योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
☸ निर्वाण प्रकरण ☸ ६७
करता, वह केवल सबका साक्षी है, वैसे ही आत्मा के आश्रय से देहा- दिक की चेष्टा होती है। परन्तु आत्मा साक्षीरूप और पापपुण्य से रहित है। हे राम ! इस देहरूपी शून्य गृह में अहंकाररूपी पिशाच कल्पित है। जैसे बालक परछाईं में वैताल की कल्पना करके भय पाता है, वैसे ही अहंकाररूपी पिशाच की कल्पना कर जीव भय पाता है। वह अहंकाररूपी पिशाच महानीच है। सब सन्तजन उसकी निन्दा करते हैं। जब अहंकाररूपी वैताल निकले, तब आनन्द हो। देहरूपी शून्य गृह में इसका निवास है। जो पुरुष इसका दास हो रहा है, उसको यह नरक में ले जाता है। इससे तुम इसके दास न होना। जब इसके नाश का उपाय करोगे, तब आनन्द पाओगे। हे राम ! यह चित्तरूपी उन्मत्त वैताल जिसको स्पर्श करता है, उसको अशुद्ध करता है, अर्थात् उसका धैर्य और निश्चय अस्तव्यस्त करके उसे दुःख देता है और निज स्वरूप से गिरा देता है। जो बड़े बड़े साधु-महन्त हैं, वे भी इसके भय से समाधि में स्थित होते हैं कि किसी प्रकार अहंकार का अभाव हो ।
हे राम ! अहंकाररूपी पिशाच जिसको स्पर्श करता है, उसको आप-सा कर लेता है। यह जैसे आप तुच्छ है, वैसे ही और को भी तुच्छ बनाता है। जहाँ सत्संग, सतशास्त्र का विचार और आत्मज्ञान का निवास नहीं होता, उस शून्य और उजाड़ देहमन्दिर में यह रहता है, और जो कोई ऐसे स्थान में प्रवेश करता है उसमें प्रवेश कर जाता है। हे राम ! जिसको अहंकाररूपी पिशाच लगा है, उसका धन से कल्याण नहीं होता, और न मित्र-बान्धव से कल्याण होता है। अहं- कार-पिशाच से मिला हुआ जो कुछ कर्म वह करता है, वह अपने नाश के निमित्त करता है और विष की बेलि को उपजाता और बढ़ाता है। हे राम ! जो पुरुषविवेक और धैर्य से रहित है उसको अहं- काररूपी पिशाच शीघ्र ही खा जाता है। वह सर्वरूप है और जिसको स्पर्श करता है, उसको मुर्दा करके छोड़ता है। जिसको अहंकाररूपी पिशाच लगा है, वह नरकरूपी अग्नि में काष्ठ की नाईं जलेगा। अहं- काररूपी सर्प देहरूपी वृक्ष के छिद्र में विष से भरा बैठा है। उसके निकट
६८ ❊ योगवाशिष्ठ ❊
जो जायगा, उसको वह मार डालेगा। जो अहं-मम भाव को प्राप्त होगा, वह मृतक-समान होगा और जन्म-मरण पावेगा। अहंकाररूपी पिशाच जिसको लगता है, उसे मलिन करता है और स्वरूप से गिरा-कर संसाररूपी गढ़े में डालता है। बड़ी आपदाएँ उस पर ढाता है। जितनी आपदाएँ हैं, उन्हें अहंकार ढाता है। बहुत वर्षों तक भी उन आपदाओं का वर्णन न हो सकेगा।
हे राम ! यह जो मलिन कल्पनाएँ उठती हैं कि 'मैं हूँ', 'मैं मरता हूँ', 'मैं दग्ध होता हूँ', 'मैं दुःखी हूँ', 'मैं मनुष्य हूँ', उनका मूल अहंकार-रूपी पिशाच की शक्ति है। आत्मस्वरूप नित्य, शुद्ध, चिदाकाश, सर्व-गत, सच्चिदानन्द, जीव सबका अपना है, पर अहंकार के वश होकर यह जीव अपने को परिच्छिन्न और निर्लिप्त होकर भी दुःखी मानता है। जैसे आकाश सर्वगत और निर्लेप है, वैसे ही आत्मा सबमें निर्लेप है और सबका सम्बन्धी, पर अहंकार के सम्बन्ध से रहित है। हे राम ! ग्रहण त्याग, चलना, बैठना इत्यादिक जो कुछ कर्म हैं, उन्हें देहरूपी यन्त्र और वायुरूपी रस्सी से अहंकाररूपी यन्त्री कराता है। आत्मा सदा निर्लेप, सबका अधिष्ठान और कारणकार्य भाव से रहित है। जैसे वृक्ष की ऊँचाई का कारण यह आकाश निर्लेप है, वैसे ही आत्मा सर्वचेष्टा का कारण, अधिष्ठान और निर्लेप है। जैसे आकाश और पृथ्वी का सम्बन्ध नहीं, वैसे ही आत्मा और अहंकार का सम्बन्ध नहीं है। चित्त को जो 'आप' जानते हैं वे महामूर्ख हैं। आत्मा प्रकाशरूप, नित्य और सर्वगत विभु है; चित्त मूर्ख, जड़ और आवरण करता है। हे राम ! आत्म सर्वज्ञ और चैतन्यरूप है; पर चित्त मूढ़ और पत्थर सा जड़ है। इसको दूर करो। इसका और तुम्हारा कुछ सम्बन्ध नहीं। तुम इस मोह को त्यागो। देहरूपी शून्य गृह में चित्तरूपी वैताल का निवास है। जिसको वह अपने वश करता है, जिसको बान्धव नहीं छुड़ा सकते, और शास्त्र भी नहीं छुड़ा सकते। जिसका देहाभिमान क्षीण हो गया है, उसको गुरु और शास्त्र भी छुड़ा सकते हैं, जैसे थोड़ी कीचड़ से हरिण को निकाल लेते हैं वैसे ही गुरु और शास्त्र उसे निकाल लेते हैं।
☸ निर्वाण प्रकरण ☸ ६६
हे राम ! जितने देहरूपी शून्य मंदिर हैं, उन सबमें अहंकाररूपी पिशाच रहता है। कोई देहरूपी गृह अहंकार-पिशाच से खाली नहीं है। इस पर भय सवार है। जैसे पिशाच अपवित्र स्थान में रहता है, पवित्र स्थान में नहीं, वैसे ही जहाँ सन्तोष, विचार, अभ्यास, सत्सङ्ग से रहित देह है, उसी स्थान में अहंकार निवास करता है। जहाँ सन्तोष, विचार, अभ्यास और सत्संग होता है, वहाँ से वह मिट जाता है। जितने शरीररूपी शमशान हैं, वे चित्तरूपी वैताल से पूर्ण हैं। अपरिमित मोहरूपी वैताल के वश जीव जगतरूपी महावन में मोह को प्राप्त होते हैं, जैसे बालक मोह के वश होता और डरता है। हे राम ! तुम आप अपना उद्धार करो और सत्य विचार करके धैर्य धरो। इस जगतरूपी पुरातन वन में जीवरूपी मृग विचरते हैं और भोगरूपी तृण चरते हैं। पर वे भोगरूपी तृण देखने में तो सुन्दर लगते हैं, परन्तु उनके नीचे गढ्ढा है। जैसे हरियाली और तृण से ढका हुआ गढ्ढा देख मृग के बालक घास चरने लगते हैं और गढ्हे में गिर पड़ते हैं, वैसे ही