योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
❇ निर्वाण प्रकरण ❇ १०५
होता है, उसका अपने में आप पूजन करो। उठते, चलते, खाते, पीते जो कुछ बाहर के लिए त्याग, ग्रहण और भोग हैं, सबको करते रहते भी उस देव की पूजा करो। हे मुनीश्वर! शरीर में शिवलिङ्ग चिह्न से रहित बोधरूप देव है। यथाप्राप्त में सम रहना उस देव का पूजन है। यथाप्राप्ति के समभाव में स्नान करके शुद्ध होकर बोधरूप लिङ्ग का पूजन करो। जो कुछ प्राप्त हो, उसमें रागद्वेष से रहित होना और सर्वदा साक्षीरूप अनुभव में स्थित रहना ही उसका पूजन है। हे मुनीश्वर! सूर्य के भुवन आकाश में वही सूर्य होकर प्रकाश करता है और चन्द्रमा के भुवन में चन्द्रमा होकर स्थित होता है। इनसे लेकर और भी जो पदार्थ समूह हैं, उनमें जैसी-जैसी भावना से स्फुरण हुआ है, वही रूप होकर वह देव स्थित है। हे मुनीश्वर! जो नित्य, शुद्ध, बोधरूप और अद्वैत है, उसको देखना और किसी में वृत्ति न लगाना ही उस देव का पूजन है। प्राण अपानरूपी रथ पर आरूढ़ जो हृदय में स्थित है, उसका ज्ञान ही पूजन है। वही सब कर्म करता है। सब भोगों का भोक्ता, सब शब्दों को श्रवण करनेवाला, भागवतरूप और सबकी भावना करनेवाला वही परम प्रकाशरूप है। ऐसा जो संवित्तत्त्व है, उसको सर्वज्ञ जानकर उसका चिन्तन करना ही उसका पूजन है।
वह देव सब देहों में स्थित है तो भी आकाश सा निर्लिप्त निर्मल है। वह जाता भी है और नहीं जाता। प्राणरूपी आलय में प्रकाशित है; हृदय, कण्ठ, तालु, जिह्वा, नासिका और पीठ में व्यापक है, शब्द आदि विषयों को करता और मन का प्रेरक है। जैसे तिल के आश्रय तेल है, वैसे ही आत्मा सबका आश्रय है। वह कलनारूपी कलङ्क से रहित और कल्पनाओं से संयुक्त भी है। सम्पूर्ण देहों में वही एक देव व्याप रहा है। हृदय में जो प्रत्यक्ष होता है, वही निर्मल चिन्मात्र प्रकाशरूप और कलनारूपी कलङ्क से रहित सदा प्रत्यक्ष है और अपने में आप ही उसका अनुभव किया जाता है। सर्वदा सब पदार्थों का प्रकाशक, प्रत्यक चैतन्य जो आत्मतत्त्व अपने हृदय में स्थित है, वही अपने फुरने से शीघ्र ही द्वैत की तरह हो जाता है। हे मुनीश्वर! जो
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कुछ साकाररूप जगत् देख पड़ता है, सो सब विराट् आत्मा है। इससे अपने में इस प्रकार विराट् की भावना करो कि यह सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड मेरी देह है; हाथ, पाँव, नख, केश है। मैं ही प्रकाशरूप एक देव हूँ। नीति इच्छादिक मेरी शक्ति हैं। सब मेरी ही उपासना करते हैं। जैसे स्त्री श्रेष्ठ भर्ता की सेवा करती है, वैसे ही शक्ति मेरी उपासना करती है। मन मेरा द्वारपाल है, जो त्रिलोकी का निवेदन करनेवाला है। चिन्तन मेरा आने-जानेवाला प्रतिहारी है। नाना प्रकार के ज्ञान मेरे अङ्ग के भूषण हैं। कर्म-इन्द्रियाँ मेरे द्वार और ज्ञान-इन्द्रियाँ मेरे गण हैं। ऐसा मैं एक अनन्त आत्मा, अखण्डरूप, भेद से रहित, अपने आपमें स्थित परिपूर्ण हूँ।
हे मुनीश्वर ! इसी भावना से जो एक देव की पूजा करता है, वह परमात्मदेव को प्राप्त होता है। दीनता आदि उसके सब क्लेश नष्ट हो जाते हैं। उसे अनिष्ट की प्राप्ति में शोक और इष्ट की प्राप्ति में हर्ष नहीं उपजता। न तोष होता है और न कोप होता है। विषय की प्राप्ति से वह तृप्ति नहीं मानता और न इसके वियोग से खेद मानता है। न अप्राप्त की वाञ्छा करता है, न प्राप्त के त्याग की इच्छा करता है। सब पदार्थों में उसका समभाव रहता है। ऐसा पुरुष उस देव का परम उपासक है। ग्रहण-त्याग न करना, सबमें तुल्य रहना और भेदभाव को प्राप्त न होना ही उस देव का उत्तम अर्चन है। हे मुनीश्वर ! मैंने चैतन्यतत्त्व देव तुमसे यह कहा। वह सब देहों में स्थित है। जो वस्तु प्राप्त हो, उसका अर्चन करके उसी के आगे रखना, सबके साक्षी आत्मा को देखना, किसी से खिन्न न होना, उसमें अहंप्रतीत रखकर भिन्न दृश्य की भावना न करना ही उस देव की अर्चना है। हे मुनीश्वर ! जो कुछ प्राप्त हो, उसमें यत्न बिना समदर्शी रहना और भक्ष्य, भोज्य, लेह्य, चोष्य, भोजन जो प्राप्त हो, उसे देव के आगे रखके उसमें ग्रहण-त्याग की बुद्धि न करना, यही उस देव का पूजन है। सब पदार्थों की प्राप्ति में देव की पूजा करने से अनिष्ट भी इष्ट हो जाता है। मृत्यु आवे तो वह देव की पूजा, जन्म हो तो
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वह देव की पूजा, दरिद्र आवे तो वह देव की पूजा, राग प्राप्त हो तो वह देव की पूजा। नाना प्रकार की विचित्र चेष्टाएँ सब देव के आगे पुष्पांजलि बढ़ाना है। रागद्वेष में सम रहना ही उस देव की पूजा है। मन्तों के हृदय में रहनेवाली मैत्री, अर्थात सम्पूर्ण विश्व का मित्र होना भी उस देव का पूजन है। भोग त्याग, राग में जो कुछ प्राप्त हो, उससे भी उस देव का पूजन करो। जो नष्ट हुआ सो हुआ और जो प्राप्त हुआ सो हुआ। दोनों में निर्विकार रहकर उसमें उस देव का अर्चन करो। ये भोग आपात रमणीय हैं, होते भी हैं और नष्ट भी हो जाते हैं। इनकी इच्छा न करना, सदा सन्तुष्ट रहना। जैसे जो आकार प्राप्त हो, उसमें राग-द्वेष से रहित होना भी उस देव का अर्चन है।
