योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
७४ ❊ योगवाशिष्ठ ❊
स्थान में सदाशिव बैठे थे; सो ऐसे कहकर उठ खड़े हुए और अपने गणों सहित मेरी कुटी में आये। वहाँ मैंने पुष्प और अर्घ्य से उनके चरणों की पूजा करके फिर हाथों की पूजा की। इसी प्रकार चरणों से लेकर शीश पर्यन्त सब अङ्गों की पूजा की। फिर गौरी भगवती का पूजन करके उनकी सखियों और शिव के गणों को पूजा। हे रामजी! इस प्रकार भक्तिपूर्वक जब मैं पार्वती परमेश्वर का पूजन कर चुका, तब शशिकलाधारी शिवजी ने शीतल वाणी से मुझसे कहा कि हे ब्राह्मण! नाना प्रकार की बिन्तनेवाली जो चित्तवृत्ति है, वह तुम्हारे स्वरूप में विश्रान्ति को प्राप्त हुई है और तुम्हारी संवित् आत्मपद में स्थित हुई है। तुम्हारे शिष्यों का कल्याण तो है और तुम्हारे पास जो हरिण विचरते हैं, वे भी सुख में हैं? मन्दार वृक्ष तुमको पूजा के निमित्त फूल-फल भली प्रकार देते हैं और गङ्गाजी तुमको भली प्रकार स्नान कराती हैं? देह के इष्ट-अनिष्ट की प्राप्ति में तुमको खेद तो नहीं होता? इस पर्वत में कुबेर के अनुचर यक्ष और राक्षस जो रहते हैं, वे तुमको दुःख तो नहीं देते और मेरे गण जो निशाचर हैं, वे तो तुमको कष्ट नहीं पहुँचाते?
हे रघुनन्दन ! इस प्रकार जब देवेश ने मुझसे वाञ्छित प्रश्न किये, तब मैंने उनसे कहा—हे कल्याणरूप महेश्वर ! जो तुमको सदा स्मरण करते हैं, उनको इस लोक में ऐसा कोई पदार्थ नहीं जो पाना कठिन हो। उनको भय भी किसी का नहीं। जिनका चित्त तुम्हारे स्मरण के आनन्द में सब ओर से पूर्ण हुआ है, वे जगत में दीन नहीं होते। वही देश उन्हीं जनों के चरण और वही दिशा तथा पर्वत वन्दना करने के योग्य हैं, जहाँ एकान्त बुद्धि से बैठकर तुम्हारा स्मरण होता है। हे प्रभो ! तुम्हारा स्मरण पूर्वपुण्यरूपी वृक्ष का फल है, जो वर्तमान कर्मों से सिंचता है। तुम मन के परम मित्र हो। तुम्हारा स्मरण सब आपदाओं को हरनेवाला है। वह सर्व सम्पदारूपी लता को बढ़ानेवाला वसन्तऋतु है। हे प्रभो ! तुम्हारा स्मरण बड़ी महिमा और बड़े से बड़े कर्मों के कारण का भी कारण है। हे प्रभो ! तुम्हारा स्मरण विवेकरूपी
❊ निर्वाण प्रकरण ❊ ७५
समुद्र में परमार्थरूपी रत्न है; अज्ञानरूपी तम का नाशकर्ता सूर्य का समूह है; ज्ञान-अमृत का कलश, धैर्यरूपी चाँदनी का चन्द्रमा और मोक्ष का द्वार है । हे प्रभो ! तुम्हारा स्मरण अपूर्व उत्तम दीपक है । वह चित्त का मन्दिर जो संसार है, उस सबको प्रकाशित करता है । हे प्रभो ! तुम्हारा स्मरण उदार चिन्तामणि की नाईं सब आपदाओं को निवृत्त करनेवाला और बड़े उत्तम पद को देनेवाला है । हे प्रभो ! तुम्हारा स्मरण एक क्षण भी चित्त में स्थित हो तो सब दुःख और भय नष्ट करता है और वरदायक है । उसके बल से मैं भी तुम्हारी भाँति सुख से बसता हूँ ।
वाल्मीकिजी बोले कि इस प्रकार जब मुनीश्वर ने कहा, तब दिन का अन्त हुआ । सब लोग परस्पर नमस्कार करके अपने-अपने स्थान को गये और सूर्य की किरणों के उदय के साथ फिर अपने अपने आसन पर आ बैठे ।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे रुद्रवशिष्ठसमागमो नाम सप्तविंशतितमस्सर्गः ॥ २७ ॥
वशिष्ठजी बोले, हे राम ! जब मैंने इस प्रकार कहा, तब गौरी भगवती जगत्-माता, जैसे माता पुत्र से कहे, मुझसे बोलीं—हे वशिष्ठ ! पतिव्रताओं में मुख्य अरुन्धती कहाँ है ? उसको ले आओ । वह मेरी प्यारी सखी है । उससे मैं कथा-वार्ता करूँगी । हे रामजी ! इस प्रकार जब मुझसे पार्वती ने कहा, तब मैं शीघ्र ही जाकर अरुन्धती को ले आया । वे दोनों परस्पर कथा-वार्ता करने लगीं । मैंने विचारा कि मुझको ईश्वर मिले हैं और पूछने का अवसर भी पाया है, इससे सर्व ज्ञान के समुद्र से पूछकर संदेह दूर करूँ । हे राम ! ऐसे विचार करके मैंने गौरीश से जो पूछा और जो कुछ चन्द्रकलाधारी ने मुझसे कहा, वह तुमसे कहता हूँ । मैंने पूछा, हे भगवन् ! तुम भूत, भविष्य और वर्तमान, तीनों कालों के ईश्वर और सब कारणों के कारण हो । तुम्हारे प्रसाद से मैं कुछ पूछने को समर्थ हुआ हूँ । हे महादेव ! जो कुछ मैं पूछता हूँ, उसे प्रसन्नबुद्धि हो, उद्वेग को त्याग कर, शीघ्र ही कहौ ।
७६ $$\text{❊ योगवाशिष्ठ ❊}$$
हे सब पापों के नाशक और सब कल्याण की वृद्धि करनेवाले ! देव-अर्चन का विधान मुझसे कहो ।
ईश्वर बोले, हे ब्राह्मण ! जो उत्तम देव-अर्चन है और जिसके किये से संसारसमुद्र से जीव तर जाता है, सो सुनो । हे ब्राह्मणों में श्रेष्ठ ! पुण्डरीकाक्ष विष्णु देव नहीं और त्रिलोचन शिव भी देव नहीं । कमल से उपजा ब्रह्मा भी देव नहीं और सहस्रनेत्र इन्द्र भी देव नहीं । न देव पवन है, न सूर्य है, न अग्नि है, न चन्द्रमा है, न ब्राह्मण है, न क्षत्रिय है, न तुम हो, न में हूँ, न देह है, न चित्त है और न कलनारूप है । अकृत्रिम, अनादि, अनन्त और संवित्रूप ही देव कहाता है । आकारा-दिक परिच्छिन्नरूप हैं, वे वास्तव में कुछ नहीं । एक अकृत्रिम, अनादि, अनन्त, चैतन्यरूप देव हैं । वही देव शब्द का वाचक है और उसी का पूजन पूजन है । उस देव को, जिससे यह सब हुआ है और जो सत्ताशान्त-आत्मरूप है, सर्वत्र व्याप्त देखना ही उसका पूजन है पर जो उस संवित्तत्त्व को नहीं जानते, उनके लिए साकार की अर्चना का विधान है । जैसे जो पुरुष योजनपर्यन्त नहीं चल सकता, उसको एक कोस दो कोस का चलना भी भला है, वैसे ही जो पुरुष अकृत्रिम देव की पूजा नहीं कर सकता, उसको साकार का पूजना भी भला है । हे ब्राह्मण ! जिसकी भावना कोई करता है, उसके फल उसी के अनुसार भोगता है । जो परिच्छिन्न (खण्डित) की उपासना करता है, उसको फल भी परिच्छिन्न प्राप्त होता है और जो अकृत्रिम, आनन्द-रूप, अनन्त देव की उपासना करता है, उसको वही परमात्मरूपी फल प्राप्त होता है । हे साधो ! अकृत्रिम फल को त्याग कर जो कृत्रिम को चाहते हैं, वे ऐसे हैं जैसे कोई मन्दार वृक्ष के वन को त्याग कर कंटक के वन को प्राप्त हो । वह देव कैसा है, उसकी पूजा क्या है और क्योंकर होती है, सो सुनो ।
