतिबिम्बित होता है । सम्पूर्ण जगत् संकल्प-मात्र है । जैसा-जैसा किसी में इसका स्फुरण दृढ़ होता है, वैसे ही वैसे आत्मसत्ता के आश्रित होकर वह भासित होता है । जैसे चिन्तामणि में जैसा कोई संकल्प रखता है, वैसा ही वह पदार्थ प्रकट होता है, और वह वास्तव में संकल्पमात्र ही होता है, वैसे ही जैसी जैसी भावना कोई करता है, वैसी ही वैसी आत्मा के आश्रय से भासित होता है । अनन्त जगत् आत्मरूपी मणि के आश्रय में स्थित होते हैं । जैसी कोई भावना करता है, वैसी ही उसकी देख पड़ती है । हे राम ! आत्मरूपी सम्पुट में जगतरूपी रत्न निकलते हैं । जैसा स्फुरण होता है, वैसा ही जगत् भासित होता । जैसे शिला के ऊपर रेखाएं होती हैं और उनमें जो नाना प्रकार के चित्र उभरते हैं सो अनन्यरूप हैं, वैसे ही आत्मा में जगत् अनन्यरूप है । जैसे शिला के ऊपर शंख-चक्रादिक
- निर्वाण प्रकरण * १२५
रेखाएँ उभरती हैं, वैसे ही आत्मा में यह जगत् प्रकट है, और वह आत्मा रूप है। आत्मरूपी शिला नीरन्ध्र है, उसमें कोई छिद्र नहीं। जैसे जल में तरङ्ग जलरूप होते हैं तैसे ही ब्रह्म में जगत् ब्रह्मरूप है। वह ब्रह्म सम, शान्तरूप और सुषुप्तवत् स्थित है। उसमें जगत् कुछ उपजा नहीं, वह शिला की रेखाओं सा है। जैसे बेल के भीतर मज्जा होती है, वैसे ही ब्रह्म में जगत् स्थित है। जैसे आकाश में शून्यता, जल में द्रवता और वायु में स्पन्दता होता है, वैसे ही ब्रह्म में जगत् है। ब्रह्म और जगत् में कुछ भेद नहीं। जैसे शाखा और वृक्ष में कुछ भेद नहीं, वैसे ही ब्रह्म और जगत् में कुछ भेद नहीं—ब्रह्म ही जगत् है और जगत् ही ब्रह्म है।
हे राम ! इसमें भाव-अभाव या भेद-कल्पना कोई नहीं। ब्रह्मसत्ता ही प्रकाशती है और ब्रह्म ही जगतरूप होकर देख पड़ता है। जैसे मरुस्थल में सूर्य की किरणें जल के समान चमकती हैं, वैसे ही ब्रह्म जगतरूप होकर दिखता है। हे राम ! सुमेरु आदि पर्वत, तृण, वन और चित्त जगत्-परिणाम से लेकर सब प्राणियों को विभाग देखिये तो सर्वत्र परमसत्ता ही देख पड़ती है और सब पदार्थों में सूक्ष्मभाव से वही सत्ता व्यापी है। जैसे जल का रस वनस्पति में व्यापा हुआ है, वैसे ही सब जगत् में सूक्ष्मरूप से आत्मसत्ता व्यापी हुई है। जैसे एक ही रस-सत्ता, वृक्ष, तृण और गुच्छों में व्यापी हुई है। और एक ही अनेकरूप भासित होती है, वैसे एक ही ब्रह्मसत्ता अनेकरूप भासती है। हे राम ! जैसे मोर के अण्डे में अनेक रङ्ग होते हैं और जब अण्डा फूट जाता है तब उसमें शनैःशनै अनेक रङ्ग प्रकट होते हैं और वह एक ही रस अनेक रूप हो भासित होता है, वैसे एक ही आत्मा अनेकरूप में जगत् के आकार में भासित होती है। जैसे मोर के अण्डे में एक ही रस होता, परन्तु जो दीर्घसूत्री अज्ञानी हैं, उनको भविष्य के अनेक रङ्ग जो उसमें भासित होते हैं सो बिना उपजे ही उपजे भासते हैं, वैसे ही यह जगत् अनउपजा ही अज्ञानी के हृदय में नानात्व युक्त स्थित होता और जो ज्ञानवान् हैं उनको एकरस ब्रह्मसत्ता ही देख पड़ती है। जैसे मोर का रस परिणाम को न प्राप्त होने पर एकरस है, और परिणाम को