हे मुनीश्वर! जो कुछ प्रारब्ध में प्राप्त हो, उसमें आत्मा का अर्चन करो। इच्छा-अनिच्छा को त्यागकर जो प्राप्त हो, उसमें उस देव का अर्चन करो। हे मुनीश्वर! ज्ञानवान् न किर्मी की इच्छा करता है और न त्याग करता है। जो अनिच्छित अनायास प्राप्त हो, उसको भोगता है जैसे समुद्र में नदी जा मिलती है पर वह उसमें न कुछ हर्ष मानता है, न शोक करता है, वैसा ही ज्ञानवान् इष्ट-अनिष्ट की प्राप्ति में राग-द्वेष से रहित यथाप्राप्त को भोगता है। वह भी उस देव का पूजन है। देश, काल, क्रिया, शुभ अथवा अशुभ जो प्राप्त हो, उसमें संरक्षण विकार को प्राप्त न होना उस देव की अर्चना है। यदि द्रव्य अनर्थरूप हो तो भी ममत्व रस मिला होने से वह अमृत हो जाता है। जैसे षट्रसों के स्वाद शक्कर में मिलकर मधुर हो जाते हैं, वैसे ही अनर्थरूपी रस ममत्व रस से मिलकर अमृत हो जाते हैं। समदर्शी को उसमें खेद नहीं होता। वे अनन्त रूप हो जाते हैं। चन्द्रमा की नाईं सब भावना अमृतमय हो जाती है। जैसे आकाश निर्लेप है, वैसे ही समत्व भाव पाकर चित्त राग-द्वेष से रहित निर्मल हो जाता है। द्रष्टा को दृश्य में मिला न देखना, साक्षीरूप रहना ही देव की अर्चना है। जैसे पत्थर की शिला निष्पन्द होती है, वैसे ही विकल्प से रहित चित्त अचल होता है। वही देव की अर्चना है।
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हे मुनीश्वर ! भीतर में आकाश सा असंग रहना और बाहर में प्रकृति आचार में रहना; किसी के संग का हृदय में स्पर्श न होने देना और सदा समभाव विज्ञान से पूर्ण रहना ही उस देव की उपासना है । जिसके हृदयरूपी आकाश में अज्ञानरूपी मेघ नष्ट हो गया है, उसको स्वप्न में भी विकार नहीं होता । जिसके हृदयरूपी आकाश में अहंता-रूपी कुष्टिग मिट गया है, वह शरत्काल के आकाश सा उज्ज्वल होता है । हे मुनीश्वर ! जिसको समभाव प्राप्त हुआ है, और उसमें उसने देव को पाया है, वह पुरुष ऐसा हो जाता है जैसा छोटा बालक राग-द्वेष से रहित होता है । जीवरूपी चेतना को उलंघ कर परम चैतन्य-तत्त्व जो प्राप्त होता है और सकल की इच्छा और सुख-दुःख-भ्रम में शरीर की मुक्ति होती है, वही देव की अर्चना है ।
इति श्रीयोगवाशिष्टे निर्वाणप्रकरणे देवार्चनाविधान-नामाष्टत्रिंशत्तमस्सर्गः ॥ ३८ ॥
ईश्वर बोले, हे मुनीश्वर ! जैसी कामना हो और जो कुछ आरम्भ करे अथवा न करे, उसमे अपने में चिन्मात्र संवित्तत्त्व की अर्चना करे । इससे वह देव प्रसन्न होता है, और जब प्रसन्न हुआ, तब वह प्रकट होता है। जब उसको पाया और स्थित हुआ तब रागद्वेषादिक शब्दों का कुछ अर्थ नहीं रह जाता । जैसे अग्नि में बर्फ का कण नहीं पाया जाता, वैसे ही फिर उसमें रागद्वेषादिक नहीं पाये जाते । इससे उस देव की अर्चना करनी चाहिए । यदि राज्य अथवा दारिद्र्य व सुख-दुःख प्राप्त हो तो उसमें सम रहना ही देव की अर्चना है । हे मुनीश्वर ! शुद्ध चिन्मात्र में प्रमादी न होने का नाम ही अर्चना है । जो कुछ घटपट आदिक जगत् भासित होता है, सो सब आत्मरूप है, उसमे भिन्न कुछ नहीं । वह आत्मा शिव शान्तिरूप, अनाभास, एक, प्रकाशरूप है । सम्पूर्ण जगत् प्रतीतिमात्र है; आत्मा से भिन्न किसी द्वैत वस्तु का आभास नहीं है । सर्वात्मरूप अद्वैततत्त्व जब भासित होता है, तब उसमें प्राप्त होकर बड़ा आश्चर्य होता है। घटपटा-दिक रूप सब वही है, और कुछ नहीं । हे मुनीश्वर ! यह सब सर्वात्मा
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अनन्त शिवतत्त्व है, ऐसा निश्चय जिसको हुआ है, उसने देव की पूजा जानी है। घटपट आदि पदार्थ और पूज्य-पूजा-पूजकभाव, सब ब्रह्मरूप है। निर्मलदेव आत्मा में कुछ भेद-भाव नहीं है।
हे मुनीश्वर ! आत्मदेव सर्वशक्तिमान् और अनन्तरूप है। जगत में उससे भिन्न कुछ नहीं। निर्मल प्रकाश संवितरूप आत्मा स्थित है। हमको तो ईश्वरदेव से भिन्न कुछ नहीं भासित होता। सर्वत्र, सब प्रकार वही सर्वात्मा सम्पूर्ण देख पड़ता है। जिनको देश-काल के परिच्छेद सहित ईश्वर भासित होता है, वे हमारे उपदेश के पात्र नहीं, वे ज्ञानबन्धु नीच हैं। उनकी दृष्टि को त्यागकर मेरी दृष्टि का आश्रय जो ले तो स्वस्थ, वीतराग और निरामय होकर प्रारब्ध के अनुसार जो कुछ सुख-दुःख आकर प्राप्त हो उसे खेद से रहित होकर भोगे और उस देव का अर्चन करे, तब शान्ति प्राप्त हो। हे मुनीश्वर ! सब प्रकार सर्वात्मारूप से उस देव की भावना करो—यही उसका पूजन है। वृत्ति का सदा अनुभवरूप में स्थित रहना और यथाप्राप्त में खेद से रहित विचरना ही उस देव की अर्चना है। जैसे स्फटिक के मन्दिर में जो प्रतिविम्ब झलकते हैं, वे और कुछ नहीं, निष्कलङ्क स्फटिक ही है, वैसे ही सब ओर से शुद्ध और जन्मादिक दुःख से रहित निष्कलङ्क आत्मा की प्राप्ति से तुम में जन्मादिक कलङ्क या दुःख कुछ न रहेगा।
इति श्रीयोगवाशिष्टे निर्वाणप्रकरणे ईश्वरोपाख्याने देवपूजाविचारो नामैकोनचत्वारिंशत्तमस्सर्गः ॥ ३६ ॥
वशिष्ठजी बोले, हे देव ! शिव किसे कहते हैं और ब्रह्म, आत्मा, परमात्मा, तत्सत्, निष्किञ्चन, शून्य, विज्ञान इत्यादिक किसे कहते हैं ? ये भेदसंज्ञाएँ किस निमित्त हुई हैं ? कृपा करके कहो। ईश्वर बोले, हे मुनीश्वर ! जब सबका अभाव होता है, तब अनादि, अनन्त, अनाभास सत्तामात्र शेष रहता है। जो इन्द्रियों का विषय नहीं, उसे निष्किञ्चन कहते हैं। फिर मैंने पूछा, हे ईश्वर ! जो इन्द्रियाँ, बुद्धि आदि का विषय नहीं, उसे क्योंकर पा सकते हैं ? ईश्वर बोले, हे मुनीश्वर ! जो मुमुक्षु हैं और जिनको वेद के आश्रयसंयुक्त सात्त्विकी
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वृत्ति प्राप्त हुई है, उनको सात्त्विकीरूप जो गुह्य शास्त्रनाम की विद्या प्राप्त होती है, उसमें अविद्या नष्ट हो जाती है और आत्मतत्त्व का प्रकाश होता है, जैसे साबुन से धोबी वस्त्र का मैल उतारता है, वैसे ही गुरु और शास्त्र अविद्या को दूर करते हैं। जब कुछ काल में अविद्या नष्ट होती है, तब अपना रूप आप ही दिखता है। हे मुनीश्वर ! जब गुरु और शास्त्रों का विचार मिलकर प्राप्त होता है, तब स्वरूप की प्राप्ति होती है, द्वैतभ्रम मिट जाता है और सर्वत्र आत्मा ही झलकती है। और जब विचार द्वारा आत्मतत्त्व का निश्चय हुआ कि सर्वत्र सब कुछ आत्मा ही है, उसमें कुछ भिन्न नहीं, तब अविद्या जाती रहती है।