बोध, साम्य और शम, ये तीन फूल हैं । बोध सम्यक्ज्ञान का नाम है; अर्थात् आत्मतत्त्व को ज्यों का त्यों जानना । साम्य मनमें पूर्ण देखने को कहते हैं और शम का अर्थ यह है कि चित्त को निवृत्त
✹ निर्वाण प्रकरण ✹
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करना और आत्मतत्त्व से भिन्न कुछ न देखना । इन्हीं तीनों फूलों से चिन्मात्र शुद्ध देव शिव की पूजा होती है; आकार की अर्चना से अर्चा नहीं होती । चिन्मात्र आत्मसंवित् को त्यागकर और जड़ की जो अर्चना करते हैं, वे चिरकाल पर्यन्त क्लेश के भागी होते हैं । हे ब्राह्मण ! जो ज्ञात-ज्ञेय पुरुष हैं, आत्मध्यान से भिन्न पूजन-अर्चन को बालक की क्रीड़ा सा मानते हैं । आत्मा भगवान् एक देव है । वही शिव और परम कारणरूप है । उसका सर्वदा ज्ञान-अर्चन से पूजन करो । और कोई पूजा नहीं है । चैतन्य, आकाश और निरवयव स्वभाव एक आत्मदेव को जानो । पूज्यपूजक और पूजा त्रिपुटी से आत्मदेव की पूजा नहीं होती । मैंने पूछा, हे भगवन् ! चैतन्य आकाशमात्र आत्मा को कैसे जगत् और चैतन्य को कैसे जीव कहते हैं, सो कहो ।
ईश्वर बोले, हे मुनीश्वर ! चैतन्य आकाश प्रसिद्ध है । वह प्रकृति से रहित है । जो महाकल्प में शेष रहता है, वह आप ही किंचनरूप होता है । उसी किंचन से यह जगत् होता है । जैसे स्वप्न में चिदात्मा ही सर्वगत जगतरूप होकर भासता है, वैसे ही जाग्रत् जगत् भी चिदाकाशरूप है । आदि सर्ग से लेकर इस काल पर्यन्त आत्मा से भिन्न पदार्थ का अभाव है । जैसे स्वप्न में जो जगत् भासता है, सो भी सब चिदाकाशरूप है, भिन्न कल्पना कोई नहीं । चिन्मात्र ही पहाड़रूप है, चिन्मात्र ही जगत् है, चिन्मात्र ही आकाश है, चिन्मात्र ही सब जीव है, और चिन्मात्र ही सब भूत है, चिन्मात्र से भिन्न कुछ नहीं । सृष्टि के आदि से अन्त पर्यन्त जो कुछ द्वैतकल्पना भासती है, सो भ्रममात्र है । जैसे स्वप्न में कोई किसी के अङ्ग काटे सो वास्तव में काटता तो नहीं, निद्रा-वेश से ऐसा लगता है, वैसे ही यह जाग्रत् जगत् भी भ्रममात्र है । हे मुनीश्वर ! आकाश, परमाकाश और ब्रह्माकाश, तीनों एक ही के पर्याय हैं । जैसे स्वप्न में संकल्परूप माया से जो अनुभव होता है सो सब चिदाकाश है, वैसे ही यह जाग्रत् जगत् चिदाकाशरूप है । जैसे स्वप्नपुर आकाश में भिन्न नहीं होता, वैसे जाग्रत् स्वप्न भी आत्मतत्त्व होकर भासित होता है, आत्मा
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से भिन्न वस्तु नहीं है। हे मुनीश्वर ! जैसे स्वप्न में चिदाकाश ही घट, पट आदि के रूप में भासित होता है, वैसे ही स्थिति-प्रलयादि जगत् चिदात्मा से भिन्न नहीं है; आत्मा ही ऐसे भासित होता है। जैसे शुद्ध संवित् मात्र से भिन्न स्वप्न में नगर नहीं पाया जाता, वैसे ही जाग्रत् में अनुभव से भिन्न कुछ नहीं पाते। हे मुनीश्वर ! जगत् जो तीनों कालों में भाव-अभावरूप पदार्थ होकर भासित होता है, सो सब चिदाकाशरूप है, आत्मा से भिन्न नहीं। हे मुनीश्वर ! यह देव का रूप मैंने तुमसे परमार्थ कहा है। तुम में और सर्वभूत जाति जगत् में सबका जो देव है, वह चिदाकाश परमात्मा है—उससे भिन्न कुछ नहीं। जैसे संकल्प-पुर में चिदाकाश ही शरीररूप से भासित होता है, उससे भिन्न कुछ नहीं, वैसे ही यह सब चिदाकाशरूप है।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे ईश्वरोपाख्याने जगत्परमात्म-रूपवर्णनन्नामाष्टाविंशतितमस्सर्गः ॥ २८ ॥
ईश्वर बोले, हे ब्राह्मण ! इस प्रकार यह सब विश्व केवल परमात्मारूप है। परमात्माकाश ब्रह्म ही एक देव कहलाता है, उसी का पूजन सार है और उसी से सब फल प्राप्त होते हैं। वह देव सर्वज्ञ है और सब उसमें स्थित हैं। वह अकृत्रिम देव अज, परमानन्द और अखण्डरूप है। उसको साधना करके पाना चाहिए, जिससे परम सुख प्राप्त होता है। हे मुनीश्वर ! तुम जागे हुए हो, इस कारण मैंने तुमसे इस प्रकार की देव अर्चना कही है। पर जो असम्यग्दर्शी बालक हैं, जिनको निश्चयात्मक बुद्धि नहीं प्राप्त हुई, उनके लिए धूप, दीप, पुष्प, चन्दन आदिक से अर्चना कही है और आकार कल्पित करके देव की मिथ्या कल्पना की है। हे मुनीश्वर ! अपने संकल्प में जो देव बनाते हैं और उसको पुष्प, धूप, दीपादिक से पूजते हैं, सो भावनामात्र है। उससे उनको संकल्परचित फल की प्राप्ति होती है। यह बाल-बुद्धि की अर्चना है। तुम जैसों की वही पूजा है, जो तुमसे सर्व आत्म-भावना में मैंने कही है। हे मुनीश्वर ! हमारे मन में तो देव और कोई नहीं; एक परमात्मा देव ही तीनों भुवनों में है। वही देव शिव और सर्वपद से अतीत है। वह सब संकल्पों से रहित है।