जीवरूपी मृग भोगों को रमणीय जानकर भोगने लगते हैं और उनकी तृष्णा से नरक आदिक में गिरते और दुःख की अग्नि में जलते हैं। हे राम ! तुम ऐसे न होना। जो कोई भोगों की तृष्णा करेगा, वह नरकरूपी गड्ढे में गिरेगा। इससे तुम मृग-बुद्धि को त्यागकर सिंहवृत्ति को धारण करो। मोहरूपी हाथी को सिंह होकर अपने नखों से विदीर्ण करो और भोग की तृष्णा से रहित बनो। भोग की तृष्णावाले जीव जम्बूद्वीपरूपी जंगल में मृग की तरह भटकते हैं—उनकी तरह तुम न विचरना। हे राम ! स्त्री जो रमणीय लगती है, उसका स्पर्श अल्पकाल ही शीतल और सुखदायक लगता है। परन्तु वह कीचड़ की तरह है। कीचड़ का लेप भी शीतल लगता है, परन्तु तुच्छ है। जैसे दलदल में फँसा हुआ हाथी उसमे निकल नहीं सकता, वैसे ही यह भोगरूपी दलदल में फँसा हुआ जीव नहीं निकल सकता। इसमें तुम सन्त की वृत्ति को ग्रहण करो। ग्रहण करना किसको कहते हैं और त्याग किसका नाम है, ऐसे विचार से असद्वृत्ति को त्याग करो और आत्मतत्त्व का आश्रय लो।
७० ❊ योगवाशिष्ठ ❊
हे राम ! यह अपवित्र देह अस्थि, मांस, रुधिर से पूर्ण और तुच्छ है। इसका आचार दुष्ट है। देह के निमित्त भोग की इच्छा करने से परमार्थ नहीं सिद्ध होता। देह रची और ने है, यह चेष्टा और से करती है और इसमें प्रवेश और ने किया है। दुःख को ग्रहण और करता है. जो दुःख का भागी होता है। संकल्प ने देह रची है, प्राण से यह चेष्टा करती है, अहंकार-पिशाच ने इसमें प्रवेश किया है और गर्जता है। मन की वृत्ति सुख-दुःख को ग्रहण करती है और जीव दुःखी होता है। यह आश्चर्य है। हे राम ! परमार्थसत्ता एक है और सर्वत्र समान है। इससे भिन्न सत्ता नहीं। जैसे पत्थर घनजड़ होता है और उसमें और कुछ नहीं उपजता, वैसे ही सत्तामात्र से भिन्न दूसरी सत्ता किसी पदार्थ की नहीं है। जैसे पत्थर घनरूप है, वैसे ही परमात्मा घनरूप है। जड़ और चेतन भिन्न नहीं हैं। यह मिथ्या संकल्प की रचना है। जैसे बालक को परछाहीं में बेताल भासता है, वैसे ही सब कल्पना मन की है। जैसे एक ऊख के रस से गुड़, शक्कर इत्यादि बनती है, वैसे ही एक परमोत्तम सत्तासमान सब है। उसमें जड़-चेतन की कल्पना मिथ्या है। जब तक सम्यकदृष्टि नहीं प्राप्त हुई, तब तक जड़-चेतन की दृष्टि होती है और जब यथार्थदृष्टि प्राप्त होती है; तब सब भेदकल्पना मिट जाती है। जैसे सीपी में जो चाँदी भासती है सो न सत्य होती है और न असत्य होती है, वैसे ही आत्मा में जड़-चेतन; सत्य-असत्य की विलक्षण कल्पना है। हे राम ! जो सत्य है वह असत्य नहीं होता और जो असत्य है वह सत्य नहीं होता। आत्मा सदा सत्यरूप और अपने आपमें स्थित है। उसमें द्वैत और एक का अभाव है। जैसे पत्थर में अन्य सत्ता का अभाव है, वैसे ही आत्मा में द्वैतसत्ता का अभाव है। नानारूप भासित होने पर भी द्वैत कुछ नहीं है। वह सदा अनुभवरूप है। उसमें विभागकल्पना कुछ नहीं—सदा अद्वैतरूप है। भेदकल्पना चित्त से भासती है। जब चित्त का अभाव होता है, तब जड़-चेतन की कल्पना मिट जाती है। जैसे बन्ध्या के पुत्र और आकाश में वृक्ष का अभाव है, वैसे ही आत्मा में कल्पना का अभाव है।
- निर्वाण प्रकरण *
हे राम ! यह चेतन है, यह जड़ है, यह उपजता है, यह मिट जाता है इत्यादि सब कल्पना मिथ्या है। जैसे रस्सी में सर्प मिथ्या है, वैसे ही केवल निर्विकल्प चिन्मात्र आत्मा में कल्पना मिथ्या है। गुरु और शास्त्र भी जो आत्मा को चैतन्य और अनात्मा को जड़ कहते हैं, वह भी बोध के निमित्त कहते हैं और दृष्टान्त युक्ति से दृश्य की आत्मस्वरूप में स्थिति कराते हैं। जब स्वरूप में दृढ़ स्थिति होगी, तब जड़-चेतन की भेद-कल्पना जाती रहेगी; केवल अचिन्त्य चिन्मात्र सत्ता भासित होगी, जो तत्त्व है। इस प्रकार गुरु जड़-चेतन के विभाग का उपदेश करते हैं। तो भी मूर्ख नहीं ग्रहण कर सकते। जब प्रथम ही अचिन्त्य-चिन्मात्र-अवाच्यपद का उपदेश करे, तब कैसे ग्रहण करे। हे राम ! और आश्चर्य देखो। चित्त और है, इन्द्रियाँ और हैं, देह और है, देह का कर्त्ता कोई दृष्टिगोचर नहीं होता। देह अहंकार से घिरी है। यह जीव ऐसा मूर्ख है कि देह को अपना रूप जानता है और दुःख पाता है। पर जो विचारवान् पुरुष आत्मपद में स्थित हुए हैं उन महानुभावों को कोई क्रिया दुःखबन्धन में नहीं डाल सकती। जैसे मन्त्र जानने-वाले को सर्प दुःख नहीं दे सकता, वैसे ही ज्ञानवान् को कर्म बन्धन नहीं करते। हे राम ! न तुम शीश हो, न नेत्र हो, न रक्त हो, न मांस हो, न अस्थि आदिक हो, न मन हो और न भूतजात हो। तुम चित्त से रहित चैतन्य केवल चिन्मात्र साक्षीरूप हो। इसीलिए शरीर की ममता त्यागकर नित्य शुद्ध और सर्वगत आत्मस्वरूप में स्थित हो।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे देहसत्ताविचारो नाम पञ्चविंशतितमस्सर्गः ॥ २५ ॥
वशिष्ठजी बोले, हे राम ! इसी दृष्टि को ऐसे ग्रहण करो और भेद कष्टदृष्टि का त्याग और नाश करो। जब कष्टदृष्टि नष्ट होगी, तब ऐसा आत्मानन्द प्रकट होगा, जिस आनन्द के पाने से अष्टसिद्धि का ऐश्वर्य भी अनिष्ट जानकर त्याग दोगे। अब और ऐसी दृष्टि का वर्णन सुनो जो महामोह का नाश करती है और दुर्लभ कठिन आत्मपद को सुखपूर्वक प्राप्त कराती है, जिसका नाश कभी नहीं होता। इस दृष्टि का
७२ ❇ योगवाशिष्ट ❇