हे मुनीश्वर ! आत्मा की प्राप्ति में गुरु और शास्त्र प्रत्यक्ष कारण नहीं; क्योंकि जिनके क्षय होने मे वस्तु को पाइये, उनके विद्यमान होते वह वस्तु कैसे मिल सकती है ? देह इन्द्रियों सहित गुरु होता है और ब्रह्म सब इन्द्रियों से अतीत है; इनमे कैसे उसे पाइये ? ज्ञान अकारण है, परन्तु उसके कारण भी हैं, क्योंकि गुरु और शास्त्र के क्रम में ज्ञान की सिद्धि होती है और गुरु और शास्त्र के बिना बोध की सिद्धि नहीं होती। आत्मा निर्देश और अदृश्य होकर भी गुरु और शास्त्र में मिलता है, और गुरु और शास्त्र में भी नहीं मिलता, आप ही में आत्म-तत्त्व की प्राप्ति होती है। जैसे अन्धकार में पदार्थ हो और दीपक के प्रकाश से दीखे तो दीपक से उसे नहीं पाया, अपने आपमें पाया है, वैसे ही गुरु और शास्त्र भी हैं। यदि दीपक हो और नेत्र न हों, तब कैसे वस्तु को पाइये और नेत्र हों और दीपक न हो तो भी नहीं पाया जाता। जब दोनों हों, तब पदार्थ पाया जाता है। वैसे ही गुरु और शास्त्र भी हों और अपना पुरुषार्थ और तीक्ष्णबुद्धि हो, तब आत्मतत्त्व मिलता है, अन्यथा नहीं पाया जाता। जब गुरु, शास्त्र और शिष्य की शुद्ध बुद्धि, तीनों इकट्ठे मिलते हैं, तब संसार के सुख-दुःख दूर होते हैं और आत्मपद की प्राप्ति होती है। जब गुरु और शास्त्र आवरण को दूर कर देते हैं, अपने आप ही आत्मपद मिलता है, वैसे ही जैसे जब वायु बादल को दूर करती है, तब नेत्रों से सूर्य देख पड़ता है। अब
निर्वाण प्रकरण
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नाम के भेद सुनो। जब बोध के प्रभाव से कर्म-इन्द्रियों और ज्ञान-इन्द्रियों का क्षय हो जाता है, तब उनके पीछे जो शेष रहता है, उनके नाम संवित्तत्त्व, आत्मसत्ता आदिक हैं। जहाँ ये सम्पूर्ण नहीं और इनकी वृत्ति भी नहीं, उनके पीछे जो सत्ता शेष रहती है, वह आकाश से भी सूक्ष्म और निर्मल अनन्त परम शून्यरूप है—वहाँ शून्य का भी अभाव है। हे मुनीश्वर ! जो शान्तरूप मुमुक्षु मनन-कल्पना से संयुक्त हैं, उनको जीवन्मुक्तपद के बोध के निमित्त मोक्ष उपाय ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र, इन्द्र, लोकपाल, पण्डित, पुराण, वेद, शास्त्र और सिद्धान्त रचे गये हैं और उनमें शास्त्रों ने चैतन्य ब्रह्म, शिव, आत्मा, परमात्मा, ईश्वर, सत्, चित्, आनन्द आदि भिन्न-भिन्न अनेक संज्ञाएँ कही हैं, पर ज्ञानी को यह कुछ भेद नहीं।
हे मुनीश्वर ! ऐसा जो देव है, उसका ज्ञानवान् इस प्रकार अर्चन करते हैं और जिस पद के हम सब दास या कर्मचारी हैं, उस परमपद को वे प्राप्त होते हैं। फिर मैंने पूछा, हे भगवन् ! यह सब जगत् अविद्यमान है और विद्यमान की तरह स्थित है, सो यह कैसे हुआ ? यह तुम्हीं कह सकते हो। ईश्वर बोले, हे मुनीश्वर ! जो ब्रह्म आदिक नाम से कहा जाता है, वह केवल शुद्ध संवित्मात्र और आकाश से भी सूक्ष्म है। उसके आगे आकाश भी ऐसा स्थूल है, जैसा अणु के आगे सुमेरु स्थूल। उसमें जब वेदनाशक्ति आभास होकर चेतती है, तब उसका नाम चेतन होता है। फिर वह अहंताभाव को प्राप्त हुआ, जैसे स्वप्न में पुरुष अपने को हाथी देखने लगे, वैसे अपने को अहं मानने लगा। फिर देश, काल, आकाश आदि देखने लगा। तब चेतनकला जीव अवस्था को प्राप्त हुई और वासना करनेवाली हुई। जब जीवभाव हुआ, तब बुद्धि निश्चयात्मक होकर स्थित हुई और शब्द और क्रियाज्ञान से संयुक्त हुई। जब इनमे मिलकर कल्पना हुई, तब मन हुआ, जो संकल्प का बीज है। तब अन्नवाहक शरीर में अहं-रूप होकर ब्रह्मसत्ता स्थित हुई। इस प्रकार यह उत्पन्न हुई है। फिर वायुसत्ता स्पंदित हुई, जिससे स्पर्शसत्ता त्वचा प्रकट हुई। फिर तेज-
११२ ❇ योगवाशिष्ठ ❇
मत्ता हुई, जिसमे प्रकाशमत्ता प्रकट हुई । आकाश से नेत्रमत्ता प्रकट हुई । फिर जलमत्ता हुई, जिसमे स्वादरूप—रसमत्ता हुई । उसमे जिह्वा प्रकट हुई । फिर गन्धमत्ता मे भूमि, भूमि मे घ्राणमत्ता और उसमे पिण्डमत्ता प्रकट हुई । फिर देशमत्ता, कालमत्ता और सर्वगत्ता हुई, जिनको इकट्ठा करके अहम्मत्ता प्रकट हुई । जैसे बीज, पत्र, फूल, फल आदिक का आश्रय होता है, वैसे ही पुर्यष्टका को जानो । यही अन्तर्वाहक देह है । इन सबका आशय ब्रह्ममत्ता है । वास्तव में कुछ उपजा नहीं, केवल परमात्ममत्ता अपने आप में स्थित है । जैसे तरङ्गादि में जल स्थित है, वैसे ही आत्ममत्ता अपने आप में स्थित है ।
हे मुनीश्वर ! संवित् में जो संवेदन पृथक्रूप होकर स्फुरित और उसे निःस्पन्दन करके जब स्वरूप को जाने, तब वह नष्ट हो जाता है । जैसे संकल्प का रचा नगर संकल्प के अभाव में अभाव हो जाता है, वैसे ही आत्मा के ज्ञान में संवेदन का अभाव हो जाता है । हे मुनीश्वर ! संवेदन तब तक भासित होता है, जब तक उसको जाना नहीं, जब जान लिया, तब संवेदन का अभाव हो जाता है और वह संवित् में लीन हो जाता है, भिन्न सत्ता इसकी नहीं रहती । हे मुनीश्वर ! जो प्रथम अणु तन्मात्र था, वह भावना-वश स्थूल देह को प्राप्त हुई और स्थूल देह होकर भासित होने लगा । आगे जैसे-जैसे देश-काल-पदार्थ की भावना होती गई, वैसे-वैसे भासित होने लगा । जैसे स्वप्न में गन्धर्वनगर और स्वप्नपुर देख पड़ता है, वैसे ही भावना के कारण ये पदार्थ भासित होने लगे हैं । मैंने पूछा, हे भगवन् ! गन्धर्वनगर और स्वप्नपुर के समान इसको कैसे कहते हो ? यह जगत तो प्रत्यक्ष देख पड़ता है ?