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सब संकल्पों का अधिष्ठान भी वही है। वह देश-काल और वस्तु के परिच्छेद से रहित और सब प्रकार शान्तरूप एक चिन्मात्र निर्मल-स्वरूप है। वही देव कहलाता है। हे मुनीश्वर ! जो संवित्सत्ता पञ्चभूत-कला से अतीत और सब भावों के भीतर स्थित है, वही सबको सत्ता देनेवाला देव है। सबकी सत्ता हरनेवाला भी वही है।
हे ब्राह्मण ! जो ब्रह्म सत्य-असत्य के मध्य और सत्य-असत्य के परे कहाता है, वही देव परमात्मा है। जो परम स्वतः सत्तास्वभाव से सबको प्राप्त हुआ है और महाचित्त कहाता है, वही परमात्म देव सत्ता है। जैसे सब वृक्षों व लताओं के भीतर रस स्थित है, वैसे ही समान सत्ता रूप से परमचेतन आत्मा सर्वत्र स्थित है। जो चैतन्यतत्त्व अरुन्धती का है और चैतन्यतत्त्व तुम निष्पाप मुनि का और पार्वती का है, वही चैतन्यतत्त्व मेरा है। वही चैतन्यतत्त्व त्रिलोकी मात्र का है, वही देव है और कोई देव नहीं। हाथ-पाँव से युक्त जिस देव की कल्पना करते हैं, वह चिन्मात्र सार नहीं है। चिन्मात्र ही सब जगत् का सारभूत है और वही अर्चना करने योग्य है। उससे सब फलों की प्राप्ति होती है। वह देव कहीं दूर नहीं और किसी प्रकार किसी को प्राप्त होना भी कठिन नहीं। जो सबकी देह में स्थित और सबका आत्मा है, वह दूर कैसे हो और कठिनता से कैसे प्राप्त हो। सब क्रिया वही करता है। भोजन, भरण और पोषण वही करता है। वही श्वास लेता है। सबका ज्ञाता भी वही है। वह पुर्यष्टका में प्रतिबिम्बित होकर प्रकाशित होता है। जैसे पर्वत पर जो चर-अचर की चेष्टा होती है और चलते बैठते और स्थित होते हैं, उन सबका आधारभूत पर्वत है, वैसे ही मन सहित षट्इन्द्रियों की चेष्टा आत्मा के आश्रय में होती है। उसी की संज्ञा व्यवहार के निमित्त तत्त्ववेत्ताओं ने देव कल्पित की है। एकदेव, चिन्मात्र, सूक्ष्म, सर्वव्यापी, निरञ्जन, आत्मा, ब्रह्म इत्यादि नाम ज्ञानवानों ने उपदेशरूप व्यवहार के निमित्त रक्खे हैं। हे मुनीश्वर ! जो कुछ विस्तार सहित जगत् भासता है, उस सबका वह प्रकाशक है और सबसे रहित भी है। वह नित्य, शुद्ध और अद्वैतरूप है और सब जगत् में अनुस्यूत
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है । जैसे वसन्तऋतु में नाना प्रकार के फूल और वृक्ष दिखते हैं, पर सबमें एक ही रस व्याप रहा है और अनेक रूप भासित होता है, वैसे ही एक ही आत्मसत्ता अनेक रूप देख पड़ती है ।
हे मुनीश्वर ! जो कुछ जगत है सो सब आत्मा का चमत्कार है और आत्मतत्त्व में ही स्थित है । कहीं आकाश, कहीं जीव, कहीं चित्त और कहीं अहंकाररूप है । कहीं दिशारूप, कहीं द्रव्य, कहीं भाव-विकार, कहीं तम, कहीं प्रकाश और कहीं सूर्य, पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु आदिक स्थावर जङ्गमरूप होकर स्थित है । जैसे समुद्र में तरङ्ग और बुलबुले होते हैं, वैसे ही एक परमात्मा देव में त्रिलोकी है । हे मुनीश्वर ! देवता, दैत्य, मनुष्य आदि सब एक देव में रहते हैं । जैसे जल में तृण बहते हैं, वैसे ही परमात्मा में जीव रहते हैं । वही चैतन्यतत्त्व चतुर्भुज होकर दैत्यों का नाश करता है, जैसे जल मेघरूप होकर धूप को रोकता है । वही चैतन्यतत्त्व त्रिनेत्र, मस्तक पर चन्द्र धारण किये, वृषभ पर आरूढ़, पार्वतीरूप कमलिनी के मुख का भँवरा बना रुद्र होकर स्थित होता है । वही चेतना विष्णुरूपसत्ता है, जिसके नाभि-कमल से ब्रह्मा, त्रिलोकी, वेदत्रयरूप कमलिनी की लता बढ़ी होकर स्थित हुई है । हे मुनीश्वर ! इस प्रकार एक ही चैतन्यतत्त्व अनेक रूप होकर स्थित हुआ है । जैसे एक ही रस अनेक रूप होता है और जैसे एक ही सुवर्ण अनेक भूषण बनता है, वैसे ही एक ही चैतन्य अनेक रूप होकर दिखता है । इससे सब देह एक चैतन्यतत्त्व की हैं । जैसे एक वृक्ष के अनेक पत्ते होते हैं, वैसे एक ही चैतन्य की सब देह हैं । वही चैतन्य मस्तक पर चूड़ामणि धारनेवाला त्रिलोकपति इन्द्र है । देवतारूप होकर वही स्थित हुआ है और दैत्यरूप होकर भी वही स्थित है । मरने और उपजने का रूप भी वही रखता है । जैसे एक समुद्र में जो तरङ्ग के समूह उपजते और मिट जाते हैं, सो सब जलरूप ही हैं, वैसे ही उत्पत्ति और विनाश चैतन्य में होता है । वह चैतन्यरूप परमात्मा एक ही वस्तु है ।
हे मुनीश्वर ! चैतन्यरूपी आदर्श में जगतरूपी प्रतिबिम्ब पड़ता है
❇ निर्वाण प्रकरण ❇ ८१
और अपनी रची हुई वस्तु को आप ही ग्रहण करके अपने में धारण करता है । जैसे गर्भिणी स्त्री अपने गर्भ को धारण करती है, वैसे ही चैतन्यतत्त्व जगतरूप प्रतिबिम्ब को धारण करता है । हे मुनीश्वर ! सब क्रियाएँ उसी देव से सिद्ध होती हैं और सूर्यादिक उसी से प्रकाश देते और प्रफुल्लित होते हैं । जैसे नील और रक्त कमल सूर्य से प्रफुल्लित होते हैं, वैसे ही आत्मा में अन्धकार और प्रकाश, दोनों सिद्ध होते हैं । हे मुनीश्वर ! त्रिलोकीरूप धूल चेतनरूपी वायु से उड़ती है । जो कुछ जगत् के आरम्भ हैं, उन सबको चैतन्यरूपी दीपक प्रकाशित करता है । जैसे जल सींचने से बेल प्रफुल्लित होती है और फूल-फल उत्पन्न करती है वैसे ही चैतन्यसत्ता सब पदार्थों को प्रकट और सबको सत्ता देकर सिद्ध करती है । हे मुनीश्वर ! चैतन्य ही में जड़ की सिद्धि और चेतन ही में जड़ का अभाव होता है । जैसे प्रकाश ही से अन्धकार सिद्ध होता है और प्रकाश ही से अन्धकार का अभाव होता है, वैसे ही सब देह चैतन्य से सिद्ध होते हैं और चैतन्य ही देहों का अभाव होता है । विष्णु भी उसी में होते हैं और शिवजी भी उसी में होते हैं । हे मुनीश्वर ! ऐसा पदार्थ कोई नहीं, जो चैतन्य बिना सिद्ध हो । जो कोई पदार्थ है सो आत्मा ही से सिद्ध होता है ।