वर्णन दुःख से रहित आनन्दरूप शिवजी से मैंने सुना है। इसे पूर्वकाल में कैलास की कन्दरा में संसारदुःख की शान्ति के लिए अर्धचन्द्रधारी सदाशिव ने मुझसे कहा था। हे राम ! पूर्ण चन्द्रमा की तरह शीतल और प्रकाशमान हिमालय पर्वत का एक शिखर कैलास है, जहाँ गौरी के रमणीय स्थान और मन्दिर हैं, गङ्गा का प्रवाह झरनों से चलता है, पक्षी शब्द करते हैं और मन्द-मन्द सुखदायक पवन चलता है। कुबेर मोर वहाँ विचरते हैं, कल्पवृक्ष लगे हुए हैं और महाउज्ज्वल, शीतल, सुन्दर कन्दरा में मन्दार और तमाल के वृक्ष लगे हुए हैं, जिनमें ऐसे फूल लगे हैं, जैसे श्वेत मेघ हों। वहाँ गन्धर्व और किन्नर आते और गाते हैं और देवताओं के रमणीय सुन्दर स्थान हैं। उस पर्वत पर त्रिनेत्र सदाशिव हाथ में त्रिशूल लिये, गणों से घिरे हुए, अर्धांग में भगवती को लिए बिराजते हैं। सब लोकों के कारण ईश्वर, जिन्होंने कामदेव का गर्व नष्ट किया, षट्मुख सहित स्वामीकार्तिक जिनके पास बैठे हैं और महाभयानक शून्य शमशानों में जिनका निवास है, उन देव की मैंने पूजा की। फिर एक कुटी बनाकर, एक कमण्डलु और फूल और माला पूजन के निमित्त रखे, यथाशास्त्र पुण्य क्रिया से उस कंदरा में तप करने लगा। जलपान करता, फल भोजन करता, विद्यार्थी जो साथ थे उनको पढ़ाता और शास्त्र का अर्थ विचारता था।
ब्रह्मविद्या की पुस्तकों का समूह आगे था। आसपास मृग और उनके बालक विचरते थे। इस प्रकार वेद पढ़ता, ब्रह्मविद्या को विचारता और शास्त्र के अनुसार तप करता मैं कैलास वनकुञ्ज में रहता था। निदान श्रावण बदी अष्टमी की अर्धरात्रि को जब मैं समाधि से उठा तो क्या देखता हूँ कि दसो दिशा काष्ठवत् मौन और शान्तरूप हैं। महातम घिरा है और मन्द-मन्द पवन चलता है। ओस के कन गिरते हैं जैसे पवन हँस रहा हो। उसी समय महाशीतल अमृतरूपी किरणों से चन्द्रमा प्रकाशित होकर ओषधियों को रस से पुष्ट करने लगा। चन्द्रमुखी कमल खिल आये। चकोर अमृत की किरणों को पानकर मानों चन्द्रमारूप हो गये। प्रातःकाल के तारों की तरह मणियाँ ऊपर
- निर्वाण प्रकरण * ७३
आकर गिरने लगीं और सप्तर्षि सिर पर स्थित हुए–मानो मेरे तप को देखने आये हों। सप्तर्षियों में पिछले जो तीन तारे हैं, उनके मध्य में मेरा मन्दिर है; वहाँ मैं सदा विराजता हूँ। चन्द्रमा से सब स्थान शीतल हो गये और पवन से फूल गिरने लगे।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे वशिष्ठआश्रमवर्णनं नाम षड्विंशतितमस्सर्गः ॥ २६ ॥
वशिष्ठजी बोले, हे राम! तब मुझको तेज का प्रकाश देख पड़ने लगा। जैसे मन्दराचल पर्वत के मंथन से क्षीरसमुद्र उछल पड़ा है; या हिमालय पर्वत मूर्तिमान स्थित है; या माखन का पहाड़ खड़ा है; या सब शंखों की उज्ज्वलता स्पष्ट स्थित हुई है; या मोतियों का समूह इकट्ठा होकर उड़ने लगा है। वह महातीव्र प्रकाश ऐसा था, मानो गङ्गा का प्रवाह उछलने लगा हो। उस प्रकाश की शीतलता से सब दिशाएँ और उनके किनारे भर गये और मैं देखकर आश्चर्य करने लगा कि क्या असमय ही प्रलय होने लगा। तब मैं बोधदृष्टि से मन में विचारने लगा कि यह क्या है। तब देखा कि देवताओं के गुरु ईश्वर सदाशिव चन्द्रकला को धारण किये और गौरी भगवती का हाथ पकड़े गणों के समूह से घिरे चले आते हैं। उनके कानों में सर्प पड़े थे, कण्ठ में मुण्डों की माला थी, शीश पर जटा थी और उन पर कदम्ब वृक्ष और तमाल वृक्ष के फूल पड़े हुए थे। उनको प्रथम मैंने मन से देखा। मन ही से मन्दार वृक्ष के पुष्प लेकर अर्घ्य पाद्य किया। मन ही से प्रणाम किया और मन ही से प्रदक्षिणा कर अपने आसन से उठ खड़ा हुआ। फिर अपने शिष्य को जगाकर अर्घ्य पाद्य लेकर चला और त्रिनेत्र शिवजी को पुष्प अञ्जली दे और प्रदक्षिणा कर प्रणाम किया।
तब चन्द्रधारी ने मुझको कृपादृष्टि से देखा और सुन्दर मधुर वाणी में कहा—हे ब्राह्मण! अर्घ्य पाद्य ले आओ, हम तुम्हारे आश्रम में अतिथि आये हैं। हे निष्पाप! तुमको कल्याण तो प्राप्त है? तुम मुझको महाशान्तरूप देख पड़ते हो और महासुन्दर उज्ज्वल तप की शोभा तथा तेज से शोभित हो। चलो, हम तुम्हारे आश्रम को चलें। हे राम! फूलों से आच्छादित
७४ ❊ योगवाशिष्ठ ❊
स्थान में सदाशिव बैठे थे; सो ऐसे कहकर उठ खड़े हुए और अपने गणों सहित मेरी कुटी में आये। वहाँ मैंने पुष्प और अर्घ्य से उनके चरणों की पूजा करके फिर हाथों की पूजा की। इसी प्रकार चरणों से लेकर शीश पर्यन्त सब अङ्गों की पूजा की। फिर गौरी भगवती का पूजन करके उनकी सखियों और शिव के गणों को पूजा। हे रामजी! इस प्रकार भक्तिपूर्वक जब मैं पार्वती परमेश्वर का पूजन कर चुका, तब शशिकलाधारी शिवजी ने शीतल वाणी से मुझसे कहा कि हे ब्राह्मण! नाना प्रकार की बिन्तनेवाली जो चित्तवृत्ति है, वह तुम्हारे स्वरूप में विश्रान्ति को प्राप्त हुई है और तुम्हारी संवित् आत्मपद में स्थित हुई है। तुम्हारे शिष्यों का कल्याण तो है और तुम्हारे पास जो हरिण विचरते हैं, वे भी सुख में हैं? मन्दार वृक्ष तुमको पूजा के निमित्त फूल-फल भली प्रकार देते हैं और गङ्गाजी तुमको भली प्रकार स्नान कराती हैं? देह के इष्ट-अनिष्ट की प्राप्ति में तुमको खेद तो नहीं होता? इस पर्वत में कुबेर के अनुचर यक्ष और राक्षस जो रहते हैं, वे तुमको दुःख तो नहीं देते और मेरे गण जो निशाचर हैं, वे तो तुमको कष्ट नहीं पहुँचाते?
