योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
☸ निर्वाण प्रकरण ☸ ५७
सत्य और हाथ में रखे बिल्वफल सा प्रत्यक्ष जाना है। इस जगत् में मैं सुसुप्त, प्रबुद्ध हूँ। सुख पाकर मैं सुखी नहीं होता और दुःख पाकर दुःखी नहीं होता। सबका परममित्र हूँ, इसी कारण मैं दुःखरहित जीता हूँ। आपदा में अचलचित्त हूँ; संपदा में सब जगत् का मित्र हूँ और भाव-अभाव से ज्यों का त्यों हूँ; इस कारण सदा सुखी जीता हूँ। न मैं परिच्छिन्न अहं हूँ; न मेरी दृष्टि में कोई अन्य है; न कोई मेरा है और न मैं किसी का हूँ; यह भावना मेरे चित्त में दृढ़ है। मैं जगत् हूँ; मैं ही आकाश, देश, काल, क्रिया, सब हूँ; मुझे यह दृढ़ निश्चय है। घट भी चैतन्य है, पट भी चैतन्य है, रथ भी चैतन्य है और यह सब प्रपंच चैतन्य तत्त्व है; यह मुझको दृढ़ निश्चय है, इसी कारण दुःख-रहित जीता हूँ। हे मुनिशार्दूल ! यह सब जो मैंने तुमसे कहा, सो भुशुण्डि नाम काक ने, जो त्रिलोकीरूपी कमल का भँवरा है, मुझसे कहा था।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे भुशुण्ड्युपाख्याने चिरञ्जीविहेतुकथनं नाम द्वाविंशतितमस्सर्गः ॥ २२ ॥
भुशुण्डिजी बोले, हे मुनीश्वर ! जैसा मैं हूँ, सो तुम्हारी आज्ञा का पालन करने के लिए कहा है; नहीं तो गुरु के आगे कहना भी ढिठाई है। तुम ज्ञान के पारगामी हो। फिर मैं बोला, हे भगवन् ! आश्चर्य है और आश्चर्य से भी आश्चर्य है कि तुमने श्रवण का भूषण इस कथा को कहा। आत्मउदितरूप जो वचन तुमने कहे, वे परम विस्मय-जनक हैं। हे भगवन् ! तुम धन्य हो। तुम महात्मा पुरुष हो और चिरंजीवियों में तुम मुझको साक्षात् दूसरे ब्रह्मा जान पड़ते हो। आज मैं भी धन्य हूँ कि तुम जैसे महापुरुष के मुख से इस प्रकार आत्मतत्त्व सुना। जैसे मैंने पूछा, वैसे ही तुमने कहा। हे साधो ! मैंने सब भूतल के लोक, दिशाएँ, आकाश और पाताल के लोक भी देखे हैं; त्रिलोकी में तुम सा कोई बिरला ही होगा। जैसे बाँस बहुत हैं, पर मोती उपजानेवाला बिरला ही होता है, वैसे ही तुम जैसे बिरले हैं। हे साधो ! आज मैं पुण्यरूप हुआ, आज मेरी देह पवित्र हुई, जो तुम जैसे मुक्त आत्मा
५८ ☸ योगवाशिष्ठ ☸
का दर्शन हुआ। हे साधो! अब सप्तर्षियों के बीच जाता हूँ; मेरी मध्याह्न सन्ध्या का समय हुआ है।
जब मैंने ऐसे कहा, तब भुशुण्डि कल्पवृक्ष से उठ खड़ा हुआ। उसने सुवर्ण का पात्र मोती और रत्नों से भरा और अर्घ्यपाद्य से पूजन किया। जैसे सदाशिव की पूजा करते हैं, वैसे ही उसने चरणों से लेकर मस्तक पर्यन्त मेरा पूजन किया और बहुत नम्र होकर प्रणाम किया। मैंने भी उसको प्रणाम किया। इस प्रकार परस्पर नमस्कार करके मैं वहाँ से उठ खड़ा हुआ और आकाशमार्ग को चला। जैसे पक्षी उड़ता है, वैसे ही मैं उड़ा और वह भी मेरे साथ उड़ा। परस्पर हम दोनों हाथ मिलाये जब एक योजन पर्यन्त चले गये, तब मैंने उससे कहा, हे साधो! तुम अब यहाँ से लौट जाओ। इस प्रकार बारम्बार कहकर मैंने उसको रोका और मैं चला गया। जब तक मैं उसको देख पड़ता रहा, तब तक वह देखता रहा। जब मैं न दिखा, तब वह अपने स्थान में जा बैठा। मैं सप्तर्षियों के मण्डल में जा पहुँचा और अरुन्धती ने मेरा पूजन किया।