हे मुनीश्वर ! शरीररूपी सुन्दर वृक्ष की बड़ी ऊँची डालें हैं, परन्तु चैतन्यरूपी मञ्जरी बिना वह नहीं सोहता । जैसे रस बिना वृक्ष नहीं सोहता, वैसे ही चैतन्य बिना शरीर नहीं सोहता । बढ़ना, घटना आदि जो विकार हैं, वे एक आत्मा से ही सिद्ध होते हैं । यह सब जगत् चैतन्यरूप है और चैतन्यमात्र ही अपने आपमें स्थित है । इतना कह वशिष्ठजी बोले, हे राम ! जब इस प्रकार अमृतरूपी वाणी से त्रिनेत्र ने मुझसे कहा, तब मैंने नम्रता से पूछा—हे देव ! जब सब जगत् चैतन्य व्यापकरूप देव है और चैतन्य ही बड़े विस्तार को प्राप्त हुआ है, तब यह प्रथम चेतन था, अब यह चेतनता से रहित है, इस कल्पना का सब लोकों में प्रत्यक्ष अनुभव कैसे होता है ? ईश्वर बोले, हे ब्रह्मवेत्ताओं में श्रेष्ठ । यह महाप्रश्न तुमने किया है । इसका उत्तर सुनो ।
८२ ❇ योगवाशिष्ठ ❇
इस शरीर में दो चेतन स्थित हैं। एक चैतन्योन्मुखत्वरूप है और दूसरा निर्विकल्प आत्मा। जो चेतन चैतन्योन्मुखत्व दृश्य से मिला हुआ है, वह जीव संकल्प के फुरने से अन्य की भाँति हो गया है, पर वास्तव में और कुछ नहीं हुआ, केवल दृश्य संकल्प के अनुभव को ग्रहण करने से वही जीवरूप हुआ है। जैसे स्त्री अपने शीलधर्म को त्यागकर दुराचारिणी हो जाती है तो उसकी शीलता जाती रहती है, परन्तु स्त्री का स्वरूप नहीं जाता, वैसे ही चैतन्योन्मुखत्व मे अनुभवरूपी जीवरूप हो जाता है, परन्तु चैतन्यस्वरूप का त्याग नहीं करता। जैसे संकल्प के वश से पुरुष एक क्षण में और रूप हो जाता है, वैसे ही चित्तसत्ता फुरने के भाव से अन्य रूप हो जाती है।
हे मुनीश्वर ! आदि में चित्त का स्पन्दन चित्कला में हुआ है। तब शब्द के चेतने से आकाश हुआ। फिर स्पर्श तन्मात्रा के चेतने से वायु प्रकट हुआ। इसी प्रकार पाँचों तन्मात्राओं के चेतने से पञ्चतत्त्व हुए। फिर देश आदि का विभाग हुआ, उसमें जीव प्रतिबिम्बित हुआ। फिर निश्चयवृत्ति हुई। उसका नाम बुद्धि हुआ। फिर अहंवृत्ति चेती। उसका नाम अहंकार हुआ। फिर संकल्प-विकल्पवृत्ति चेती। उसका नाम मन हुआ। चिन्तना से चित्त हुआ। फिर संसार की भावना हुई। तब संसार का अनुभव हुआ और अभ्यास-वश संसार भासित होने लगा। जैसे विपर्ययभावना करके ब्राह्मण अपने को चाण्डाल जाने, वैसे ही भावना के विपर्यय से वही चैतन्य अपने को जीव मानने लगा है। संकल्प की दृढ़ता से वही चैतन्य चेतनरूपी जीवरूप को ग्रहण कर संकल्प में बरतता है और अनन्त संकल्पों से जड़ता तीव्रता को प्राप्त होकर जड़भाव को ग्रहण कर देहभाव को प्राप्त होती है। जैसे जल दृढ़ जड़ता से बरफ बन जाता है, वैसे ही चैतन्य जब अनन्त संकल्पों से जड़ देहभाव को प्राप्त होता है, तब चित्त मन मोहित हो जड़ता का आश्रय करके संसार में जन्म लेता है और मोह के कारण तृष्णा से पीड़ित होता और काम, क्रोधसंयुक्त भाव-अभाव को प्राप्त होता है। एवं अपनी अनन्तता को त्यागकर परिच्छिन्न व्यवहार में
❇ निर्वाण प्रकरण ❇ ८३
बरतता है; दुःखदायक अग्नि से तप्त हो शून्यभाव को प्राप्त होता है और भेद को ग्रहण करके महादीन हो जाता है ।
हे मुनीश्वर ! मोहरूपी गड्ढे में जीवरूपी हाथी फँसा है और भाव-अभाव से सदा चलायमान होता है। जैसे जल में तृण बहता है, वैसे ही असाररूप संसार में विकारसंयुक्त जीव रागद्वेष से तपता रहता है, शान्ति कभी नहीं पाता। जैसे जत्थे से बिछुड़ा मृग कष्ट पाता है, वैसे ही आवरणरूप जन्म-मरण से जीव कष्ट पाता है और अपने संकल्प से आप ही भय पाता है। जैसे बालक अपनी परछाहीं में वैताल की कल्पना कर आप ही भय पाता है, वैसे ही जीव अपने संकल्प से आप ही भयभीत होता है और संकट में पड़ता है। आशारूपी फाँसी में बँधा हुआ जीव कष्ट पर कष्ट पाता है और कर्मों को करके संतप्त होता हुआ अनेक जन्म पाता है और भयातुर रहता है। बालपन में महादीन और परवश होता है। यौवन की अवस्था में कामादिक के वश हुआ स्त्री में रत रहता है और वृद्ध अवस्था में चिन्ता-मग्न होता है। जब मृतक होता है, तब कर्म-वश फिर जन्म लेता और गर्भ में दुःख पाता है। फिर बालक, यौवन, वृद्ध और मृतक अवस्था को पाता है। स्वरूप से गिरा हुआ जीव इसी प्रकार भटकता है, कदापि स्थिर नहीं होता।
हे मुनीश्वर ! एक चित्सत्ता स्पन्दनभाव से अनेक भावों को प्राप्त होती है। कहीं दुःख से रुदन करती है, कहीं दुःख भोगती है। कहीं स्वर्ग में देवाङ्गना, पाताल में नागिनी, असुरों में असुरी, राक्षसों में राक्षसी, वनकोट में वानरी, सिंहों में सिँही, किन्नरों में किन्नरी, हरिणों में हरिणी, विद्याधरों में विद्याधरी, गन्धर्वों में गन्धर्वी, देवताओं में देवी इत्यादि जो रूप रचती है सो चैतन्योन्मुखत्व जीवकाल है। क्षीर-समुद्र में वह विष्णुरूप होकर स्थित होती है। ब्रह्मपुरी में ब्रह्मारूप होती है। पञ्चमुख होकर रुद्र होती है और स्वर्ग में इन्द्र होती है। तीक्ष्णकला से दिन का कर्त्ता सूर्य होती है और क्षण, दिन, मास, वर्ष का विभाग करती है। वही चन्द्रमा होकर रात्रि करती और काल होकर