हे रघुनन्दन ! इस प्रकार जब देवेश ने मुझसे वाञ्छित प्रश्न किये, तब मैंने उनसे कहा—हे कल्याणरूप महेश्वर ! जो तुमको सदा स्मरण करते हैं, उनको इस लोक में ऐसा कोई पदार्थ नहीं जो पाना कठिन हो। उनको भय भी किसी का नहीं। जिनका चित्त तुम्हारे स्मरण के आनन्द में सब ओर से पूर्ण हुआ है, वे जगत में दीन नहीं होते। वही देश उन्हीं जनों के चरण और वही दिशा तथा पर्वत वन्दना करने के योग्य हैं, जहाँ एकान्त बुद्धि से बैठकर तुम्हारा स्मरण होता है। हे प्रभो ! तुम्हारा स्मरण पूर्वपुण्यरूपी वृक्ष का फल है, जो वर्तमान कर्मों से सिंचता है। तुम मन के परम मित्र हो। तुम्हारा स्मरण सब आपदाओं को हरनेवाला है। वह सर्व सम्पदारूपी लता को बढ़ानेवाला वसन्तऋतु है। हे प्रभो ! तुम्हारा स्मरण बड़ी महिमा और बड़े से बड़े कर्मों के कारण का भी कारण है। हे प्रभो ! तुम्हारा स्मरण विवेकरूपी
❊ निर्वाण प्रकरण ❊ ७५
समुद्र में परमार्थरूपी रत्न है; अज्ञानरूपी तम का नाशकर्ता सूर्य का समूह है; ज्ञान-अमृत का कलश, धैर्यरूपी चाँदनी का चन्द्रमा और मोक्ष का द्वार है । हे प्रभो ! तुम्हारा स्मरण अपूर्व उत्तम दीपक है । वह चित्त का मन्दिर जो संसार है, उस सबको प्रकाशित करता है । हे प्रभो ! तुम्हारा स्मरण उदार चिन्तामणि की नाईं सब आपदाओं को निवृत्त करनेवाला और बड़े उत्तम पद को देनेवाला है । हे प्रभो ! तुम्हारा स्मरण एक क्षण भी चित्त में स्थित हो तो सब दुःख और भय नष्ट करता है और वरदायक है । उसके बल से मैं भी तुम्हारी भाँति सुख से बसता हूँ ।
वाल्मीकिजी बोले कि इस प्रकार जब मुनीश्वर ने कहा, तब दिन का अन्त हुआ । सब लोग परस्पर नमस्कार करके अपने-अपने स्थान को गये और सूर्य की किरणों के उदय के साथ फिर अपने अपने आसन पर आ बैठे ।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे रुद्रवशिष्ठसमागमो नाम सप्तविंशतितमस्सर्गः ॥ २७ ॥
वशिष्ठजी बोले, हे राम ! जब मैंने इस प्रकार कहा, तब गौरी भगवती जगत्-माता, जैसे माता पुत्र से कहे, मुझसे बोलीं—हे वशिष्ठ ! पतिव्रताओं में मुख्य अरुन्धती कहाँ है ? उसको ले आओ । वह मेरी प्यारी सखी है । उससे मैं कथा-वार्ता करूँगी । हे रामजी ! इस प्रकार जब मुझसे पार्वती ने कहा, तब मैं शीघ्र ही जाकर अरुन्धती को ले आया । वे दोनों परस्पर कथा-वार्ता करने लगीं । मैंने विचारा कि मुझको ईश्वर मिले हैं और पूछने का अवसर भी पाया है, इससे सर्व ज्ञान के समुद्र से पूछकर संदेह दूर करूँ । हे राम ! ऐसे विचार करके मैंने गौरीश से जो पूछा और जो कुछ चन्द्रकलाधारी ने मुझसे कहा, वह तुमसे कहता हूँ । मैंने पूछा, हे भगवन् ! तुम भूत, भविष्य और वर्तमान, तीनों कालों के ईश्वर और सब कारणों के कारण हो । तुम्हारे प्रसाद से मैं कुछ पूछने को समर्थ हुआ हूँ । हे महादेव ! जो कुछ मैं पूछता हूँ, उसे प्रसन्नबुद्धि हो, उद्वेग को त्याग कर, शीघ्र ही कहौ ।
७६ $$\text{❊ योगवाशिष्ठ ❊}$$
हे सब पापों के नाशक और सब कल्याण की वृद्धि करनेवाले ! देव-अर्चन का विधान मुझसे कहो ।
ईश्वर बोले, हे ब्राह्मण ! जो उत्तम देव-अर्चन है और जिसके किये से संसारसमुद्र से जीव तर जाता है, सो सुनो । हे ब्राह्मणों में श्रेष्ठ ! पुण्डरीकाक्ष विष्णु देव नहीं और त्रिलोचन शिव भी देव नहीं । कमल से उपजा ब्रह्मा भी देव नहीं और सहस्रनेत्र इन्द्र भी देव नहीं । न देव पवन है, न सूर्य है, न अग्नि है, न चन्द्रमा है, न ब्राह्मण है, न क्षत्रिय है, न तुम हो, न में हूँ, न देह है, न चित्त है और न कलनारूप है । अकृत्रिम, अनादि, अनन्त और संवित्रूप ही देव कहाता है । आकारा-दिक परिच्छिन्नरूप हैं, वे वास्तव में कुछ नहीं । एक अकृत्रिम, अनादि, अनन्त, चैतन्यरूप देव हैं । वही देव शब्द का वाचक है और उसी का पूजन पूजन है । उस देव को, जिससे यह सब हुआ है और जो सत्ताशान्त-आत्मरूप है, सर्वत्र व्याप्त देखना ही उसका पूजन है पर जो उस संवित्तत्त्व को नहीं जानते, उनके लिए साकार की अर्चना का विधान है । जैसे जो पुरुष योजनपर्यन्त नहीं चल सकता, उसको एक कोस दो कोस का चलना भी भला है, वैसे ही जो पुरुष अकृत्रिम देव की पूजा नहीं कर सकता, उसको साकार का पूजना भी भला है । हे ब्राह्मण ! जिसकी भावना कोई करता है, उसके फल उसी के अनुसार भोगता है । जो परिच्छिन्न (खण्डित) की उपासना करता है, उसको फल भी परिच्छिन्न प्राप्त होता है और जो अकृत्रिम, आनन्द-रूप, अनन्त देव की उपासना करता है, उसको वही परमात्मरूपी फल प्राप्त होता है । हे साधो ! अकृत्रिम फल को त्याग कर जो कृत्रिम को चाहते हैं, वे ऐसे हैं जैसे कोई मन्दार वृक्ष के वन को त्याग कर कंटक के वन को प्राप्त हो । वह देव कैसा है, उसकी पूजा क्या है और क्योंकर होती है, सो सुनो ।
बोध, साम्य और शम, ये तीन फूल हैं । बोध सम्यक्ज्ञान का नाम है; अर्थात् आत्मतत्त्व को ज्यों का त्यों जानना । साम्य मनमें पूर्ण देखने को कहते हैं और शम का अर्थ यह है कि चित्त को निवृत्त
✹ निर्वाण प्रकरण ✹
