योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 868, कुल 1734 में से
संदर्भ में पढ़ें☸ निर्वाण प्रकरण ☸ ५७
सत्य और हाथ में रखे बिल्वफल सा प्रत्यक्ष जाना है। इस जगत् में मैं सुसुप्त, प्रबुद्ध हूँ। सुख पाकर मैं सुखी नहीं होता और दुःख पाकर दुःखी नहीं होता। सबका परममित्र हूँ, इसी कारण मैं दुःखरहित जीता हूँ। आपदा में अचलचित्त हूँ; संपदा में सब जगत् का मित्र हूँ और भाव-अभाव से ज्यों का त्यों हूँ; इस कारण सदा सुखी जीता हूँ। न मैं परिच्छिन्न अहं हूँ; न मेरी दृष्टि में कोई अन्य है; न कोई मेरा है और न मैं किसी का हूँ; यह भावना मेरे चित्त में दृढ़ है। मैं जगत् हूँ; मैं ही आकाश, देश, काल, क्रिया, सब हूँ; मुझे यह दृढ़ निश्चय है। घट भी चैतन्य है, पट भी चैतन्य है, रथ भी चैतन्य है और यह सब प्रपंच चैतन्य तत्त्व है; यह मुझको दृढ़ निश्चय है, इसी कारण दुःख-रहित जीता हूँ। हे मुनिशार्दूल ! यह सब जो मैंने तुमसे कहा, सो भुशुण्डि नाम काक ने, जो त्रिलोकीरूपी कमल का भँवरा है, मुझसे कहा था।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे भुशुण्ड्युपाख्याने चिरञ्जीविहेतुकथनं नाम द्वाविंशतितमस्सर्गः ॥ २२ ॥
भुशुण्डिजी बोले, हे मुनीश्वर ! जैसा मैं हूँ, सो तुम्हारी आज्ञा का पालन करने के लिए कहा है; नहीं तो गुरु के आगे कहना भी ढिठाई है। तुम ज्ञान के पारगामी हो। फिर मैं बोला, हे भगवन् ! आश्चर्य है और आश्चर्य से भी आश्चर्य है कि तुमने श्रवण का भूषण इस कथा को कहा। आत्मउदितरूप जो वचन तुमने कहे, वे परम विस्मय-जनक हैं। हे भगवन् ! तुम धन्य हो। तुम महात्मा पुरुष हो और चिरंजीवियों में तुम मुझको साक्षात् दूसरे ब्रह्मा जान पड़ते हो। आज मैं भी धन्य हूँ कि तुम जैसे महापुरुष के मुख से इस प्रकार आत्मतत्त्व सुना। जैसे मैंने पूछा, वैसे ही तुमने कहा। हे साधो ! मैंने सब भूतल के लोक, दिशाएँ, आकाश और पाताल के लोक भी देखे हैं; त्रिलोकी में तुम सा कोई बिरला ही होगा। जैसे बाँस बहुत हैं, पर मोती उपजानेवाला बिरला ही होता है, वैसे ही तुम जैसे बिरले हैं। हे साधो ! आज मैं पुण्यरूप हुआ, आज मेरी देह पवित्र हुई, जो तुम जैसे मुक्त आत्मा