ईश्वर बोले, हे मुनीश्वर ! संसार का दुःख वासना-वश दीखता है । अविद्यमान में स्वरूप के प्रमाद से विद्यमान बुद्धि हुई है । जगत् के पदार्थों को सत् मानकर जो वासना जागती है, उसमें दुःख होता है । हे मुनीश्वर ! यह जगत् अविद्यमान है । जैसे मृगतृष्णा का जल असत्य होता है, वैसे ही यह जगत् असत्य है । उसमें वासना, बाधक
❋ निर्वाण प्रकरण ❋ १२३
और वास्य तीनों मिथ्या हैं। जैसे मृगतृष्णा का जल पान करके कोई तृप्त नहीं होता, क्योंकि जल ही असत् है, वैसे ही यह जगत् स्वयं ही असत् है, अतः इसके पदार्थों की वासना करना वृथा है। ब्रह्मा से तृणपर्यन्त सब जगत् मिथ्या है। वासना, वासक और वास्य पदार्थों का अभाव होने पर केवल आत्मतत्त्व रहता है और सब भ्रम शान्त हो जाता है।
हे मुनीश्वर ! यह जगत् भ्रममात्र है—वास्तव में कुछ नहीं। जैसे बालक को अज्ञान से अपनी परछाईं में वेताल देख पड़ता है और जब विचार करके देखे तब वेताल का अभाव हो जाता है, वैसे ही अज्ञान से यह जगत् भासित होता है और आत्मविचार से इसका अभाव हो जाता है। जैसे मृगतृष्णा की नदी और आकाश में नीलता और दूसरा चन्द्रमा भासित होता है, वैसे ही आत्मा में अज्ञान से देह भासित होती है। जिसकी बुद्धि देहादिक में स्थिर है, वह हमारे उपदेश के योग्य नहीं है। जो विचारवान् है, उसको उपदेश करना उचित है। जो मूर्ख भ्रांत असत्वादी और सत्कर्म से रहित अनार्य है, उसको ज्ञानवान् कभी उपदेश न करे। जिनमें विचार, वैराग्य, कोमलता और शुभ आचार हों, उनको उपदेश करना चाहिए। जो इन गुणों से रहित हों उनको उपदेश करना ऐसे होता है, जैसे कोई महासुन्दर और सुवर्ण सदृश कान्तिवाली कन्या को नपुंसकपुरुष के साथ ब्याह देने की इच्छा करे।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे जगन्मिथ्यात्वप्रतिपादनं नाम चत्वारिंशत्तमस्सर्गः ॥ ४० ॥
वशिष्ठजी बोले, हे भगवन् ! वह जीव, जो आदि में उत्पन्न हुआ और अपने साथ देहभ्रम देखने लगा, उसके अनन्तर वह कैसे स्थित हुआ ? ईश्वर बोले, हे मुनीश्वर ! उस जीव ने स्वप्न की तरह सर्वगत चिद्घन आत्मा के आश्रय से उपजकर अपने शरीर को देखा। हे मुनीश्वर ! जो आदि जीव प्रकट होकर प्रमाद को नहीं प्राप्त हुआ और अपने स्वरूप ही में अहंप्रत्यय रहा, वह इस कारण ईश्वर होकर स्थित हुआ।
११४ ✻ योगवाशिष्ठ ✻
उसका यह निश्चय रहा कि मैं सनातन, नित्य, शुद्ध, परमानन्द और अनन्तकला परमपुरुष हूँ। आत्मा की अपेक्षा से उसको जीव कहा है और सृष्टि जगत् की अपेक्षा करके उसको ईश्वर कहा। हे मुनीश्वर! वह जो आदि जीव है सो कर्त्ता विष्णुरूप होकर ब्रह्मा को नाभिकमल से उत्पन्न करता है। वह किसी सृष्टि में प्रथम ब्रह्मा हुआ है और विष्णु और रुद्र उससे उत्पन्न हुए हैं। किसी सृष्टि में वह प्रथम रुद्र हुआ, उससे विष्णु और ब्रह्मा हुए। चैतन्य आकाश में जैसा-जैसा संकल्प प्रकट हुआ है, वैसा ही वैसा होकर वह स्थित हुआ है। आदि जीव ने उपजकर जिस-जिस प्रकार का संकल्प किया, वैसा-वैसा होकर स्थित हुआ। वास्तव में सब असतरूप है और अज्ञानरूप भ्रम से भासित हुआ है। जैसे पाषाण में वेताल होता है, वैसे ही अज्ञान से यह सद्रूप भासित होता है। आदि-पुरुष से लेकर सारी सृष्टि परमाकाश के एक निमेष में हुई है और उन्मेष में लय भी हो जाती है। एक निमेष के प्रमाद से कल्प के समूह व्यतीत हो जाते हैं और परमाणु परमाणु में सृष्टियाँ प्रकट होती हैं। उनमें कल्प और महाकल्प भासित होते हैं। कुछ सृष्टियाँ परस्पर दिखती हैं और कुछ अन्योन्य अदृश्यरूप हैं। इसी प्रकार सृष्टियाँ उसकी स्पन्दनकला में उपजी हैं और चमत्कार हुआ है। जब स्पन्दनकला स्वरूप की ओर आती है, तब उसमें लीन हो जाती है। जैसे स्वप्न का देखा पर्वत जागने पर लीन हो जाता है, वैसे ही जाग्रत की सृष्टि लीन हो जाती है।
हे मुनीश्वर! जीव-जीव प्रति अपनी-अपनी सृष्टियाँ हैं। उन सृष्टियों को कोई देश या काल रोक नहीं सकता; क्योंकि वे अपने-अपने संकल्प में स्थित हैं और यह सब आत्मा का चमत्कार है। जैसा स्फुरण स्फुरित होता है, वैसा चमत्कार भासित होता है। हे मुनीश्वर! न कुछ उपजा है, न कुछ नष्ट होता है; स्वतः चैतन्यतत्त्व अपने आपमें चमकता है। जैसे स्वप्ननगर उपजकर नष्ट हो जाता है और संकल्प का पहाड़ उपजकर मिट जाता है, वैसे ही जगत् उपजकर नष्ट हो जाता है। जैसे स्वप्न और संकल्प के पहाड़ को कोई रोक नहीं सकता, वैसे ही अपनी-
❇ निर्वाण प्रकरण ❇ ११५
अपनी सृष्टि को देश या काल रोक नहीं सकता। क्योंकि और जगह इनका सद्भाव नहीं है, इससे यह जगत् अपने-अपने काल में सन्रूप है। आत्मा में सद्भाव नहीं, वह संकल्परूप है। हे मुनीश्वर ! जैसे आदि तत्त्व से जीव ईश्वर निकले हैं, वैसे ही कर्म भी रुद्र से लेकर वृक्ष तक सब एक क्षण में उर्मी तत्त्व मे निकल आये हैं। सुमेरु आदि भी अपनी स्थिति में अपने को रोकते हैं, अन्य अणु को भी नहीं रोक सकते; क्योंकि वहाँ अस्तित्व है ही नहीं। इस कारण आत्मा में सृष्टि आभास-रूप है। हे मुनीश्वर ! इस प्रकार सब जगत् मायामात्र है और भावना से भासित होता है। जब आत्मा का अभ्यास होता है, तब भेदकल्पना मिट जाती है और केवल उपशमरूप शिवतत्त्व भासित होता है।