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करना और आत्मतत्त्व से भिन्न कुछ न देखना । इन्हीं तीनों फूलों से चिन्मात्र शुद्ध देव शिव की पूजा होती है; आकार की अर्चना से अर्चा नहीं होती । चिन्मात्र आत्मसंवित् को त्यागकर और जड़ की जो अर्चना करते हैं, वे चिरकाल पर्यन्त क्लेश के भागी होते हैं । हे ब्राह्मण ! जो ज्ञात-ज्ञेय पुरुष हैं, आत्मध्यान से भिन्न पूजन-अर्चन को बालक की क्रीड़ा सा मानते हैं । आत्मा भगवान् एक देव है । वही शिव और परम कारणरूप है । उसका सर्वदा ज्ञान-अर्चन से पूजन करो । और कोई पूजा नहीं है । चैतन्य, आकाश और निरवयव स्वभाव एक आत्मदेव को जानो । पूज्यपूजक और पूजा त्रिपुटी से आत्मदेव की पूजा नहीं होती । मैंने पूछा, हे भगवन् ! चैतन्य आकाशमात्र आत्मा को कैसे जगत् और चैतन्य को कैसे जीव कहते हैं, सो कहो ।
ईश्वर बोले, हे मुनीश्वर ! चैतन्य आकाश प्रसिद्ध है । वह प्रकृति से रहित है । जो महाकल्प में शेष रहता है, वह आप ही किंचनरूप होता है । उसी किंचन से यह जगत् होता है । जैसे स्वप्न में चिदात्मा ही सर्वगत जगतरूप होकर भासता है, वैसे ही जाग्रत् जगत् भी चिदाकाशरूप है । आदि सर्ग से लेकर इस काल पर्यन्त आत्मा से भिन्न पदार्थ का अभाव है । जैसे स्वप्न में जो जगत् भासता है, सो भी सब चिदाकाशरूप है, भिन्न कल्पना कोई नहीं । चिन्मात्र ही पहाड़रूप है, चिन्मात्र ही जगत् है, चिन्मात्र ही आकाश है, चिन्मात्र ही सब जीव है, और चिन्मात्र ही सब भूत है, चिन्मात्र से भिन्न कुछ नहीं । सृष्टि के आदि से अन्त पर्यन्त जो कुछ द्वैतकल्पना भासती है, सो भ्रममात्र है । जैसे स्वप्न में कोई किसी के अङ्ग काटे सो वास्तव में काटता तो नहीं, निद्रा-वेश से ऐसा लगता है, वैसे ही यह जाग्रत् जगत् भी भ्रममात्र है । हे मुनीश्वर ! आकाश, परमाकाश और ब्रह्माकाश, तीनों एक ही के पर्याय हैं । जैसे स्वप्न में संकल्परूप माया से जो अनुभव होता है सो सब चिदाकाश है, वैसे ही यह जाग्रत् जगत् चिदाकाशरूप है । जैसे स्वप्नपुर आकाश में भिन्न नहीं होता, वैसे जाग्रत् स्वप्न भी आत्मतत्त्व होकर भासित होता है, आत्मा
७८ $$\text{∗ योगवाशिष्ठ ∗}$$
से भिन्न वस्तु नहीं है। हे मुनीश्वर ! जैसे स्वप्न में चिदाकाश ही घट, पट आदि के रूप में भासित होता है, वैसे ही स्थिति-प्रलयादि जगत् चिदात्मा से भिन्न नहीं है; आत्मा ही ऐसे भासित होता है। जैसे शुद्ध संवित् मात्र से भिन्न स्वप्न में नगर नहीं पाया जाता, वैसे ही जाग्रत् में अनुभव से भिन्न कुछ नहीं पाते। हे मुनीश्वर ! जगत् जो तीनों कालों में भाव-अभावरूप पदार्थ होकर भासित होता है, सो सब चिदाकाशरूप है, आत्मा से भिन्न नहीं। हे मुनीश्वर ! यह देव का रूप मैंने तुमसे परमार्थ कहा है। तुम में और सर्वभूत जाति जगत् में सबका जो देव है, वह चिदाकाश परमात्मा है—उससे भिन्न कुछ नहीं। जैसे संकल्प-पुर में चिदाकाश ही शरीररूप से भासित होता है, उससे भिन्न कुछ नहीं, वैसे ही यह सब चिदाकाशरूप है।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे ईश्वरोपाख्याने जगत्परमात्म-रूपवर्णनन्नामाष्टाविंशतितमस्सर्गः ॥ २८ ॥
ईश्वर बोले, हे ब्राह्मण ! इस प्रकार यह सब विश्व केवल परमात्मारूप है। परमात्माकाश ब्रह्म ही एक देव कहलाता है, उसी का पूजन सार है और उसी से सब फल प्राप्त होते हैं। वह देव सर्वज्ञ है और सब उसमें स्थित हैं। वह अकृत्रिम देव अज, परमानन्द और अखण्डरूप है। उसको साधना करके पाना चाहिए, जिससे परम सुख प्राप्त होता है। हे मुनीश्वर ! तुम जागे हुए हो, इस कारण मैंने तुमसे इस प्रकार की देव अर्चना कही है। पर जो असम्यग्दर्शी बालक हैं, जिनको निश्चयात्मक बुद्धि नहीं प्राप्त हुई, उनके लिए धूप, दीप, पुष्प, चन्दन आदिक से अर्चना कही है और आकार कल्पित करके देव की मिथ्या कल्पना की है। हे मुनीश्वर ! अपने संकल्प में जो देव बनाते हैं और उसको पुष्प, धूप, दीपादिक से पूजते हैं, सो भावनामात्र है। उससे उनको संकल्परचित फल की प्राप्ति होती है। यह बाल-बुद्धि की अर्चना है। तुम जैसों की वही पूजा है, जो तुमसे सर्व आत्म-भावना में मैंने कही है। हे मुनीश्वर ! हमारे मन में तो देव और कोई नहीं; एक परमात्मा देव ही तीनों भुवनों में है। वही देव शिव और सर्वपद से अतीत है। वह सब संकल्पों से रहित है।
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सब संकल्पों का अधिष्ठान भी वही है। वह देश-काल और वस्तु के परिच्छेद से रहित और सब प्रकार शान्तरूप एक चिन्मात्र निर्मल-स्वरूप है। वही देव कहलाता है। हे मुनीश्वर ! जो संवित्सत्ता पञ्चभूत-कला से अतीत और सब भावों के भीतर स्थित है, वही सबको सत्ता देनेवाला देव है। सबकी सत्ता हरनेवाला भी वही है।
हे ब्राह्मण ! जो ब्रह्म सत्य-असत्य के मध्य और सत्य-असत्य के परे कहाता है, वही देव परमात्मा है। जो परम स्वतः सत्तास्वभाव से सबको प्राप्त हुआ है और महाचित्त कहाता है, वही परमात्म देव सत्ता है। जैसे सब वृक्षों व लताओं के भीतर रस स्थित है, वैसे ही समान सत्ता रूप से परमचेतन आत्मा सर्वत्र स्थित है। जो चैतन्यतत्त्व अरुन्धती का है और चैतन्यतत्त्व तुम निष्पाप मुनि का और पार्वती का है, वही चैतन्यतत्त्व मेरा है। वही चैतन्यतत्त्व त्रिलोकी मात्र का है, वही देव है और कोई देव नहीं। हाथ-पाँव से युक्त जिस देव की कल्पना करते हैं, वह चिन्मात्र सार नहीं है। चिन्मात्र ही सब जगत् का सारभूत है और वही अर्चना करने योग्य है। उससे सब फलों की प्राप्ति होती है। वह देव कहीं दूर नहीं और किसी प्रकार किसी को प्राप्त होना भी