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प्राप्त होकर नानारूप होने पर भी एकरूप है, वैसे ही यह जगत् जब परमात्मा में भासित होता है तब भी परमात्मा ही है और जब नानारूप प्रतीत होता है, तब भी भिन्न नहीं है, परिणाम को नहीं प्राप्त हुआ. परन्तु अज्ञानी को नानात्व भासित होता है और ज्ञानी को एकरुपता ही भासित होती है । अथवा इस दृष्टान्त का दूसरा अर्थ यह है कि जैसे मोर के अण्डे में नानात्व कुछ नहीं हुआ, पर जिनकी दुर्दृष्टि है, उसे उसमें अनउपजा नानात्व भासित होता है और जिनकी दुर्दृष्टि नहीं, उसमें बीज ही भासित होता है, नानात्व नहीं भासता, वैसे ही जिनको अज्ञानरूपी दुर्दृष्टि है उनको अनउपजा ही जगत् नानात्वयुक्त देख पड़ता है और जो ज्ञान-दृष्टि से युक्त हैं, उनको एक ही ब्रह्म दिखता है और कुछ नहीं । हे राम ! नानात्व जब भासित होता है तब भी वह कुछ नहीं है । जैसे मोर के अण्डे में नानारङ्ग होने पर भी वह एकरूप है, वैसे ही इस जगत् में भिन्न-भिन्न पदार्थ भासित होने पर भी एक ब्रह्मसत्ता है; इत कुछ नहीं ।
इति श्रीयोगवासिष्ठे निर्वाणप्रकरणे महाउपदेशो नाम षट्चत्वारिंशत्तमस्सर्गः ॥ ४६ ॥
वशिष्ठजी बोले, हे राम ! जैसे अनउपजे रङ्ग जो मयूर के अण्डे में होते हैं, वे बीज से भिन्न कुछ नहीं, वैसे ही अहं-त्व आदि जगत् आत्मा में असत् होकर भी प्रतीत होता है । जैसे बीज में उन रङ्गों का उदय भी अनुदयरूप है, वैसे ही आत्मा में जगत् का उदय भी अनुदय-रूप है । आत्मसत्ता अनिर्वचनीय अशब्द पद है, वाणी से उसका वर्णन नहीं हो सकता । ऐसा सुख स्वर्ग तथा और किसी स्थान में भी नहीं है जैसा सुख आत्मा में स्थित होकर पाया जाता है । हे राम ! आत्मसुख में विश्रान्ति पाने के निमित्त मुनीश्वर, देवता, सिद्ध और महाऋषि दृश्य-दर्शन का सम्बन्ध जानने को त्यागकर स्थित होते हैं, इससे वह उत्तम सुख है । संवित् में संवेदन का फुरना जिनका निवृत्त हुआ है, उन पुरुषों का कोई दृश्यभावना नहीं रहती और न कोई कर्म उनको स्पर्श करता है । प्राण भी उनके निःस्पन्द होते हैं । वे निजचेतन के सम्बन्ध
☸ निर्वाण प्रकरण ☸ १२७