हे राम! भुशुण्डि के आश्चर्यजनक वचन मैंने तुमको सुनाये। अब भी सुमेरु के शिखर पर उस कल्पवृक्ष की लता में वह कल्याणरूप वैसे ही स्थित है। वह शान्तिरूप मान करने के योग्य और सदा समाधिस्थ है। हे राम! यह मेरा और उसका समागम सतयुग के दो सौ वर्ष व्यतीत होने पर हुआ था। अब सतयुग बीत गया और त्रेतायुग चल रहा है, जिसमें तुम उपजे हो। हे राम! अभी आठ वर्ष पहले मेरा और उसका फिर समागम हुआ था। वह उसी वृक्षलता पर है। हे राम! यह इतिहास जो मैंने तुमसे कहा है, सो परम उत्तम है। जब इसको विचारोगे, तब संसारभ्रम निवृत्त हो जायगा। मुनि वशिष्ठ और भुशुण्डि की कथा को जो निर्मल बुद्धि से विचारेगा, वह भवरूप संसार के भय से छूट जायगा।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे भुशुण्ड्यु पाख्यानसमाप्तिर्नाम त्रयोविंशतितमस्सर्गः ॥ २३ ॥
❊ निर्वाण प्रकरण ❊ ५६
वशिष्ठजी बोले, हे अनघ ! यह जो मैंने तुमसे भुशुण्डि का वृत्तान्त कहा, इसे बोध करके भुशुण्डि महासंकट से तरा है। इस दशा को तुम भी आश्रय करके प्राणों की युक्ति से अभ्यास करो। तब तुम भी भुशुण्डि की नांई भवसमुद्र के पार होगे। जैसे भुशुण्डि ने ज्ञानयोग द्वारा पाने के योग्य पद पाया है, वैसे ही तुम भी पाओ और जैसे प्राण-अपान के अभ्यास से भुशुण्डि को परमतत्त्व प्राप्त हुआ, वैसे ही तुम भी अभ्यास करके पाओगे। विज्ञानदृष्टि जो तुमने सुनी है, उसकी ओर चित्त को लगाकर आत्मपद को पाओ, फिर जैसी इच्छा हो, वैसा करो।
राम ने पूछा, हे भगवन् ! पृथ्वी में आपके ज्ञानरूपी सूर्य की किरणों के प्रकाश से मेरे हृदय से अज्ञानरूपी तम दूर हो गया और अब प्रबुद्ध होकर अपने आनन्दरूप में स्थित हुआ हूँ। मैंने जानने योग्य पद को जान लिया, मानो दूसरा वशिष्ठ हो गया हूँ। हे भगवन् ! यह भुशुण्डि का चरित्र आपने परमार्थबोध के निमित्त कहा, अब, मेरा प्रश्न यह है कि रक्त, मांस और अस्थि का शरीररूपी गृह किसने रचा है, कहाँ से उपजा है, कैसे स्थित हुआ है और कौन इसमें स्थित है ? वशिष्ठजी बोले, हे राम ! परमार्थतत्त्व के बोध और दुःख की निवृत्त के अर्थ ये मेरे वचन हैं, सुनो। अस्थि इस शरीररूपी गृह का खम्भा है और इसके नव द्वार हैं। रक्त-मांस से जो यह लेपन किया है, सो किसी ने बनाया नहीं आभासमात्र है और मिथ्या भ्रम से भासित होता है। जैसे आकाश में दूसरा चन्द्रमा भ्रम से भासित हो, वैसे ही असतरूप यह शरीर भी भ्रम से भासित होता है। हे राम ! जब तक अज्ञान है, तब तक देह सत्य भासित होता है, और जब ज्ञान होता है, तब देह असतरूप भासित होता है। जैसे स्वप्नकाल में स्वप्न के पदार्थ सत्य जान पड़ते हैं और जाग्रतकाल में स्वप्न असत्य लगता है, वैसे अज्ञानकाल में अज्ञान के देहादिक पदार्थ सत्य लगते हैं, और ज्ञानकाल में असत्य हो जाते हैं। जैसे जल में बुलबुला जल के अज्ञान से सत्य लगता है और जल के जाने से असत्य लगता है, या सूर्य की किरणों में मरुस्थल की नदी दिखती है, वैसे ही आत्मा में देह की भावना होती है। हे राम ! जो कुछ जगत्-
६० ❇ योगवाशिष्ठ ❇