कठिन नहीं। जो सबकी देह में स्थित और सबका आत्मा है, वह दूर कैसे हो और कठिनता से कैसे प्राप्त हो। सब क्रिया वही करता है। भोजन, भरण और पोषण वही करता है। वही श्वास लेता है। सबका ज्ञाता भी वही है। वह पुर्यष्टका में प्रतिबिम्बित होकर प्रकाशित होता है। जैसे पर्वत पर जो चर-अचर की चेष्टा होती है और चलते बैठते और स्थित होते हैं, उन सबका आधारभूत पर्वत है, वैसे ही मन सहित षट्इन्द्रियों की चेष्टा आत्मा के आश्रय में होती है। उसी की संज्ञा व्यवहार के निमित्त तत्त्ववेत्ताओं ने देव कल्पित की है। एकदेव, चिन्मात्र, सूक्ष्म, सर्वव्यापी, निरञ्जन, आत्मा, ब्रह्म इत्यादि नाम ज्ञानवानों ने उपदेशरूप व्यवहार के निमित्त रक्खे हैं। हे मुनीश्वर ! जो कुछ विस्तार सहित जगत् भासता है, उस सबका वह प्रकाशक है और सबसे रहित भी है। वह नित्य, शुद्ध और अद्वैतरूप है और सब जगत् में अनुस्यूत
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है । जैसे वसन्तऋतु में नाना प्रकार के फूल और वृक्ष दिखते हैं, पर सबमें एक ही रस व्याप रहा है और अनेक रूप भासित होता है, वैसे ही एक ही आत्मसत्ता अनेक रूप देख पड़ती है ।
हे मुनीश्वर ! जो कुछ जगत है सो सब आत्मा का चमत्कार है और आत्मतत्त्व में ही स्थित है । कहीं आकाश, कहीं जीव, कहीं चित्त और कहीं अहंकाररूप है । कहीं दिशारूप, कहीं द्रव्य, कहीं भाव-विकार, कहीं तम, कहीं प्रकाश और कहीं सूर्य, पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु आदिक स्थावर जङ्गमरूप होकर स्थित है । जैसे समुद्र में तरङ्ग और बुलबुले होते हैं, वैसे ही एक परमात्मा देव में त्रिलोकी है । हे मुनीश्वर ! देवता, दैत्य, मनुष्य आदि सब एक देव में रहते हैं । जैसे जल में तृण बहते हैं, वैसे ही परमात्मा में जीव रहते हैं । वही चैतन्यतत्त्व चतुर्भुज होकर दैत्यों का नाश करता है, जैसे जल मेघरूप होकर धूप को रोकता है । वही चैतन्यतत्त्व त्रिनेत्र, मस्तक पर चन्द्र धारण किये, वृषभ पर आरूढ़, पार्वतीरूप कमलिनी के मुख का भँवरा बना रुद्र होकर स्थित होता है । वही चेतना विष्णुरूपसत्ता है, जिसके नाभि-कमल से ब्रह्मा, त्रिलोकी, वेदत्रयरूप कमलिनी की लता बढ़ी होकर स्थित हुई है । हे मुनीश्वर ! इस प्रकार एक ही चैतन्यतत्त्व अनेक रूप होकर स्थित हुआ है । जैसे एक ही रस अनेक रूप होता है और जैसे एक ही सुवर्ण अनेक भूषण बनता है, वैसे ही एक ही चैतन्य अनेक रूप होकर दिखता है । इससे सब देह एक चैतन्यतत्त्व की हैं । जैसे एक वृक्ष के अनेक पत्ते होते हैं, वैसे एक ही चैतन्य की सब देह हैं । वही चैतन्य मस्तक पर चूड़ामणि धारनेवाला त्रिलोकपति इन्द्र है । देवतारूप होकर वही स्थित हुआ है और दैत्यरूप होकर भी वही स्थित है । मरने और उपजने का रूप भी वही रखता है । जैसे एक समुद्र में जो तरङ्ग के समूह उपजते और मिट जाते हैं, सो सब जलरूप ही हैं, वैसे ही उत्पत्ति और विनाश चैतन्य में होता है । वह चैतन्यरूप परमात्मा एक ही वस्तु है ।
हे मुनीश्वर ! चैतन्यरूपी आदर्श में जगतरूपी प्रतिबिम्ब पड़ता है
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और अपनी रची हुई वस्तु को आप ही ग्रहण करके अपने में धारण करता है । जैसे गर्भिणी स्त्री अपने गर्भ को धारण करती है, वैसे ही चैतन्यतत्त्व जगतरूप प्रतिबिम्ब को धारण करता है । हे मुनीश्वर ! सब क्रियाएँ उसी देव से सिद्ध होती हैं और सूर्यादिक उसी से प्रकाश देते और प्रफुल्लित होते हैं । जैसे नील और रक्त कमल सूर्य से प्रफुल्लित होते हैं, वैसे ही आत्मा में अन्धकार और प्रकाश, दोनों सिद्ध होते हैं । हे मुनीश्वर ! त्रिलोकीरूप धूल चेतनरूपी वायु से उड़ती है । जो कुछ जगत् के आरम्भ हैं, उन सबको चैतन्यरूपी दीपक प्रकाशित करता है । जैसे जल सींचने से बेल प्रफुल्लित होती है और फूल-फल उत्पन्न करती है वैसे ही चैतन्यसत्ता सब पदार्थों को प्रकट और सबको सत्ता देकर सिद्ध करती है । हे मुनीश्वर ! चैतन्य ही में जड़ की सिद्धि और चेतन ही में जड़ का अभाव होता है । जैसे प्रकाश ही से अन्धकार सिद्ध होता है और प्रकाश ही से अन्धकार का अभाव होता है, वैसे ही सब देह चैतन्य से सिद्ध होते हैं और चैतन्य ही देहों का अभाव होता है । विष्णु भी उसी में होते हैं और शिवजी भी उसी में होते हैं । हे मुनीश्वर ! ऐसा पदार्थ कोई नहीं, जो चैतन्य बिना सिद्ध हो । जो कोई पदार्थ है सो आत्मा ही से सिद्ध होता है ।
हे मुनीश्वर ! शरीररूपी सुन्दर वृक्ष की बड़ी ऊँची डालें हैं, परन्तु चैतन्यरूपी मञ्जरी बिना वह नहीं सोहता । जैसे रस बिना वृक्ष नहीं सोहता, वैसे ही चैतन्य बिना शरीर नहीं सोहता । बढ़ना, घटना आदि जो विकार हैं, वे एक आत्मा से ही सिद्ध होते हैं । यह सब जगत् चैतन्यरूप है और चैतन्यमात्र ही अपने आपमें स्थित है । इतना कह वशिष्ठजी बोले, हे राम ! जब इस प्रकार अमृतरूपी वाणी से त्रिनेत्र ने मुझसे कहा, तब मैंने नम्रता से पूछा—हे देव ! जब सब जगत् चैतन्य व्यापकरूप देव है और चैतन्य ही बड़े विस्तार को प्राप्त हुआ है, तब यह प्रथम चेतन था, अब यह चेतनता से रहित है, इस कल्पना का सब लोकों में प्रत्यक्ष अनुभव कैसे होता है ? ईश्वर बोले, हे ब्रह्मवेत्ताओं में श्रेष्ठ । यह महाप्रश्न तुमने किया है । इसका उत्तर सुनो ।