से रहित चित्र की मूर्ति में निश्चल शान्तरूप स्थित होते हैं। हे राम! जब चित्तकला फुरती है, तब संसारभ्रम प्राप्त होता है और जब चित्त का फुरना मिट जाता है तब शान्तरूप अद्वैत स्थित होता है। जैसे युद्ध राजा की सेना करती है और जीत-हार राजा की होती है, वैसे ही चित्त के स्फुरण द्वारा आत्मा में बन्धन व मोक्ष होता है। यद्यपि आत्मा समरूप और अच्युत है, तथापि मन, बुद्धि और अन्तः-करण के द्वारा आत्मा में बन्धन व मोक्ष भानित होता है। आत्मा सबका प्रकाशक है—जैसे चन्द्रमा की चाँदनी वृक्षादि को प्रकाशित करती है, वैसे ही आत्मा सब पदार्थों को प्रकाशित करता है।
वह आत्मा न दृश्य है, न उपदेश का विषय है, न विस्ताररूप है, न दूर है; केवल चैतन्यरूप अनुभव आत्मा है। वह न देह है, न इन्द्रिय है, न गुण है, न चित्त है, न वासना है, न जीव है, न स्पन्दन है, न और को स्पर्श करता है। न आकाश है, न सत् है, न असत् है, न मध्य है, न शून्य है, न अशून्य है, न देश, काल, वस्तु है, न यह है, न इतर इत्यादिक है। वह सब शब्दों से परे और केवल अनुभव गम्य है। उसका न आदि है, न अन्त है। न उसे शस्त्र काट सकते हैं, न अग्नि जला सकती है, न जल गला सकता है। न यह है, न वह है। न उसे वायु सोख सकती है और न किसी की सामर्थ्य उस पर चलती है। वह चित्तरूपी आत्मतत्त्व न जन्मता है और न मरता है। देहरूपी घट अनेक बार उपजते हैं और अनेक बार नष्ट होते हैं। आत्मारूपी आकाश सबके भीतर-बाहर अखण्ड अविनाशी है। जैसे अनेक घटों में एक ही आकाश स्थित होता है, वैसे ही अनेक पदार्थों में एकही ब्रह्मसत्ता आत्मरूप से स्थित है।
हे राम! जो कुछ स्थावर-जङ्गम जगत देख पड़ता है सो सब ब्रह्मरूप है। ब्रह्म निर्धर्म, निर्गुण, निरवयव, निराकार, निर्मल, निर्विकार, आदि-अन्त से रहित, सम और शान्तरूप है—ऐसी दृष्टि का आश्रय लेकर स्थित होओ। हे राम! इस दृष्टि का आश्रय ग्रहण करोगे तो बड़े-बड़े कर्म भी तुमको स्पर्श न करेंगे। जैसे आकाश को बादल
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स्पर्श नहीं करते, वैसे ही तुमको कर्म स्पर्श न करेंगे। यह काल, क्रिया, कारण, कार्य, जन्म, स्थिति, संहार आदि संसरणरूप संसार सब ब्रह्म रूप है—इसी दृष्टि का आश्रय ग्रहण करके विचरो।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे ब्रह्मेकताप्रतिपादनं नाम सप्तचत्वारिंशत्तमस्सर्गः ॥ ४७ ॥
राम ने पूछा, हे भगवन् ! यदि ब्रह्म में कोई विकार नहीं तो भाव-अभावरूप जगत कैसे भासित होता है ? वशिष्टजी बोले, हे राम ! प्रथम तो यह सुनो कि विकार किसको कहते हैं। वस्तु अपने पूर्वरूप को त्यागकर विपरीत रूप को प्राप्त हो और फिर पूर्व के स्वरूप को न प्राप्त हो, उसको विकार कहते हैं। जैसे दूध से दही होकर फिर दूध नहीं होता, जैसे बालक अवस्था बीत जाती है तो फिर नहीं आती और जैसे युवा अवस्था गई हुई फिर नहीं आती; इसका नाम विकार है। परब्रह्म निर्मल है। आदि में निर्विकार है, अन्त में भी निर्विकार है। मध्य में जो उसमें कुछ विकार या मल भासित होता है, उसका