८४ ❊ योगवाशिष्ठ ❊
नक्षत्रमंडल को घुमाती है । कहीं प्रकाश, कहीं तम, कहीं बीज, कहीं पाषाण, कहीं मन होती है । कहीं नदी होकर बहती है, कहीं फूल होकर फूलती है, कहीं भँवर होकर सुगन्ध लेती है, कहीं फल होकर दिखती है, कहीं वायु होकर चलती है, कहीं अग्नि होकर जलाती है, कहीं बरफ बनती है और कहीं आकाश होकर देख पड़ती है । हे मुनीश्वर ! इसी प्रकार सर्वगत सर्वात्मा सर्वशक्तिसत्ता से एक ही रूप चित्शक्ति और आकाश से भी निर्मल है । जीव जैसे चेतता है, वैसा ही होकर स्थित हुआ है । जैसी-जैसी भावना करता है, शीघ्र ही उसका वैसा रूप हो जाता है । परन्तु वह स्वरूप से भिन्न नहीं होता । जैसे समुद्र में फेन तरङ्ग होकर बहते हैं, परन्तु जल से भिन्न नहीं—जल ही जल हैं, वैसे ही चित्शक्ति अनेक रूपों को रखती है, परन्तु चैतन्य से भिन्न नहीं होती । चित्शक्ति ही कहीं हंस, कहीं काक, कहीं शूकर, कहीं मक्खी, चिड़िया इत्यादि रूप रखकर संसार में प्रवृत्त होती है । जैसे जल में पड़ा तृण भ्रमता है, वैसे ही भ्रमती है और अपने संकल्प से आप ही भय पाती है । जैसे गधा अपना शब्द सुन आप ही दौड़ता है और भय पाता है, वैसे ही जीव अपने संकल्प से आप ही भय पाता है ।
हे मुनीश्वर ! यह मैंने जीवशक्ति का आचार तुमसे कहा । इसी आचार को ग्रहण करके बुद्धि नीच पशुधर्मिणी हुई है और स्वरूप के प्रमाद से जैसा-जैसा संकल्प करती है वैसी ही वैसी कर्मगति को प्राप्त हो शोकातुर होती है, अनन्त दुःख पाती है और अपने मोह से ही मलिन होती है । जैसे भूसी से ढका चावल-कूँडा पीटा जाता है; फिर फिर बोया जाता है; फिर फिर उगता है और काटा जाता है, वैसे ही स्वरूप के आवरण से, दुर्भाग्य से जीवकला जन्म-मरण के दुःख को प्राप्त होती है । जैसे भर्त्ता रहित स्त्री शोक से व्याकुल होती है, वैसे ही जीवकला कष्ट पाती है । हे मुनीश्वर ! जड़दृश्य और अनात्मरूप में प्रीति करने और जिन स्वरूप के विस्मरण मे आशारूपी फाँसी से बँधा हुआ चित्त जीव को नीच योनि में पहुँचाता है । जैसे घटीयन्त्र कभी नीचे जाता
❇ निर्वाण प्रकरण ❇ <span style="float:right;">८५</span>
है और कभी ऊपर को, वैसे ही जीव आशा के वश कभी पाताल और कभी आकाश को जाता है ।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे वशिष्ठेश्वरसंवादे चैतन्यो- न्मुखत्वविचारो नामैकोनत्रिंशत्तमसर्गः ॥ २९ ॥
ईश्वर बोले, हे मुनीश्वर ! स्वरूप के विस्मरण से जो इस प्रकार होता है कि मैं मारनेवाला हूँ, मैं दुखी हूँ, सो अनात्मा में अहं प्रतीति करके ही जीव दुःख का अनुभव करता है । जैसे स्वप्न में पुरुष अपने को पर्वत से गिरता देख दुखी होता है और अपने को मृतक देखता है, वैसे ही जीव स्वरूप के प्रमाद से अनात्मा में आत्म-अभिमान करके आपको दुखी देखता है । हे मुनीश्वर ! शुद्ध चैतन्यतत्त्व में जो चित्तभाव हुआ है, वही चित्तकला चेतने से जगत् का कारण हुआ है, परन्तु वास्तव में स्वरूप से भिन्न नहीं है । जैसे-जैसे चित्तकला चेतती गई है, वैसे ही वैसे जगत् होता गया है । वह चित्त का कारण भी नहीं हुआ और जब कारण ही नहीं हुआ, तब कार्य किसको कहिये ? हे मुनीश्वर ! न वह चित्त है, न चेतन है, न चेतनेवाला है, न द्रष्टा है, न दृश्य है और न दर्शन है; जैसे पत्थर में तेल नहीं होता । न कारण है, न कर्म है और न कारण इन्द्रियाँ हैं; जैसे चन्द्रमा में श्यामता नहीं होती । न वह मन है और न मानने योग्य दृश्य वस्तु है, जैसे आकाश में अंकुर नहीं होता । न वह अहंता है, न तम है और न दृश्य है; जैसे शंख को श्यामता नहीं होती । हे मुनीश्वर ! न वह विविध या अनेक है, न विविधता-रहित एक है; जैसे अणु में सुमेरु नहीं होता । न वह शब्द है, न स्पर्श का अर्थ है; जैसे मरुस्थल में बेल नहीं होती । न वस्तु है, न अवस्तु है; जैसे बरफ में उष्णता नहीं होती । न शून्य है, न अशून्य है, न जड़ है, न चेतन है; जैसे सूर्यमण्डल में अन्धकार नहीं होता । हे मुनीश्वर ! शब्द और अर्थ इत्यादि की कल्पना भी उसमें नहीं; जैसे अग्नि में शीतलता नहीं होती । वह तो केवल केवलीभाव अद्वैत चिन्मात्र तत्त्व है स्वरूप से किसी को कुछ भी दुःख नहीं होता ।
हे मुनीश्वर ! जगत् और असत् जानकर अभावना करना और आत्मा
८६ ✻ योगवाशिष्ठ ✻
को सत् जानकर भावना करना । इस भावना से सब अनर्थ निवृत्त हो जाते हैं । पर यह और किसी उपाय से नहीं प्राप्त होती अपने आप ही प्राप्त होती है और अनादि ही सिद्ध है । जब उस आत्मा की ओर भावना होती है, तब सब भ्रम मिट जाते हैं और जब अनात्म भावना होती है, तब उसका पाना कठिन होता है । जो यत्न के साथ है सो यत्न बिना नहीं पाया जाता । आत्मा निर्विकल्प, अद्वैत और सबसे अतीत है, उसे अभ्यास बिना कैसे पा सकते हैं ? आत्मतत्त्व परम, एक स्वच्छ, तेज का भी प्रकाशक, सर्वगत, निर्मल, नित्य सदा उदित, शक्तिरूप, निर्विकार और निरञ्जन है । घट, पट, वट, वृक्ष, गादी, वानर, दैत्य, देवता, समुद्र, हाथी इत्यादि स्थावर-जङ्गमरूप जो कुछ जगत् है, सबका साक्षीरूप होकर आत्मतत्त्व स्थित है और दीपक की तरह सबको प्रकाशित करता है । आप सर्वक्रियातीत