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इस शरीर में दो चेतन स्थित हैं। एक चैतन्योन्मुखत्वरूप है और दूसरा निर्विकल्प आत्मा। जो चेतन चैतन्योन्मुखत्व दृश्य से मिला हुआ है, वह जीव संकल्प के फुरने से अन्य की भाँति हो गया है, पर वास्तव में और कुछ नहीं हुआ, केवल दृश्य संकल्प के अनुभव को ग्रहण करने से वही जीवरूप हुआ है। जैसे स्त्री अपने शीलधर्म को त्यागकर दुराचारिणी हो जाती है तो उसकी शीलता जाती रहती है, परन्तु स्त्री का स्वरूप नहीं जाता, वैसे ही चैतन्योन्मुखत्व मे अनुभवरूपी जीवरूप हो जाता है, परन्तु चैतन्यस्वरूप का त्याग नहीं करता। जैसे संकल्प के वश से पुरुष एक क्षण में और रूप हो जाता है, वैसे ही चित्तसत्ता फुरने के भाव से अन्य रूप हो जाती है।
हे मुनीश्वर ! आदि में चित्त का स्पन्दन चित्कला में हुआ है। तब शब्द के चेतने से आकाश हुआ। फिर स्पर्श तन्मात्रा के चेतने से वायु प्रकट हुआ। इसी प्रकार पाँचों तन्मात्राओं के चेतने से पञ्चतत्त्व हुए। फिर देश आदि का विभाग हुआ, उसमें जीव प्रतिबिम्बित हुआ। फिर निश्चयवृत्ति हुई। उसका नाम बुद्धि हुआ। फिर अहंवृत्ति चेती। उसका नाम अहंकार हुआ। फिर संकल्प-विकल्पवृत्ति चेती। उसका नाम मन हुआ। चिन्तना से चित्त हुआ। फिर संसार की भावना हुई। तब संसार का अनुभव हुआ और अभ्यास-वश संसार भासित होने लगा। जैसे विपर्ययभावना करके ब्राह्मण अपने को चाण्डाल जाने, वैसे ही भावना के विपर्यय से वही चैतन्य अपने को जीव मानने लगा है। संकल्प की दृढ़ता से वही चैतन्य चेतनरूपी जीवरूप को ग्रहण कर संकल्प में बरतता है और अनन्त संकल्पों से जड़ता तीव्रता को प्राप्त होकर जड़भाव को ग्रहण कर देहभाव को प्राप्त होती है। जैसे जल दृढ़ जड़ता से बरफ बन जाता है, वैसे ही चैतन्य जब अनन्त संकल्पों से जड़ देहभाव को प्राप्त होता है, तब चित्त मन मोहित हो जड़ता का आश्रय करके संसार में जन्म लेता है और मोह के कारण तृष्णा से पीड़ित होता और काम, क्रोधसंयुक्त भाव-अभाव को प्राप्त होता है। एवं अपनी अनन्तता को त्यागकर परिच्छिन्न व्यवहार में
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बरतता है; दुःखदायक अग्नि से तप्त हो शून्यभाव को प्राप्त होता है और भेद को ग्रहण करके महादीन हो जाता है ।
हे मुनीश्वर ! मोहरूपी गड्ढे में जीवरूपी हाथी फँसा है और भाव-अभाव से सदा चलायमान होता है। जैसे जल में तृण बहता है, वैसे ही असाररूप संसार में विकारसंयुक्त जीव रागद्वेष से तपता रहता है, शान्ति कभी नहीं पाता। जैसे जत्थे से बिछुड़ा मृग कष्ट पाता है, वैसे ही आवरणरूप जन्म-मरण से जीव कष्ट पाता है और अपने संकल्प से आप ही भय पाता है। जैसे बालक अपनी परछाहीं में वैताल की कल्पना कर आप ही भय पाता है, वैसे ही जीव अपने संकल्प से आप ही भयभीत होता है और संकट में पड़ता है। आशारूपी फाँसी में बँधा हुआ जीव कष्ट पर कष्ट पाता है और कर्मों को करके संतप्त होता हुआ अनेक जन्म पाता है और भयातुर रहता है। बालपन में महादीन और परवश होता है। यौवन की अवस्था में कामादिक के वश हुआ स्त्री में रत रहता है और वृद्ध अवस्था में चिन्ता-मग्न होता है। जब मृतक होता है, तब कर्म-वश फिर जन्म लेता और गर्भ में दुःख पाता है। फिर बालक, यौवन, वृद्ध और मृतक अवस्था को पाता है। स्वरूप से गिरा हुआ जीव इसी प्रकार भटकता है, कदापि स्थिर नहीं होता।
हे मुनीश्वर ! एक चित्सत्ता स्पन्दनभाव से अनेक भावों को प्राप्त होती है। कहीं दुःख से रुदन करती है, कहीं दुःख भोगती है। कहीं स्वर्ग में देवाङ्गना, पाताल में नागिनी, असुरों में असुरी, राक्षसों में राक्षसी, वनकोट में वानरी, सिंहों में सिँही, किन्नरों में किन्नरी, हरिणों में हरिणी, विद्याधरों में विद्याधरी, गन्धर्वों में गन्धर्वी, देवताओं में देवी इत्यादि जो रूप रचती है सो चैतन्योन्मुखत्व जीवकाल है। क्षीर-समुद्र में वह विष्णुरूप होकर स्थित होती है। ब्रह्मपुरी में ब्रह्मारूप होती है। पञ्चमुख होकर रुद्र होती है और स्वर्ग में इन्द्र होती है। तीक्ष्णकला से दिन का कर्त्ता सूर्य होती है और क्षण, दिन, मास, वर्ष का विभाग करती है। वही चन्द्रमा होकर रात्रि करती और काल होकर
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नक्षत्रमंडल को घुमाती है । कहीं प्रकाश, कहीं तम, कहीं बीज, कहीं पाषाण, कहीं मन होती है । कहीं नदी होकर बहती है, कहीं फूल होकर फूलती है, कहीं भँवर होकर सुगन्ध लेती है, कहीं फल होकर दिखती है, कहीं वायु होकर चलती है, कहीं अग्नि होकर जलाती है, कहीं बरफ बनती है और कहीं आकाश होकर देख पड़ती है । हे मुनीश्वर ! इसी प्रकार सर्वगत सर्वात्मा सर्वशक्तिसत्ता से एक ही रूप चित्शक्ति और आकाश से भी निर्मल है । जीव जैसे चेतता है, वैसा ही होकर स्थित हुआ है । जैसी-जैसी भावना करता है, शीघ्र ही उसका वैसा रूप हो जाता है । परन्तु वह स्वरूप से भिन्न नहीं होता । जैसे समुद्र में फेन तरङ्ग होकर बहते हैं, परन्तु जल से भिन्न नहीं—जल ही जल हैं, वैसे ही चित्शक्ति अनेक रूपों को रखती है, परन्तु चैतन्य से भिन्न नहीं होती । चित्शक्ति ही कहीं हंस, कहीं काक, कहीं शूकर, कहीं मक्खी, चिड़िया इत्यादि रूप रखकर संसार में प्रवृत्त होती है । जैसे जल में पड़ा तृण भ्रमता है, वैसे ही भ्रमती है और अपने संकल्प से आप ही भय पाती है । जैसे गधा अपना शब्द सुन आप ही दौड़ता है और भय पाता है, वैसे ही जीव अपने संकल्प से आप ही भय पाता है ।