मूल अज्ञान है। मध्य में भी ब्रह्म ज्यों का त्यों अविकारी है। हे राम! जो पदार्थ विपर्ययरूप हो जाता है, वह फिर अपने रूप को नहीं प्राप्त होता। ब्रह्मसत्ता सदा ज्यों की त्यों अद्वैतरूप है और आत्मानुभव से प्रकाशित होती है। जो कभी अन्यथारूप को प्राप्त न हो, उसको विकार कैसे कहिये ? हे राम ! जो वस्तु विचार और ज्ञान से निवृत्त हो जाय, उसको भ्रममात्र जानिये। वह वास्तव में कुछ नहीं। जो कुछ विकार है, वह अज्ञान से भासित होता है और जब आत्मबोध होता है तब निवृत्त हो जाता है। जिसके बोध से विकार नष्ट हो जाय, उसे विकार कैसे कहिये ? ब्रह्म शब्द से जिसका निरूपण होता है, वह निद्वैतरूप आत्मा है। जो आदि अन्त में सत् हो, उसे मध्य में भी सत् जानिये। जो इससे भिन्न हो, उसे अज्ञान जानिये। आत्मरूप सदा सर्वदा समरूप है। आकाश और पवन भी अन्यभाव को प्राप्त हो जाते हैं, परन्तु आत्मतत्त्व कदापि अन्यभाव को नहीं प्राप्त होता। वह तो प्रकाशरूप एक नित्य और निर्विकार ईश्वर है; भाव अभाव विकार
❊ निर्वाण प्रकरण ❊ १२६
को कभी नहीं प्राप्त होता। राम ने पूछा, हे भगवन्! जब एकतत्त्व विद्यमान और ब्रह्म सर्वदा निर्मलरूप है तो उस संवित् ब्रह्म में यह अविद्या कहाँ से आई? वशिष्ठजी बोले, हे राम यह सब ब्रह्म है; आगे भी ब्रह्म था और पीछे भी ब्रह्म होगा। उस निर्विकार और आदि, अन्त, मध्य से रहित ब्रह्म में अविद्या कभी नहीं रहती, यह निश्चय है। जो वाच्य-वाचक शब्द से उपदेश के निमित्त ब्रह्म कहता है, उसमें अविद्या कहाँ है? हे राम! 'अहं' 'त्वं' आदिक जगत् भ्रम और अग्नि, वायु आदिक सब ब्रह्मसत्ता है, अविद्या रञ्चकमात्र नहीं। जिसका नाम ही अविद्या है, उसे भ्रममात्र और असत जानो। जो विद्यमान ही नहीं, उसका नाम क्या कहिये?
फिर रामजी ने पूछा, हे भगवन्! उपशम प्रकरण में आपने क्यों कहा था कि अविद्या है और अब कैसे कहते हो कि वह विद्यमान नहीं है। वशिष्ठजी बोले, हे राम! इतने काल तक तुम अबोध थे, इस निमित्त मैंने तुम्हें जगाने के निमित्त युक्ति कल्पना कर वैसा कहा था और अब तुम प्रबुद्ध हुए हो, इसलिए मैंने कहा कि अविद्या अविद्यमान है।
हे राम! अविद्या, जीव और जगत् आदिक का क्रम अप्रबुद्ध को जगाने के निमित्त वेदवादियों ने वर्णन किया है। जब तक मन अप्रबुद्ध होता है, तब तक अविद्या का भ्रम बना रहता है और युक्ति के बिना अनेक उपायों से भी उसे बोध नहीं होता। जब बोधवान् होता है, तब सिद्धान्त को उपदेश की युक्ति के बिना भी पाता है। पर अबोध मन युक्ति के बिना नहीं पा सकता। हे राम! जो कार्य युक्ति से सिद्ध होता है, वह और यत्न से नहीं सिद्ध होता। जैसे युक्तिरूपी दीपक से अन्धकार दूर होता है, और बल यत्न से नहीं निवृत्त होता, वैसे ही युक्ति के बिना अन्य यत्न से अज्ञान की निद्रा निवृत्त नहीं होती। यदि अप्रबुद्ध को सर्वब्रह्म सिद्धान्त का उपदेश कीजिये तो वह उपदेश व्यर्थ होता है। जैसे कोई दुःखी अपना दुःख दीवाल के आगे जाकर कहे तो उसका कहा वह नहीं सुनती और उसका कहना वृथा होता है, वैसे ही अप्र-