है, पर उसी से सब कार्य सिद्ध होते हैं । वह सर्वक्रियासंयुक्त भासित होता है और सर्वविकल्प से रहित जड़वत् भी भासित होता है । परन्तु वास्तव में परम चैतन्य है । आत्मतत्त्व सब चेतन का सार चेतन, निर्विकल्प और परमसूक्ष्म है और अपने आपमें किञ्चन ही भासित होता है । अपने ही प्रमाद से रूप, अवलोक और नमस्कार की त्रिपुटी भासित होती है; जब बोध होता है तब ज्यों का त्यों आत्मा भासित होता है । नित्य, शुद्ध, निर्मल और परमानन्दरूप के प्रमाद से चैतन्य चित्तभाव को प्राप्त होता है । जैसे साधु भी दुर्जन के संग से असाधु हो जाते हैं, वैसे ही अनात्मा के संग से यह नीचता को प्राप्त होता है । जैसे सोना दूसरी धातु के मेल से खोटा हो जाता है और जब शोधा जाता है, तब शुद्धता को प्राप्त होता है, वैसे ही अनात्मा के संग से यह जीव दुःखी होता है । जब अभ्यास और यत्न करके अपने शुद्ध रूप को पाता है, तब वही हो जाता है । जैसे मुख के श्वास से दर्पण मलिन हो जाता है तो उसमें मुख नहीं देख पड़ता, पर जब मलिनता मिट जाती है तब शुद्ध होता है और उसमें मुख स्पष्ट देख पड़ता है, वैसे ही चित्त संवेदन के प्रमाद से चेतने के कारण जगत्-भ्रम भासित होने लगता है और आत्म-
❊ निर्वाण प्रकरण ❊ ८७
स्वरूप नहीं भासित होता । जब यह जगतसत्ता स्फुरण सहित दूर होगी, तब आत्मतत्त्व ज्ञात होगा और जगत् की असत्यता प्रतीत होगी ।
हे मुनीश्वर ! जब शुद्ध संवित् में चेतनता का चेतना निवृत्त होता है, तब जीव अहंताभाव को प्राप्त होता है और अहंकार को प्राप्त होने से अविनाशिरूप को विनाशी जानता है । हे मुनीश्वर ! स्वरूप से कुछ भी उत्थान होता है तो उससे स्वरूप से गिरकर कष्ट पाता है । जैसे पहाड़ से गिरी चीज नीचे चली जाती है और चूर्ण हो जाती है, वैसे ही जब जीव स्वरूप से उत्थान होता है और अनात्मा में अभि- मान और अहं प्रतीति होती है, तब जीव अनेक दुःखों को प्राप्त होता है । हे मुनीश्वर ! सब पदार्थों की सत्ता आत्मरूप में है । उसके अज्ञान से जीव द्वैतत्व को प्राप्त होता है । जब उसका बोध होगा, तब द्वैतभाव निवृत्त हो जायगा । वह आत्मा शुद्ध और चिन्मात्र स्वरूप है । उसी की सत्ता से देह-इन्द्रियादिक भी चेतन होते और अपने-अपने विषय को ग्रहण करते हैं । जैसे सूर्य के प्रकाश से सब जगत् का व्यवहार होता है, प्रकाश के बिना कोई व्यवहार नहीं होता, वैसे ही आत्मा की सत्ता से देह, इन्द्रियादिक का व्यवहार होता है और वे अपने-अपने विषय को ग्रहण करती हैं । हे मुनीश्वर ! जो नेत्र में मुख्य श्यामता है; वह अपने आपमें रूप को ग्रहण करती है । उसका बाहर के विषय से संयोग होता है और उस रूप का जिसमें अनुभव होता है, वही परम चैतन्यसत्ता है । त्वचा इन्द्रिय और स्पर्श का जब संयोग होता है, तब इन जड़ों का जिससे अनुभव होता है, वही साक्षीभूत परम चैतन्यसत्ता है । नासिका इन्द्रिय का जब गन्ध तन्मात्रा से संयोग होता है, तब उसके संयोग में जो अनुभवसत्ता है, वही परम चैतन्य है । इसी प्रकार शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध, इन पाँचों विषयों को श्रोत्र, नेत्र, त्वचा, रसना, नासिका, इन पाँचों इन्द्रियों से मिलकर जानने- वाला साक्षीभूत परम चैतन्य आत्मतत्त्व है । वह मुख्य संवित् परम चैतन्य कहलाता है, और जो बहिर्मुख चेतकर दृश्य से मिला है, वह
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मलिन चित्त कहाता है। जब वही मलिनरूप अपने शुद्ध स्वरूप में स्थित होता है, तब शुद्ध होता है।
हे मुनीश्वर ! यह सब जगत् आत्मस्वरूप है और शिलाघन की नाईं अद्वैत और सब विकारों से रहित है। इसका न उदय होता है और न अस्त। संकल्प के वश से जीवभाव को प्राप्त होता है और संकल्प के निवृत्त होने पर परमात्मारूप हो जाता है। हे मुनीश्वर ! आदि चित्तकला जीवरूपी रथ पर आरूढ़ है; जीव अहंकाररूपी रथ पर आरूढ़ है; अहंकार बुद्धिरूपी रथ पर आरूढ़ है; बुद्धि मनरूपी रथ पर आरूढ़ है; मन प्राणरूपी रथ पर चढ़ा है और प्राण इन्द्रियरूपी रथ पर चढ़े हैं। इन्द्रियों का रथ देह है और देह का रथ पदार्थ है। जो कर्म इन्द्रियाँ करती हैं, उसी के वश हो जरामरणरूपी संसार-पिंजड़े में भ्रमती हैं। इस प्रकार यह चक्र चलता है और उसमें प्रमाद करके जीव भटकता है। हे मुनीश्वर ! आत्मा का आभास यह चक्र विरूप है। जैसे स्वप्नपुर में जो नाना प्रकार के पदार्थ भासित होते हैं, वे वास्तव में कुछ नहीं हैं, वैसे ही यह जगत् वास्तव में कुछ नहीं है। जैसे मृगतृष्णा की नदी भ्रम से भासित होती है, वैसे ही यह जगत् भ्रम से भासित होता है। हे मुनीश्वर ! मन का रथ प्राण है। जब प्राणकला चेतना से रहित होती है, तब मन भी स्थिर हो जाता है और मन के स्थिर होने पर मन का मनन भी शान्त हो जाता है। जब प्राणकला चेतती है, तब मन का मनन भी चेतता है और जब प्राणकला स्थिर होती है, तब मनन निवृत्त हो जाता है। जैसे प्रकाश बिना पदार्थ नहीं दीखते और वायु के बिना धूल नहीं उड़ती, वैसे ही प्राण के स्फुरण से रहित मन शान्त हो जाता है। जैसे जहाँ पुष्प होते हैं वहाँ गन्ध होती है और जहाँ अग्नि है वहाँ उष्णता होती है, वैसे ही जहाँ प्राणस्पन्दन होता है, वहाँ मन भी होता है। हृदय में जो नाड़ी है, उसमें प्राण स्वतः चेतते हैं और उसी से मनन होता है। संवित् स्वच्छ रूप है। वह जड़-चेतन सर्वत्र भासती है और संवेदन प्राणकला में चेतती है।