हे मुनीश्वर ! यह मैंने जीवशक्ति का आचार तुमसे कहा । इसी आचार को ग्रहण करके बुद्धि नीच पशुधर्मिणी हुई है और स्वरूप के प्रमाद से जैसा-जैसा संकल्प करती है वैसी ही वैसी कर्मगति को प्राप्त हो शोकातुर होती है, अनन्त दुःख पाती है और अपने मोह से ही मलिन होती है । जैसे भूसी से ढका चावल-कूँडा पीटा जाता है; फिर फिर बोया जाता है; फिर फिर उगता है और काटा जाता है, वैसे ही स्वरूप के आवरण से, दुर्भाग्य से जीवकला जन्म-मरण के दुःख को प्राप्त होती है । जैसे भर्त्ता रहित स्त्री शोक से व्याकुल होती है, वैसे ही जीवकला कष्ट पाती है । हे मुनीश्वर ! जड़दृश्य और अनात्मरूप में प्रीति करने और जिन स्वरूप के विस्मरण मे आशारूपी फाँसी से बँधा हुआ चित्त जीव को नीच योनि में पहुँचाता है । जैसे घटीयन्त्र कभी नीचे जाता
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है और कभी ऊपर को, वैसे ही जीव आशा के वश कभी पाताल और कभी आकाश को जाता है ।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे वशिष्ठेश्वरसंवादे चैतन्यो- न्मुखत्वविचारो नामैकोनत्रिंशत्तमसर्गः ॥ २९ ॥
ईश्वर बोले, हे मुनीश्वर ! स्वरूप के विस्मरण से जो इस प्रकार होता है कि मैं मारनेवाला हूँ, मैं दुखी हूँ, सो अनात्मा में अहं प्रतीति करके ही जीव दुःख का अनुभव करता है । जैसे स्वप्न में पुरुष अपने को पर्वत से गिरता देख दुखी होता है और अपने को मृतक देखता है, वैसे ही जीव स्वरूप के प्रमाद से अनात्मा में आत्म-अभिमान करके आपको दुखी देखता है । हे मुनीश्वर ! शुद्ध चैतन्यतत्त्व में जो चित्तभाव हुआ है, वही चित्तकला चेतने से जगत् का कारण हुआ है, परन्तु वास्तव में स्वरूप से भिन्न नहीं है । जैसे-जैसे चित्तकला चेतती गई है, वैसे ही वैसे जगत् होता गया है । वह चित्त का कारण भी नहीं हुआ और जब कारण ही नहीं हुआ, तब कार्य किसको कहिये ? हे मुनीश्वर ! न वह चित्त है, न चेतन है, न चेतनेवाला है, न द्रष्टा है, न दृश्य है और न दर्शन है; जैसे पत्थर में तेल नहीं होता । न कारण है, न कर्म है और न कारण इन्द्रियाँ हैं; जैसे चन्द्रमा में श्यामता नहीं होती । न वह मन है और न मानने योग्य दृश्य वस्तु है, जैसे आकाश में अंकुर नहीं होता । न वह अहंता है, न तम है और न दृश्य है; जैसे शंख को श्यामता नहीं होती । हे मुनीश्वर ! न वह विविध या अनेक है, न विविधता-रहित एक है; जैसे अणु में सुमेरु नहीं होता । न वह शब्द है, न स्पर्श का अर्थ है; जैसे मरुस्थल में बेल नहीं होती । न वस्तु है, न अवस्तु है; जैसे बरफ में उष्णता नहीं होती । न शून्य है, न अशून्य है, न जड़ है, न चेतन है; जैसे सूर्यमण्डल में अन्धकार नहीं होता । हे मुनीश्वर ! शब्द और अर्थ इत्यादि की कल्पना भी उसमें नहीं; जैसे अग्नि में शीतलता नहीं होती । वह तो केवल केवलीभाव अद्वैत चिन्मात्र तत्त्व है स्वरूप से किसी को कुछ भी दुःख नहीं होता ।
हे मुनीश्वर ! जगत् और असत् जानकर अभावना करना और आत्मा
८६ ✻ योगवाशिष्ठ ✻
को सत् जानकर भावना करना । इस भावना से सब अनर्थ निवृत्त हो जाते हैं । पर यह और किसी उपाय से नहीं प्राप्त होती अपने आप ही प्राप्त होती है और अनादि ही सिद्ध है । जब उस आत्मा की ओर भावना होती है, तब सब भ्रम मिट जाते हैं और जब अनात्म भावना होती है, तब उसका पाना कठिन होता है । जो यत्न के साथ है सो यत्न बिना नहीं पाया जाता । आत्मा निर्विकल्प, अद्वैत और सबसे अतीत है, उसे अभ्यास बिना कैसे पा सकते हैं ? आत्मतत्त्व परम, एक स्वच्छ, तेज का भी प्रकाशक, सर्वगत, निर्मल, नित्य सदा उदित, शक्तिरूप, निर्विकार और निरञ्जन है । घट, पट, वट, वृक्ष, गादी, वानर, दैत्य, देवता, समुद्र, हाथी इत्यादि स्थावर-जङ्गमरूप जो कुछ जगत् है, सबका साक्षीरूप होकर आत्मतत्त्व स्थित है और दीपक की तरह सबको प्रकाशित करता है । आप सर्वक्रियातीत है, पर उसी से सब कार्य सिद्ध होते हैं । वह सर्वक्रियासंयुक्त भासित होता है और सर्वविकल्प से रहित जड़वत् भी भासित होता है । परन्तु वास्तव में परम चैतन्य है । आत्मतत्त्व सब चेतन का सार चेतन, निर्विकल्प और परमसूक्ष्म है और अपने आपमें किञ्चन ही भासित होता है । अपने ही प्रमाद से रूप, अवलोक और नमस्कार की त्रिपुटी भासित होती है; जब बोध होता है तब ज्यों का त्यों आत्मा भासित होता है । नित्य, शुद्ध, निर्मल और परमानन्दरूप के प्रमाद से चैतन्य चित्तभाव को प्राप्त होता है । जैसे साधु भी दुर्जन के संग से असाधु हो जाते हैं, वैसे ही अनात्मा के संग से यह नीचता को प्राप्त होता है । जैसे सोना दूसरी धातु के मेल से खोटा हो जाता है और जब शोधा जाता है, तब शुद्धता को प्राप्त होता है, वैसे ही अनात्मा के संग से यह जीव दुःखी होता है । जब अभ्यास और यत्न करके अपने शुद्ध रूप को पाता है, तब वही हो जाता है । जैसे मुख के श्वास से दर्पण मलिन हो जाता है तो उसमें मुख नहीं देख पड़ता, पर जब मलिनता मिट जाती है तब शुद्ध होता है और उसमें मुख स्पष्ट देख पड़ता है, वैसे ही चित्त संवेदन के प्रमाद से चेतने के कारण जगत्-भ्रम भासित होने लगता है और आत्म-