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वृद्ध को सर्व-ब्रह्म का उपदेश व्यर्थ होता है । मूढ़ युक्ति मे जगता है और बोधवान् को प्रत्यक्ष तत्त्व का उपदेश होता है । हे रामजी ! अब तुम यह धारणा करो कि ब्रह्म, तीनों जगत् और अहं, त्वं आदिक सब ब्रह्म हैं, द्वैत कल्पना कोई नहीं । फिर जो तुम्हारी इच्छा हो सो करो, दृश्य-संवेदन न होगा, सदा आत्मा में स्थित रहोगे । इस प्रकार अनेक कर्मों में भी लिप्त न होगे ।
हे राम ! चैतन्यतत्त्व परमात्मा प्रकाशरूप है । वह सदा अहंभाव मे स्फुरित होता है । ऐसा जो अनुभवरूप है उसी में चलते, बैठते, सोते, पीते, चेष्टा करते स्थित रहो, तब तुम्हारा अहं-ममभाव निवृत्त हो जायगा । सब प्राणियों में स्थित शान्तरूप ब्रह्म को तुम प्राप्त होगे और आदि-अन्त से रहित शुद्ध संवित्मात्र प्रकाशरूप आत्मा को देखोगे । जैसे मृत्तिका के पात्र घट आदि सबमृत्तिका के ही हैं, वैसे ही तुम सब प्राणियों में आत्मा को देखोगे । जैसे मृत्तिका से घट भिन्न नहीं, वैसे ही आत्मा से जगत् भी भिन्न नहीं । जैसे वायु से स्पन्दन और जल से तरङ्ग भिन्न नहीं, वैसे ही आत्मा से प्रकृति भिन्न नहीं । जैसे जल और तरङ्ग शब्दमात्र से दो हैं, वैसे ही आत्मा और प्रकृति शब्दमात्र से दो हैं, पर भेद कुछ नहीं । केवल अज्ञान से भेद दिखता है और ज्ञान से नष्ट हो जाता है । जैसे रम्मी में सर्प दिखता है, वैसे ही आत्मा में प्रकृति है । हे राम ! चित्त वृक्ष है और कल्पना बीज । जब कल्पनारूपी बीज बोया जाता है, तब चित्तरूपी अंकुर उत्पन्न होता है और उसमे जब भावरूप संसार उत्पन्न होता है, तब आत्मज्ञान की अग्नि कल्पनारूपी बीज दग्ध और चित्तरूपी अंकुर नष्ट हो जाता है । हे राम ! चित्तरूपी अंकुर से सुख दुःखरूपी वृक्ष उत्पन्न होता है । जब चित्तरूपी अंकुर नष्ट हो, तब सुख-दुःखरूपी वृक्ष कहाँ उपजे ? हे राम ! जो कुछ द्वैतभ्रम है सो अबोध में उपजता और बोध में नष्ट हो जाता है । आत्मा जो परमार्थ सार है, उसकी भावना करो, तब संसारभ्रम से मुक्त होगे ।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे स्मृतिविचारयोगो नामाष्ट-चत्वारिंशत्तमस्सर्गः ॥ ४८ ॥
❊ निर्वाण प्रकरण ❊ १३१