हे मुनीश्वर ! आत्मसत्ता सर्वत्र अनुस्यूत होने पर भी जहाँ प्राण-
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कला होती है, वहीं भासित होती है और जहाँ प्राणकला नहीं होती, वहाँ नहीं भासित होती । जैसे सूर्य का प्रकाश सब जगह होता है, परन्तु जहाँ उज्ज्वल स्थान, जल अथवा दर्पण होता है, वहीं प्रतिबिम्ब पड़ता है और जगह नहीं, वैसे ही आत्मसत्ता सर्वत्र है, परन्तु जहाँ प्राणकला पुर्यष्टका होती है वहीं भासित होती है, और जगह नहीं। जैसे दर्पण में मुख का प्रतिबिम्ब दिखता है, शिला में नहीं दिखता, वैसे ही पुर्यष्टका जो मनरूप है सो सबका कारण है और अहंकार, बुद्धि, इन्द्रियाँ उसी के भेद हैं, जो आप ही से कल्पित हैं, सब दृश्यजाल उसी से उदय होता है, और किसी वस्तु से नहीं। यह भली प्रकार अनुभव किया गया है । इससे मन ही देहादिक कर्मों में प्रवृत्त होता है, और सब वस्तुएँ उसी से भासित होती हैं।
इति श्रीयोगवाशिष्टे निर्वाणप्रकरणे ईश्वरोपाख्याने मनप्राणोक्त-प्रतिपादनं नाम त्रिंशत्तमस्सर्गः ॥ ३० ॥
ईश्वर बोले, हे मुनीश्वर ! आत्मसत्ता बिना जीव जड़वत् होता है और आत्मसत्ता से चेतन होकर चेष्टा करता है । जैसे चुम्बक पाषाण की सत्ता से जड़ लोहा चेष्टा करता है, वैसे ही सर्वगत आत्मा की सत्ता से जीव चेतता है और आत्मसत्ता भी जीवकला में भासती है, और जगह नहीं भासती । जैसे मुख का प्रतिबिम्ब दर्पण ही में देख पड़ता है और जगह नहीं, वैसे ही परमात्मा सर्वगत और सर्वशक्तिमान् भी है परन्तु जीवकला ही में है। हे मुनीश्वर ! शुद्ध वास्तव स्वरूप से दृश्य की ओर जो इस जीवकला का उत्थान हुआ है, इससे वह चित्तभाव को प्राप्त हुआ है । जैसे शूद्र की संगति करके ब्राह्मण भी अपने को शूद्र मानने लगता है, वैसे ही स्वरूप के प्रमाद से जीवकला अपने को चित्त जानने लगी है । अज्ञान से घिरा हुआ जीव महादीन भाव को प्राप्त होता है, जड़देह के अभ्यास से कष्ट पाता है और काम, क्रोध, वात, पित्तादिक से जलता है । जैसी-जैसी भावना होती है, वैसा ही वैसा कर्म वह करता है और उन कर्मों की भावना में मिला भटकता
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है । जैसे रथ पर आरूढ़ होकर रथी चलता है, वैसे ही जीवआत्मा मन, प्राण और कर्मों से चलता है ।
हे मुनीश्वर ! चैतन्य ही जड़ दृश्य जो अङ्गीकार करके जीवत्व को प्राप्त होता है; और मन प्राणरूपी रथ पर चढ़कर पदार्थ की भावना से नाना प्रकार के भेद को प्राप्त हुआ सा स्थित होता है । जैसे जल ही तरङ्गभाव को प्राप्त होता है, वैसे ही चैतन्य ही नाना प्रकार का होकर स्थित होता है। निदान यह जीवकला आत्मा की सत्ता को पाकर वृत्ति में स्फुरणरूप होती है । जैसे सूर्य की सत्ता को पाकर नेत्र रूप को ग्रहण करते हैं वैसे ही परमात्मा की सत्ता पाकर जीव वृत्ति में चेतता है और परमात्मा चित्त में स्थित हुआ स्फुरणरूप दीखता है; जैसे घर में दीपक होता है, तब प्रकाश होता है; दीपक बिना प्रकाश नहीं होता । अपने स्वरूप को भुलाकर जीव दृश्य की ओर लगा है, इसी कारण आधि-व्याधि से दुःखी होता है । जैसे जब कमल डंडी के साथ लगता है, तब उस पर भौंरे आकर बैठते हैं, वैसे ही जब जीव दृश्य की ओर लगता है तब दुःख होता है और उससे जीव दीन हो जाता है । जैसे जल तरङ्गभाव को प्राप्त होता है, वैसे ही जीव अपनी क्रिया से बंधन को प्राप्त होता है । जैसे बालक अपनी परछाहीं को देखकर आप ही अविचार से भय पाता है, वैसे ही अपने स्वरूप के प्रमाद से जीव आप ही दुःख पाता है और दीनता को प्राप्त होता है । हे मुनीश्वर ! चितशक्ति सर्वगत और स्वयं सिद्ध है । उसकी अभावना करके जीव दीनता को प्राप्त होता है । जैसे सूर्य बादल में घिर जाता है, वैसे ही मूढ़ता से आत्मा का आवरण होता है । पर जब प्राणों का अभ्यास करता है, तब जड़ता निवृत्त होती है और अपने आत्मरूप का स्मरण हो आता है । जिनकी वासना निर्मल हो चुकी है, वह स्थिर और एक रूप हो जाती है । वे जीव जीवन्मुक्त होकर चिरकाल तक जीते हैं और हृदयकमल में प्राणों को रोककर शान्ति को प्राप्त होते हैं। जब काष्ठ और मिट्टी के ढेले की तरह देह गिर पड़ती है, तब पुर्यष्टका आकाश में लीन हो जाती है । जैसे
❇ निर्वाण प्रकरण ❇ ६१
आकाश में पवन लीन होता है, वैसे ही उनका मन पुर्यष्टका वहीं लीन हो जाती है।
हे मुनीश्वर ! जिनकी वासना शुद्ध नहीं हुई, उनकी पुर्यष्टका मृत्युकाल में आकाश में स्थित होती है और उसके अनन्तर फिर स्फुरित होती है। तब उस वासना के अनुसार जीव स्वर्ग-नरक को देखने लगता है। जब यह शरीर मन और प्राण से रहित होता है, तब शून्य-रूप हो जाता है। जैसे पुरुष घर को त्यागकर दूर चला जाय, वैसे ही मन और प्राण शरीर को त्यागकर और जगह चले जाते हैं और शरीर शून्य हो जाता है। हे मुनीश्वर ! चित्सत्ता सर्वत्र है, परन्तु जहाँ पुर्यष्टका होती है, वहीं भासित होती है और चेतन का अनुभव होता है; अन्यत्र नहीं होता। हे मुनीश्वर ! जब यह जीव शरीर को त्यागता है, तब पञ्चतन्मात्रा को ग्रहण करके अपने संग ले जाता है, और जहाँ इसकी वासना होती है वहीं पहुँचता है। प्रथम इसका अन्तवाहक शरीर