हे मुनीश्वर ! निमेष का जो शत भाग है उसका अर्द्धभाग प्रमाद होने मे नाना प्रकार का जगत् प्रकट भासित होता है। सत्-अमतरूप जगत् मनरूपी विश्वकर्मा बनाता है। आत्मतत्त्व न दूर है, न निकट है, न नीचे है, न ऊपर है, न पूर्व में है और न पश्चिम में है। सत्-असत् के मध्य वह अनुभवरूप सर्वज्ञ है। उसको प्रत्यक्ष आदिक प्रमाण अपना विषय नहीं बना सकते—जैसे जल मे अग्नि नहीं निकलती। हे मुनीश्वर ! जो कुछ तुमने पूछा था सो मैंने कहा। उसमें चित्त लगाने मे तुम्हारा कल्याण न होगा। इतना कह सदाशिव बोले कि अब हम अपने वाञ्छित स्थान को जाते हैं। चलो पार्वती, अपने स्थान को चलें।
इतना कहकर वशिष्ठजी बोले, हे राम ! जब इस प्रकार ईश्वर ने कहा, तब मैंने अर्ध्य-पाद्य से पूजन किया और ईश्वर भी पार्वती और गणों को लेकर आकाशमार्ग को चले। जब तक मुझको देख पड़ते रहे, तब तक मैं उनकी ओर देखता रहा। फिर अपने स्थान में कुशासन पर आकर बैठा और जो कुछ ईश्वर ने उपदेश किया था, वह मैं अपने मन में विचारने लगा।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे परमार्थविचारो नामैकचत्वारिंशत्तमस्सर्गः ॥ ४१ ॥
११६ 🞹 योगवाशिष्ठ 🞹
वशिष्ठजी बोले, हे राम! जो कुछ ईश्वर ने मुझसे कहा सो में आप भी जानता था और तुम भी जानते हो। यह जगत् भी असत् है और देखनेवाला भी असत् है। इस मायारूप जगत् में में तुमसे सत क्या कहूँ और असत् क्या कहूँ? जैसे जल में द्रवता है, वैसे ही आत्मा में जगत् है। जैसे पवन में स्पन्दन और आकाश में शून्यता है, वैसे ही आत्मा में जगत् है। हे राम! जो कुछ पतित प्रवाह से प्राप्त होता है, उर्मी में से देवअर्चन करना है। इस क्रम से मैं निर्यामानिक हूँ और जगत् की क्रिया से में दुःख-हीन होकर चेष्टा करता हूँ। व्यवहार करता देख पड़ता हूँ, तो भी शान्तरूप हूँ और यथाप्राप्त आचाररूपी फूल से आत्म-देव की अर्चना करता हूँ, मुझको खेद-भेद कोई नहीं होता। हे राम! विषयों और इन्द्रियों का सम्बन्ध सब जीवों को बराबर है, पर जो ज्ञान-वान् हैं, वे सावधान रहते हैं और जो कुछ देखते, सुनते, बोलते, खाते, सूँघते और स्पर्श करते हैं, उसमें आत्मतत्त्व का अर्चन करते हैं और अपने को आत्मा से भिन्न नहीं जानते। अज्ञानियों को कर्तृत्व-भोक्तृत्व का अभिमान होता है और उससे वे दुःखी होते हैं।
हे राम! तुम भी ऐसी दृष्टि का आश्रय लेकर संसाररूपी वन में निःसंग होकर विचरो तो तुमको कुछ खेद न होगा। जिसकी वृत्ति इस प्रकार समान हो गई है, उसको चाहे बड़ा कष्ट प्राप्त हो, चाहे धन और बान्धवों का वियोग हो, तो भी उसको खेद नहीं होता। यह जो दृष्टि मैंने तुमसे कही है, उसका जब आश्रय ग्रहण करोगे, तब तुमको कोई दुःख न होगा। हे राम! सुख, दुःख, धन और बान्धवों का वियोग, ये सब पदार्थ अनित्य हैं। ये आते भी हैं और जाते भी हैं। इनको 'आगमापायी' जानकर विचरो। यह संसार विषमरूप है, एकरस कभी नहीं रहता। इसको स्थिर या सत् जानकर दुःखी न होना। हे राम! पदार्थ और काल जैसे जाय तैसे जाय और जैसे सुख-दुःख आवें तैसे आवें ये सब आगमापायी पदार्थ हैं, अर्थात् आते भी हैं और जाते भी हैं। इष्ट की प्राप्ति और अनिष्ट की निवृत्ति में हर्षित न होना अनिष्ट की प्राप्ति और इष्ट के वियोग में खिन्न न होना। जैसे जो आपे-
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उसे निर्लिप्त रहकर भोग करो। जिसका आना है वह आवेगा और जिसको जाना है वह जावेगा। ये सुख-दुख प्रवाहरूप हैं। इनमें आस्था करके संतप्त न होना। हे राम! यह सब जगत् तुम्हीं हो और तुम्हीं जगतरूप हो। चिन्मात्र विस्तृत आकार भी तुम्हीं हो। जब सब तुम्हीं हो, तब हर्ष या शोक किस लिए करते हो? इसी दृष्टि का आश्रय करके जगत् में सुषुप्त होकर विचरो तो तुर्यातीत अवस्था को प्राप्त होगे, जो सब प्रकाशरूप है। हे राम! जो कुछ मुझे तुमसे कहना था सो कहा है, आगे जो तुम्हारी इच्छा हो सो करो। पीछे तुमने पूछा था कि अनन्तरूप ब्रह्म में कलङ्क कैसे प्राप्त हुआ है? सो अब फिर प्रश्न करो कि मैं उत्तर दूँ।
रामजी ने कहा, हे ब्रह्मन्! अब मुझको कुछ संशय नहीं रहा; मेरे सब संशय नष्ट हो गये हैं और जो कुछ जानना था सो मैंने जान लिया। अब मैं परम अकृत्रिम तृप्ति को प्राप्त हुआ हूँ। हे मुनीश्वर! आत्मा में न मेल है, न द्वैत है और न एक दो आदि की कोई कल्पना है। पहिले मुझमें अज्ञान था तब मैंने पूछा था; अब तुम्हारे वचनों से मेरा अज्ञान नष्ट हो गया है, इसमें कुछ दोष नहीं भासित होता। आत्मा को न जन्म है, न मरण है। सब ब्रह्म ही है। हे मुनीश्वर! प्रश्न संशय से उपजता है, सो मेरा संशय नष्ट हो गया है। जैसे यन्त्री की कठपुतली न हिलाने से अचल होती है, वैसे ही संशय से रहित मेरा मन स्थिर निश्चल हो गया है। सब मार्गों का सार मुझको प्राप्त हुआ है। जैसे सुमेरु अचल है, वैसे ही मैं अचल हूँ। मुझको कोई क्षोभ नहीं। ऐसा कोई पदार्थ नहीं, जो मेरे लिए त्यागने योग्य हो और ऐसा भी कोई पदार्थ नहीं, जो ग्रहण करने योग्य हो। किसी पदार्थ की मुझको न इच्छा है, न अनिच्छा। मैं शान्तरूप स्थित हूँ। न स्वर्ग की मुझको इच्छा है, न नरक से द्वेष है। सब ब्रह्मरूप मुझको भासित होता है। मन्दराचल पर्वत की तरह मैं आत्मतत्त्व में स्थित हूँ।