राम ने पूछा, हे मुनीश्वर ! जो कुछ जानने योग्य था सो मैंने जाना और जो कुछ देखने योग्य था सो देखा। अब मैं आपके ज्ञानरूपी अमृत से सिंचकर परमपद में पूर्णात्मा हुआ हूँ। हे मुनीश्वर ! यह अब मुझको अनुभव हुआ है कि पूर्ण ने सब विश्व पूर्ण किया है, पूर्ण में पूर्ण प्रतीत है और पूर्ण में पूर्ण ही स्थित है—द्वैत कुछ नहीं। हे मुनीश्वर ! ऐसा जानकर भी मैं लीला और बोध की वृद्धि के निमित्त आपसे पूछता हूँ। जैसे बालक पिता से पूछता है तो पिता बुरा नहीं मानता, वैसे ही आप रुष्ट न होना। हे मुनीश्वर ! श्रवण, नेत्र, त्वचा, रसना और घ्राण, ये पाँचों इन्द्रियाँ प्रत्यक्ष देख पड़ती हैं, पर मरे पर विषय को क्यों नहीं ग्रहण करतीं और जीवित रहने पर कैसे ग्रहण करती हैं ? घटादिक की तरह बाहर से ये जड़ हैं, फिर हृदय में अनुभव कैसे होता है ? और लोहे की शलाका की तरह ये भिन्न-भिन्न हैं, फिर इकट्ठी कैसे हुई हैं ? परस्पर जो एक आत्मा में अनुभव होता है कि मैं देखता हूँ, मैं सुनता हूँ, ये वृत्तियाँ क्योंकर इकट्ठी हुई हैं ? मैं सामान्यभाव से जानता भी हूँ, परन्तु विशेष रूप से आपसे पूछता हूँ।
वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! इन्द्रियाँ, चित्त और घट, पट आदि पदार्थ निर्मल चैतन्यरूप आत्मा से भिन्न नहीं हैं। वह आत्मतत्त्व आकाश से भी सूक्ष्म और स्वच्छ है। हे राम ! जब चैतन्यतत्त्व से पुर्यष्टका (चित्त) की भावना निकली तो उसने आगे इन्द्रियगण को देखा। इन्द्रियगण चित्त से पहले हुए हैं। इनकी घनता से चैतन्यतत्त्व पुर्यष्टका को प्राप्त हुआ है। उसी में सब घटादिक पदार्थ प्रतिबिम्बित हुए हैं और पुर्यष्टका में भानमान हैं। राम ने पूछा, हे मुनीश्वर ! जिसने अनन्त जगत् रचे हैं, जो महाआदर्श में प्रतिबिम्बित हैं, पुर्यष्टका का रूप क्या है, और कैसे हुई ? वशिष्ठजी बोले, हे राम ! आदि-अन्त से रहित जगत् का बीजरूप जो अनादि ब्रह्म है, वह निरामय और प्रकाशरूप है वही अनादि ब्रह्म कल्पना और कलना से रहित, शुद्ध, चिन्मात्र और अचेतन जगत् का बीज है। वह जब कलना के सम्मुख हुआ, तब उसका नाम जीव हुआ। उस जीव ने जब देह को ग्रहण
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किया और अहंभाव उपजा, तब अहंकार हुआ। वह जब मनन करने लगा, तब मन हुआ। जब निश्चय करने लगा, तब बुद्धि हुई। जब पदार्थों के देखनेवाली इन्द्रियों की भावना हुई, तब इन्द्रियाँ हुई। जब देह की भावना करने लगा, तब देह हुई। जब घट-पट की भावना हुई, तब घट-पट हुए। इसी प्रकार जैसी-जैसी भावना होती गई, वैसे ही पदार्थ होते गये। हे राम! यही जिसका स्वभाव है, उसे पुर्यष्टका कहते हैं। स्वरूप से विपर्ययरूपी दृश्य की ओर भावना होने से और चित्तकलना से हुए कर्तृत्व, भोक्तृत्व, सुख, दुःख आदि की भावना, कल्पना और अभिमान से उसको जीव कहते हैं।