होता है, फिर दृश्य के दृढ़ अभ्यास से वह स्थूलभाव को प्राप्त हो जाता है और अन्तवाहकता भूल जाती है। जैसे स्वप्न में भ्रम से स्थूल आकार देखता है, वैसे ही जब मोह करके मरता है, तब अपने साथ स्थूल आकार देखता है। फिर स्थूल देह में अहं की प्रतीति करता है और उससे मिलकर कर्म करता है, तब असत्य को सत्य मानता है और सत्य को असत्य जानता है। इस प्रकार भ्रम को प्राप्त होता है। जब सर्वगत चिदंश से जीव अनरूप होता है, तब जगद्भाव को प्राप्त होता है। जब देह से पुर्यष्टका निकल जाती है, तब आकाश में जाकर लीन होती है। जब देह चेतना से रहित होती है, तब उसको मृतक कहते हैं और वह अपनी स्वरूपशक्ति को विस्मरण करके जर्जरीभाव को प्राप्त होती है। जब जीवशक्ति हृदयकमल में मूच्छित होती है और प्राण रोके जाते हैं, तब यह मृतक होता है। ऐसे ही बार-बार जन्म लेता और मरता है। हे मुनीश्वर ! जैसे वृक्ष में पत्ते लगते हैं काल पाकर नष्ट हो जाते हैं और फिर नवीन लगते हैं, वैसे ही यह जीव शरीर को धारण करता है और छोड़ता है; फिर शरीर ग्रहण करता है
६२ ☀️ योगवाशिष्ठ ☀️
और वह भी नष्ट हो जाता है। जो वृक्ष के पत्ते की तरह उपजते और नष्ट होते हैं, उनका शोक करना व्यर्थ है।
हे मुनीश्वर ! चैतन्यरूपी समुद्र में शरीररूपी अनेक तरङ्ग बुलबुले उपजते और नष्ट होते हैं। उनका शोक करना व्यर्थ है। जैसे दर्पण में जो अनेक पदार्थों का प्रतिबिम्ब पड़ता है; वह दर्पण से भिन्न नहीं होता, वैसे ही चैतन्य में अनेक पदार्थ भासित होते हैं। वह चैतन्य निर्मल आकाश की तरह विस्तीर्ण है। उसमें जो पदार्थ फुरते हैं, वे अनन्य रूप हैं और विधि-शरीर भी वही रूप है।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे ईश्वरोपाख्याने देहपातविचारो नामैकत्रिंशत्तमस्सर्गः ॥ ३१ ॥
वशिष्ठजी बोले, हे अर्द्धचन्द्रधारी ! चैतन्यतत्त्व परमात्मा पुरुष तो अनन्त और एक रूप है, उसको यह द्वैत कहाँ से प्राप्त हुआ ? भूत और भविष्य काल कहाँ से दृढ़ हो रहे हैं ? एक में अनेकता कहाँ से प्राप्त हुई है ? बुद्धिमान दुःख को कैसे निवृत्त करते हैं और वह कैसे निवृत्त होता है ? ईश्वर बोले; हे ब्राह्मण ! ब्रह्मचैतन्य सर्वशक्तिमान् है। जब वह एक अद्वैत ही होता है, तब निर्मलता को प्राप्त होता है। एक के भाव से द्वैत कहाता है और द्वैत की अपेक्षा से एक कहाता है, पर ये दोनों कल्पनामात्र हैं। जब चित्त चेतता है, तब एक और दो की कल्पना होती है। चित्तस्पन्दन का अभाव होने पर दोनों की कल्पना मिट जाती है। कारण से जो कार्य भासित होता है, सो भी एक रूप है। जैसे बीज से लेकर फल पर्यन्त वृक्ष का जो विस्तार है, वह एक ही रूप है और बढ़ने-घटने की उसमें कल्पना होती है, वैसे ही चैतन्य में चित्त की कल्पना होती है। तब जगतरूप होकर भासता है, परन्तु उस काल में भी वही रूप है।
हे मुनीश्वर ! वृक्ष समेत बीज भी एक वस्तु है और कुछ नहीं; परन्तु जब बीज उगता है, तब वृक्ष के रूप में भासित होता है वैसे ही जब शुद्ध चैतन्य में चेतनकल्पना फुरती है, तब वह जगतरूप भासित होता है। हे मुनीश्वर ! कारण-कार्य विकाररूप जगत असम्यकदृष्टि में
❇ निर्वाण प्रकरण ❇ ६३
भासित होता है। जैसे जल में तरङ्ग जो उठते हैं, वे जलरूप हैं-जल से भिन्न नहीं, जैसे खरगोश के सींग असत् हैं और जल में द्वैततरङ्ग कलना असत् है-अज्ञान से भासित होती है, वैसे ही आत्मा में अज्ञान से जगत् भासित होता है। जैसे द्रवरूप से जल ही तरङ्गरूप हो भासता है, वैसे ही फुरने से आत्मतत्त्व जगतरूप हो भासता है। उसमें द्वैत नहीं है। चैतन्यरूपी बेल जो फैली है, उसमें पत्ते, फूल और फल एक ही रूप हैं। जैसे एक बेल अनेकरूप हो भासती है, वैसे ही एक चैतन्य अहं, त्वं, देश, काल आदिक विकार होकर भासित होता है। ये सब उसी का रूप हैं। हे मुनीश्वर ! जब सब ही एक चैतन्य है तब तुम्हारे प्रश्न के लिए अवसर कहाँ रहा ? देश, काल, क्रिया, नीति आदिक जो शक्ति-पदार्थ हैं, वे एक ही चिदात्मा है। जैसे जल में जब द्रवता होती है, तब वह तरङ्गरूप हो भासता है और उसका नाम तरङ्ग होता है, वैसे ही ब्रह्म में जगत् जब फुरता है, तब अहं, त्वं आदिक नाना प्रकार के नाम होते हैं। पर वह ब्रह्म, शिव, परमात्मा, चैतन्यसत्ता, द्वैत, अद्वैत आदिक नामों से अतीत है; वाणी का विषय नहीं। ऐसा निर्विकल्प निर्विषय तत्त्व सदा अपने आपमें स्थित है। यह जगत् जो कुछ भासता है, वह भी वही चैतन्यतत्त्व है। जैसे बेल ही फूल और पत्ते होकर फैलती है, वैसे ही चैतन्य सर्वरूप होकर फैलता है।
हे मुनीश्वर ! महाचैतन्य में जब किंचन होता है, तब जीवरूप होकर स्थित होता है और फिर द्वैतकलना को देखता है। जैसे जीव स्वप्न में अपना स्वरूप त्यागकर परिच्छिन्न शरीर को धारण करता है और द्वैतरूप जगत् को देखता है, पर जब जागता है, तब अपने अद्वैतरूप को देखता है-परन्तु जागे बिना भी द्वैत कुछ नहीं हुआ, वैसे ही यह जाग्रत् जगत् भी कुछ नहीं है, भ्रम से भासित होता है। जब यह जीव अपने वास्तव स्वरूप की ओर सावधान होता है, तब उसके अभ्यास से वही रूप हो जाता है। हे मुनीश्वर ! इस जीव का आदि शरीर आन्तवाहक है और संकल्प ही उसका रूप है। जब उसमें अहं भावना तीव्र होती है, तब वही आधिभौतिक होकर भासित होता है। जब उसमें सत्यता दृढ़ हो