हे मुनीश्वर! जिसको अवस्तु में वस्तु-बुद्धि होती है और हृदय में कल्पना स्थित होती है, वह किसी को ग्रहण करता है; किसी का
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त्याग करता है और दीनता को प्राप्त होता है । हे मुनीश्वर ! यह संसार महासमुद्ररूप है । उसमें राग द्वेषरूपी लहरें हैं और शुभ-अशुभ-रूपी मच्छ रहते हैं । ऐसे भयानक संसारसमुद्र में अब मैं आपके प्रसाद से तर गया हूँ और परम-परम सम्पदा को प्राप्त होकर मेरे दुःख नष्ट हो गये हैं । सबके सार को प्राप्त होकर में पूर्ण आत्मा हूँ । अदीन पद और परम शान्त अभेदसत्ता मुझे मिल गई है । आशारूपी हाथी को मैंने सिंह बनकर मारा है । अब मुझको आत्मा से भिन्न कुछ नहीं देख पड़ता । मेरे सब विकल्प-जाल कट गये हैं, इच्छादिक विकार नष्ट हो गये हैं और दीनता जाती रही है । तीनों जगत में मेरी जय है और में सदा उदितरूप हूँ ।
इति श्रीयोगवाशिष्टे निर्वाणप्रकरणे विश्रान्ति आगमनं नाम द्विचत्वारिंशत्तमस्सर्गः ॥ ४२ ॥
वशिष्ठजी बोले, हे राम ! जो केवल देह और इन्द्रियों से करता है और मन से नहीं करता, वह जो कुछ करता है सो कुछ नहीं करता । जो कुछ इन्द्रियों से दृष्ट मान होता है, उससे अणुमात्र सुख प्राप्त होता है । उस अणुमात्र की प्रसन्नता में जो बँध जाता है, वह बालबुद्धि मूर्ख है । जो ज्ञानवान् है, वह उसमें कभी नहीं बँधता । हे राम ! वाञ्छा ही इसको दुःखी करती है । सुन्दर विषयों की वाञ्छा होने पर जब जीव यत्न से उनको प्राप्त करता है, तब क्षणभर सुख होता है और जब उनका वियोग होता है, तब दुःखी होता है । इस कारण इन विषयों की वाञ्छा त्यागना ही उचित है । इनकी वाञ्छा तब होती है, जब स्वरूप का ज्ञान नहीं होता और देहादिक में अहंभाव होता है । जब देहादिक में अहंभाव होता है, तब अनेक अनर्थ उपस्थित होते हैं । इससे हे राम ! ज्ञानरूपी पर्वत पर चढ़ रहना और अहंतारूपी गढ़े में न गिरना । हे राम ! आत्मज्ञानरूपी सुमेरु पर्वत पर चढ़कर फिर अहंता ( अभिमान ) के गढ़े में गिरना बड़ी मूर्खता है । जब दृश्यभाव को त्यागोगे, तब अपनी स्वभावसत्ता को प्राप्त होगे । यह राम और
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शान्तरूप है और उससे विकल्पजाल सब मिट जायगा । तब समुद्र की तरह पूर्ण होगे और द्वैतरूप न प्रतीत होगा ।
हे राम ! जब हृदय में विषय को विष जाने, तब मन भी नीरस हो जाता है और चित्त निम्मग्न होता है । वास्तव में देखो तो सबमें सत्ता ब्रह्म चिद्धन समानरूप से स्थित है, पर अद्वैतस्वरूप के प्रमाद से वह नहीं भासित होता । हे राम ! आत्मा का अज्ञान ही बन्धन और आत्मा का बोध ही मुक्ति है । इससे बलपूर्वक मोह-निद्रा को छोड़ आप ही जागो, तब इस बन्धन से मुक्त होगे । हे राम ! जिसमें विषय का स्वाद नहीं और जिसमें आत्म तत्त्व का अनुभव होता है, वह आकाश-सदृश निर्मल सत्ता वासना से रहित है । वासना से रहित होकर जो पुरुष कर्म करता है, वह विकार को नहीं प्राप्त होता । यदि अनेक क्षोभ आकर प्राप्त हों तो भी उसको विकार नहीं होता । ज्ञाता, ज्ञान, ज्ञेय, ये तीनों आत्मरूप भासित होते हैं । जब ऐसा ज्ञान होता है, तब किसी का भय नहीं रहता । चित्त के चेतन से जगत् उत्पन्न होता है और चित्त के मिटने पर लीन हो जाता है । जब वासना-सहित प्राण उदय होते हैं, तब जगत् का उदय होता है और जब वासना-सहित प्राण लीन होते हैं, तब जगत् भी लीन हो जाता है । अभ्यास करके वासना और प्राणों को स्थित करो । जब मूर्खता उदय होती है तब कर्म उदय होते हैं और मूर्खता के लीन होने पर कर्म भी लीन होते हैं । इससे मत्संग और मनशास्त्रों के विचार से मूर्खता को नष्ट करो । जैसे वायु के संग में उड़कर धूल बादल का आकार धारण करती है, वैसे ही चित्त के चेतन से जगत् स्थित होता है । हे राम ! जब चित्त-जगता है, तब नाना प्रकार का जगत् प्रकट होता है, और चित्त के न जगने पर जगत् लीन हो जाता है ।
हे राम ! वासना शान्त हो अथवा प्राणों का निरोध हो, तब चित्त अचित्त हो जाता है और जब चित्त अचित्त हुआ तब जीव परमपद को प्राप्त होता है । हे राम ! दृश्य और दर्शन सम्बन्ध के बीच में जो परमात्मसुख और एकान्तसुख है, वह संवित् ब्रह्मरूप है । उसका