निदान जैसी-जैसी भावना का आकार हुआ वैसे ही वैसी वासना वह करता गया। जैसे जल में सींचा हुआ बीज डाल, पत्ते, फूल और फल के रूप को प्राप्त होता है, वैसे ही वासना से सींचा हुआ जीव स्वरूप के प्रमाद से महाभ्रमजाल में गिरता है और जानता है कि मैं मनुष्य-देह सहित हूँ अथवा देवता या स्थावर हूँ, पर यह नहीं जानता कि मैं चिदात्मा हूँ। वह अपने को देह में मिला हुआ परिच्छिन्न और तुच्छरूप देखता है। इस मिथ्याज्ञान में डूबता है और देहाभिमान में वासना के वश चिरकाल पर्यन्त ऊँचे, नीचे और बीच में भ्रमता है। जैसे समुद्र में आया हुआ काष्ठ तरङ्गों में उछलता है। और घटीयन्त्र का लंगर नीचे ऊपर जाता है, वैसे ही जीव वासना के वश हो नीचे और ऊपर भ्रमता है। जब विचार और अभ्यास करके आत्मबोध को प्राप्त होता है, तब संसार-बन्धन से मुक्त होकर आदि-अन्त से रहित आत्मपद को प्राप्त होता है। बहुत काल तक योनिरेखा का भोग कर फिर आत्म-ज्ञान से परमपद को प्राप्त होता है। हे राम! स्वरूप से गिरे हुए जीव इस प्रकार भ्रमते और शरीर पाते हैं। अब वह सुनो कि इन्द्रियाँ मृतक होने पर विषयों को क्यों नहीं ग्रहण करतीं। हे राम! जब शुद्धतत्त्व में चित्तकलना उठती है, तब वह जीवरूपी होती है और मन सहित षड्इन्द्रियों को लेकर देहरूपी गृह में स्थित हो बाहर के विषयों को ग्रहण करती है। मन सहित षड्इन्द्रियों में सम्बन्ध से विषय का ग्रहण
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होता है; इनमें रहित होने पर विषयों का कदापि ग्रहण नहीं हो सकता। इस प्रकार इनमें स्थित होकर जीवकला विषय को ग्रहण करती है। यद्यपि इन्द्रियाँ भिन्न-भिन्न हैं, तो भी इनको जीवकला एकत्र कर लेती है और ये अहंकाररूपी तागे में इकट्ठी होती हैं। देह और इन्द्रियाँ मन की तरह हैं इनको इकट्ठा करके जीव कहता है कि में देखता, सूँघता, सुनता, फिरता, बोलता हूँ और इन्हीं के अभिमान से विषय को ग्रहण करता है।
हे राम ! देह, इन्द्रियाँ और मन आदि जड़ हैं, परन्तु आत्मा की सत्ता पाकर अपने-अपने विषय को ग्रहण करते हैं। जबतक पुर्यष्टका देह में होती है, तबतक इन्द्रियाँ भी विषयों को ग्रहण करती हैं। जब पुर्यष्टका देह से निकल जाती है, तब इन्द्रियाँ भी विषयों को नहीं ग्रहण करतीं। हे राम ! ये जो प्रत्यक्ष नेत्र, नासिका, कान, जिह्वा और त्वचा आदि अंग देख पड़ते हैं, ये इन्द्रियाँ नहीं हैं। इन्द्रियाँ तो सूक्ष्म तन्मात्रा हैं। ये तो उनके रहने के स्थान हैं। जैसे गृह में झरोखे होते हैं, वैसे ही ये स्थान हैं। हे राम ! अब जीव का रूप सुनो। आत्मतत्त्व सब जगह व्याप्त है, परन्तु उसका प्रतिबिम्ब वही भासित होता है, जहाँ निर्मल स्थान होता है। जैसे निर्मल जल में प्रतिबिम्ब पड़ता है, अथवा जैसे दो कुण्ड हों, एक जल से पूर्ण और दूसरा जल से रहित, तो सूर्य का प्रकाश तो दोनों में तुल्य होता है, पर जिसमें जल है उसमें