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साक्षात्कार होने पर मन का क्षय हो जाता है। जहाँ चित्त नहीं उपजता, वह जो चित्त से रहित अकृत्रिम सुख है। ऐसा सुख स्वर्ग में भी नहीं होता जैसे मरुस्थल में वृक्ष नहीं होते, वैसे ही चित्त-सहित विषयों में सुख नहीं होता। चित्त के उपशम में जो सुख है, वह वाणी से कहा नहीं जा सकता। उसके समान या उससे बढ़कर कोई भी सुख नहीं है। सुख का नाश हो जाता है, पर आत्मसुख का नाश नहीं होता। वह अविनाशी है और उत्पत्ति-विनाश से रहित है। हे राम! अबोध से चित्त का उदय होता है और आत्मबोध में वह शान्त हो जाता है। जैसे मोह से बालक को वेताल दिखाई देता है और मोह के नष्ट होने पर नष्ट हो जाता है, वैसे ही अज्ञान में चित्त का उदय होता है और अज्ञान के नष्ट होने पर वह नष्ट हो जाता है। यदि चित्त विद्यमान भी भासित होता है, तो भी बोध में वह निर्बीज हो जाता है। जैसे पारस से मिल-कर ताँबा सुवर्ण हो जाता है तो उसका आकार तो वही देख पड़ता है, पर ताँबे के भाव का अभाव हो जाता है, वैसे ही अज्ञान से जगत् भासित होता है और ज्ञान में चित्त अचित्त हो जाता है; जड़जगत् नहीं भासित होता, ब्रह्मसत्ता ही भासित होती है और वह सत्पद को प्राप्त होता है, परन्तु नामरूप वैसे ही भासित होते हैं। हे राम! ज्ञानी का चित्त भी कर्म करता देख पड़ता है, परन्तु चित्त अचित्त हो जाता है। जो अज्ञान में भासित होता है, वह ज्ञान में शून्य हो जाता है। जो जगत् अबोध में भासित था, वह बोध में शान्त हो जाता है, फिर नहीं उपजता। वह चित्त शान्तपद को प्राप्त होता है। कुछ समय तक तो वह भी तुरीयावस्था में स्थित विचरता है, पर फिर तुरीयातीतपद को प्राप्त होता है। अधः, ऊर्ध्व, मध्य, सर्वत्र ब्रह्म ही इस प्रकार अनेक होकर स्थित हुआ है। अनेक सम होने पर भी एक ही है और सर्वात्मा ही है—चित्तादिक कुछ नहीं।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे चित्तसत्तासूत्रणन्नाम त्रिचत्वारिंशत्तमस्सर्गः ॥ ४३ ॥
वशिष्ठजी बोले, हे राम! अब तुम संक्षेप में एक अपूर्व और
* निर्वाण प्रकरण * १२१
आश्चर्यरूप बोध देनेवाला दृष्टान्त सुनो। एक बेलफल है, जिसका विस्तार अनन्त योजन पर्यन्त है। जिमे अनन्त युग व्यतीत हो गये हैं। पर वह जर्जर कभी नहीं होता। वह अनादि है, उसमें अविनाशी रस है, इसमें कभी नाश नहीं होता। वह चन्द्रमा की तरह सुन्दर है। सुमेरु आदिक जो बड़े पहाड़ हैं उनको महाप्रलय का पवन तृण की तरह उड़ाता है; पर वह पवन भी उसको नहीं हिला सकता। हे राम! योजनों की अनन्त कोटि संख्या है, पर उसकी संख्या नहीं की जा सकती। वह बेलफल ऐसा और बहुत बड़ा है। जैसे सुमेरु के आगे राई का दाना सूक्ष्म और तुच्छ लगता है, वैसे ही उस बेलफल के आगे ब्रह्माण्ड सूक्ष्म और तुच्छ लगता है। वह बेल रस से पूर्ण है, कभी गिरता नहीं और पुरातन है। ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र, इन्द्रादिक भी उसका आदि, अन्त और मध्य नहीं जान सकते। न उसके मूल को कोई जान सकता है, न मध्य को कोई जान सकता है। उसका अदृष्ट आकार है और अदृष्ट फल है। वह अपने प्रकाश से प्रकाशित है। उसका घन आकार है। वह सदा अचल है, किसी विकार को नहीं प्राप्त होता। वह सत्, निर्मल, निर्विकार, निरन्तररूप, नीरन्ध्र और चन्द्रमा की तरह शीतल, सुन्दर है। उसमें ज्ञान-संवित्तरूपी रस है। वह अपना रस आप ही पीता है और सबको देता है। सबका प्रकाशक भी वही है। उसमें अनेक चित्ररेखाओं ने नियम किया है, परन्तु वह अपने स्वरूप को नहीं छोड़ता। अनेकरूपी भासित होता है। उसमें स्पन्दनरूपी रस भरा है। तत्वं, इदं, देश, काल, क्रिया, नीति, राग, द्वेष, हेयोपादेय, भूत, भविष्यत, काल, प्रकाश, तम, विद्या, अविद्या इत्यादि कल्पना-जाल उस रस के चेतने से चेतते हैं। वह बेल आत्मरूप है। उसमें अनुभवरूपी रस है। वह सदा अपने आपमें स्थित और नित्य शान्तरूप है। उसको जानकर पुरुष कृतकृत्य होता है।
इति श्रीयोगवाशिष्टे निर्वाणप्रकरणे बिल्वोपाख्यानं नाम चतुश्चत्वारिंशत्तमस्सर्गः ॥ ४४ ॥
१२२ 卐 योगवाशिष्ठ 卐
रामजी बोले, हे भगवन् ! सब धर्मों के जाननेवाले आपने यह वेदरूपी महाद्रुमकी वार्ता कही। सो मुझे ऐसा निश्चय हुआ कि चैतन्य ही अहंनादिक जगत् हो भासित होता है, भेद किञ्चित् भी नहीं एक या द्वैत कल्पना सब व्यर्थ है। वशिष्ठजी बोले, हे राम ! जैसे ब्रह्माण्ड की मञ्जा सुमेरु आदिक पृथ्वी है, वैसे ही चैतन्य वृक्ष की मञ्जा यह ब्रह्माण्ड है। सब जगत् चैतन्य वृक्षरूप है—भिन्न नहीं, और उस चैतन्य का विनाश नहीं हो सकता। हे राम ! चैतन्यरूपी मिर्च के बीज में जो तिक्तरूपी चमत्कार तीक्ष्णता है सो सुषुप्तवत् निर्मल और शिला के अन्तर्वत् अभिश्रित है। हे राम ! अब और आश्चर्यरूप एक आख्यान सुनो। यह सुन्दर प्रकाशयुक्त स्निग्ध और शीतल स्पर्शवाली विस्तृत एक शिला महानीलरत्न और घनरूप है। उसमें कमल उपजते हैं और उसकी ऊर्ध्व बेल है, अधः मूल है और अनेक शाखाएँ हैं। रामजी बोले, हे भगवान् ! सत्य कहते हो, यह शिला मैंने भी देखी है। वह नदी में विष्णु की मूर्ति शालग्राम है। वशिष्ठजी बोले, हे राम ! ऐसे तो तुम जानते हो और तुमने देखा भी है। परन्तु जो शिला में बताता है, वह अपूर्व शिला है, उसके भीतर ब्रह्माण्ड समूह हैं और कुछ भी नहीं। हे