प्रति-बिम्बित होता है और जल के डोलने से प्रतिबिम्ब भी हिलता दिखता है, पर जहाँ जल नहीं है वहाँ प्रतिबिम्ब भी नहीं, वैसे ही जहाँ सात्त्विक अंश अन्तःकरण होता है, वहाँ आत्मा का प्रतिबिम्ब जीव भी होता है और जब तक जीव शरीर में रहता है, तब तक शरीर चेतन भासित होता है; पर जब वह जीवकला पुर्यष्टकारूप शरीर को त्याग जाती है, तब शरीर जड़ भासित होता है। जैसे कुण्ड से जल निकल जाय तो कुण्ड सूर्य के प्रतिबिम्ब से हीन हो जाता है, वैसे ही अन्तःकरण और तन्मात्र पुर्यष्टका में आत्मा का प्रतिबिम्ब होता है। जब पुर्यष्टका शरीर को त्याग जाती है, तब शरीर जड़ भासित होता है।
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हे राम ! जैसे झरोखे के आगे कोई पदार्थ रखिये तो झरोखे को पदार्थ का ज्ञान नहीं होता और जब उसका स्वामी देखता है तब पदार्थ का ग्रहण करता है, वैसे ही इन्द्रियों के स्थानों में जो सूक्ष्मतन्मात्रा ग्रहण करनेवाली होती है, वही विषयों को ग्रहण करती है, और जब तन्मात्रा नहीं होती, तब इन्द्रियाँ ग्रहण नहीं कर सकतीं। हे राम ! प्रत्यक्ष देखो कि कथा का श्रोता पुरुष कथा में बैठा होता है, पर यदि उसका चित्त और जगह निकल जाता है, तब प्रत्यक्ष बैठा रहता है; किन्तु कुछ नहीं सुनता, क्योंकि उसकी श्रवण इन्द्रिय मन के साथ गई है; वैसे ही जब पुर्यष्टका निकल जाती है तब मृतक होता है और इन्द्रियाँ भी विषयों को ग्रहण नहीं करतीं। हे राम ! अहं-मम आदि दृश्य भी सर्ग के आदि में आत्मरूपी समुद्र में तरङ्ग की तरह निकला है, उसके पश्चात् दृश्य कल्पना हुई है। अतएव न देश है, न काल है, न क्रिया है। यह सब असतरूप है; वास्तव में कुछ नहीं। यह जानकर संसार के सुख, दुःख, हर्ष, शोक, राग, द्वेष से रहित होकर विचरो, तब तुम माया से मुक्त हो जाओगे।
इति श्रीयोगवाशिष्टे निर्वाणप्रकरणे संवेदनविचारो नामैकोन- पञ्चाशत्तमस्सर्गः ॥ ४९ ॥
वशिष्ठजी बोले, हे राम ! वास्तव में इन्द्रियादिक गण कुछ उपजे नहीं हैं। आदि-ब्रह्मा की उत्पत्ति मैंने तुमसे कही और तुमने सुनी है। जैसे आदि-जीव पुर्यष्टकारूप ब्रह्मा उपजे हैं, वैसे ही और भी सब उपजे हैं। हे राम ! जीव पुर्यष्टका में स्थित होकर जैसी-जैसी भावना करता गया, वैसा ही वैसा भासित होने लगा है और फिर उसी की सत्ता पाकर अपने-अपने विषय को ग्रहण करने लगा है। वास्तव में इन्द्रियाँ भी कुछ वस्तु नहीं। जब आत्मा के आभास में चेतता है, इन्द्रियाँ और इन्द्रियों के विषय संवेदन में उपजे हैं। ये जैसे उपजे हैं, सो तुमसे कह चुके हैं। हे राम ! शुद्ध संवित् सत्तामात्र में जो अहं का उन्मेष हुआ, वही संवेदन है। वही संवेदन जीवरूप पुर्यष्टकाभाव को प्राप्त होकर बुद्धि, मन और पञ्चतन्मात्रा को उपजाकर आपही उनमें