राम ! चैतन्यरूपी शिला जो मैंने तुमसे कही है, उसमें सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड हैं। उस घनचैतन्यता से शिला वर्णन की है। वह घनघन और नीरन्ध्र है। आकाश, पृथ्वी, पर्वत, देश, नदियाँ, समुद्र इत्यादि सभी विश्व उस शिला के भीतर स्थित हैं। जैसे शिला के ऊपर जो कमल खिले होते हैं वे शिलारूप हैं, शिला से भिन्न नहीं; वैसे ही यह जगत् आत्मरूपी शिला में है; आत्मा से भिन्न नहीं। हे राम ! भूत, भविष्यत् और वर्तमान, तीनों काल उस शिला की पुतलियाँ हैं। जैसे शिल्पी पुतलियों की कल्पना करता है, वैसे ही यह जगत् आत्मा में है, उपजा नहीं, क्योंकि मनरूपी शिल्पी कल्पना करता है और उसमें नाना प्रकार का जगत् भासित होता है; आत्मा में कुछ उपजा नहीं। जैसे सुषुप्तरूप शिला के ऊपर जो कमल-रचना लिखी होती है, वह शिला से भिन्न नहीं, वैसे ही यह जगत् आत्मा
✽ निर्वाण प्रकरण ✽ १२३
में है, आत्मा में भिन्न नहीं। जैसे शिला में जो पुतली बनी होती है, उसका उदय-अस्त नहीं होता, शिला ज्यों की त्यों रहती है, वैसे ही आत्मा में जगत् का उदय-अस्त नहीं होता; क्योंकि वास्तव में वह कुछ नहीं है। आत्मा में द्वैतकल्पना अज्ञान से होती है, और जब बोध होता है, तब शान्त हो जाती है। जैसे समुद्र में पड़ी जल की बूंद समुद्ररूप हो जाती है, वैसे ही बोध से कल्पना आत्मा में लीन हो जाती है।
हे राम ! चैतन्यआत्मा अनन्त है। उसमें कोई विकार और कल्पना नहीं है, पर अज्ञान से कल्पना उदित होती है और ज्ञान से लीन हो जाती है। विकार भी आत्मा के आश्रय से प्रतीत होते हैं, पर आत्मा विकार से रहित है। ब्रह्म से विकार उत्पन्न होते हैं और ब्रह्म ही में स्थित हैं, पर वास्तव में कुछ नहीं होता—सब आभासमात्र है। जैसे किरणों में जलाभास होता है, वैसे ही ब्रह्म में जगत्-विकार का आभास होता है। जैसे बीज में पत्र, डाल, फूल और फल का विस्तार होता है और बीजसत्ता सबमें मिली होती है, बीज से कुछ भिन्न नहीं होता, वैसे ही चिद्घन आत्मा के भीतर जगत् का जो विस्तार है, वह चिद्घन आत्मा से भिन्न नहीं; वही अपने आपमें स्थित है और जगत् भी उसी का रूप है। यदि एक मानिये तो द्वैत भी होता है और यदि एक नहीं कहा जाता तो द्वैत कहाँ हो ? जगत् और आत्मा में कुछ भेद नहीं; अद्वैत आत्मा ही अपने आपमें स्थित है। जैसे शिला में लिखी मूर्ति शिलारूप होती है, वैसे ही जगत् आत्मरूप है। और जैसे शिला में भिन्न-भिन्न विषम मूर्तियाँ होती हैं और आधाररूप शिला भिन्न है, वैसे ही आत्मा में जगन्मूर्ति भिन्न-भिन्न विषमरूप भासती है और उसका चैतन्यरूप आधार अभिन्न है, ब्रह्मसत्ता समान सुषुप्तवत् समवस्थित है। उसमें बड़े विकार भी देख पड़ते हैं, परन्तु वास्तव में वह सुषुप्तवत् विकार से रहित है। फुरने से रहित चैतन्यरूप शिला नित्य शान्त चिद्घनरूप सत्ता है, उसी में यह जगत् कल्पित है। अधिष्ठान सत्ता सर्वदा शान्तरूप है। उसमें भेद कदापि नहीं। जैसे
१२४ ❖ योगवाशिष्ठ ❖
जल में तरङ्ग और सुवर्ण में भूषण अभिन्नरूप हैं वैसे आत्मा में जगत् अभिन्नरूप है ।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे शिलाकोशउपदेशोनाम पञ्चचत्वारिंशत्तमसर्गः ॥ ४५ ॥
वशिष्ठजी बोले, हे राम ! बीज के भीतर फूल, फल और सम्पूर्ण वृक्ष होता है । उस वृक्ष का आदि भी बीज है और अन्त भी बीज है । जब फल पकता है, तब बीज भी होता है । वैसे ही आत्मा भी जगत् में है, परन्तु सदा अच्युत और सम है, कभी भेद, विकार और परिणाम को नहीं प्राप्त हुआ, अपनी सत्ता से स्थित है । जगत् के आदि, मध्य, अन्त में वही है, किसी और भाव को नहीं प्राप्त हुआ । देश, काल, कर्म आदि जो कुछ कल्पना भासित होती है, सो वही है । जो कुछ शब्द और अर्थ है, वह आत्मा से भिन्न नहीं । जैसे वृक्ष का आदि भी बीज है और अन्त भी बीज है और मध्य में जो कुछ विस्तार देख पड़ता है, वह भी वही है, भिन्न कुछ नहीं, वैसे जगत् का आदि भी आत्मसत्ता है, अन्त भी आत्मसत्ता है और जो कुछ मध्य में भासित होता है, वह भी वही है । हे राम ! चैतन्यरूपी बड़े दर्पण में सम्पूर्ण जगत् प्रतिबिम्बित होता है । सम्पूर्ण जगत् संकल्प-मात्र है । जैसा-जैसा किसी में इसका स्फुरण दृढ़ होता है, वैसे ही वैसे आत्मसत्ता के आश्रित होकर वह भासित होता है । जैसे चिन्तामणि में जैसा कोई संकल्प रखता है, वैसा ही वह पदार्थ प्रकट होता है, और वह वास्तव में संकल्पमात्र ही होता है, वैसे ही जैसी जैसी भावना कोई करता है, वैसी ही वैसी आत्मा के आश्रय से भासित होता है । अनन्त जगत् आत्मरूपी मणि के आश्रय में स्थित होते हैं । जैसी कोई भावना करता है, वैसी ही उसकी देख पड़ती है । हे राम ! आत्मरूपी सम्पुट में जगतरूपी रत्न निकलते हैं । जैसा स्फुरण होता है, वैसा ही जगत् भासित होता । जैसे शिला के ऊपर रेखाएं होती हैं और उनमें जो नाना प्रकार के चित्र उभरते हैं सो अनन्यरूप हैं, वैसे ही आत्मा में जगत् अनन्यरूप है । जैसे शिला के ऊपर शंख-चक्रादिक