प्रपंच भासित होता है वह सब आभासमात्र है और अज्ञान से भासित होता है और 'अहं', 'त्वं' आदिक कल्पना सब मनोमात्र मन में फुरती हैं । तुम जो कहते हो कि देह अस्थि और मांस का गृह रचा है, सो अस्थि-मांस से नहीं रचा, केवल संकल्पमात्र है । संकल्प से भासित होता है और संकल्प के अभाव में देह नहीं पाई जाती । हे राम ! स्वप्न में जो देह रखकर दिशा, तट, पर्वत इत्यादि तुम देखते फिरते हो, जाग्रत् में वह तुम्हारी देह कहाँ जाती है ? जो देह सत्य होती तो जाग्रत् में भी रहती । जीव मनोराज्य से स्वर्ग को जाता है तथा सुमेरु और भूमिलोक में फिरता है । हे राम ! इन स्थानों में जैसे मन का फुरना देह होकर भासित होता है सो असत्यरूप है, वैसे ही यह शरीर मन के स्फुरणमात्र है, इससे असत्य जानो ।
यह मेरा धन है, यह मेरी देह है, यह मेरा देश है इत्यादिक कल्पना मन की रची हुई है-सबका बीज चित्त ही है । हे राम ! जगत् को दीर्घकाल का सपना जानो या दीर्घ चित्त का भ्रम जानो अथवा दीर्घ मनोराज्य जानो । वास्तव में जगत् कुछ नहीं है । जब जीव अपने वास्तव परमात्मस्वरूप को अभ्यास करके जानता है, तब जगत् असत्य-रूप भासित होता है । हे राम ! मैंने पहले भी तुमसे ब्रह्माजी के वचनों से कहा है कि सब जगत् मन का रचा हुआ है-इससे संकल्पमात्र है । चिरकाल के अभ्यास से सत् प्रतीत होता है । जब दृढ़ प्रयत्न से पुरुष को आत्म-अभ्यास हो तब असत्य जान पड़ेगा । हे राम ! जो भावना हृदय में दृढ़ होती है, उसका अभाव भी सुगम नहीं होता; पर जब उसके विपरीत भावना का अभ्यास करिये, तब उसका अभाव हो जाता है । यह मैं हूँ, यह और है इत्यादिक कलना जो हृदय में दृढ़ हो रही है, जब इसके विपरीत आत्मभावना हो, तब वह मिटे और सर्वत्र सब आत्मा ही देख पड़े । हे राम ! जिसकी तीव्र भावना होती है, वही रूप उसका हो जाता है । जैसे कामी पुरुष को सुन्दर स्त्री की कामना रहती है, वैसे ही जीव को जब आत्मपद की चिन्ता रहे; तब वही रूप होता है । जैसे कीट भृङ्गी हो जाता है और जैसे दिन में जिस व्यापार
❄ निर्वाण प्रकरण ❄ ६१
का अभ्यास होता है तो रात्रि को स्वप्न में भी वही देख पड़ता है, वैसे ही जीव को जिसका दृढ़ अभ्यास होता है, वही अनुभव होता है। जैसे सूर्य आकाश में तपता है और मरुस्थल में जल होकर भासित होता है, पर वहाँ जल का अभाव है, वैसे ही भाव से रहित पृथ्वी आदिक पदार्थ भ्रम से भावरूप भासित होते हैं। जैसे दृष्टि-दोष से आकाश में तारे मोर-पुच्छ जैसे भासित होते हैं, वैसे ही अज्ञान से यह जगज्जाल भासित होता है। हे राम! यह सब जगत् आभासरूप है। स्वरूप के प्रमाद से जीव भय और दुःख को प्राप्त होता है, पर वह जब स्वरूप को जानता है, तब भ्रम, भय और दुःख से रहित होता है। जैसे स्वप्न में चित्त के भ्रम से सिंहों से भय पाता है, और जब जाग्रत् स्वरूप में चित्त आता है तब सिंह का भय निवृत्त हो जाता है, वैसे ही आत्मज्ञान से निर्भय होता है। जब वैराग्य का अभ्यास करके जीव निर्मल आत्म-पद पा जाता है, तब फिर क्षोभ को नहीं प्राप्त होता और रागद्वेष-रूपी मल उसको नहीं स्पर्श करते। जैसे ताँबा जब पारस के स्पर्श से सुवर्ण होता है, तब वह ताँबे के भाव को नहीं ग्रहण करता, वैसे ही जीव फिर मलिन नहीं होता। अहं, त्वं आदिक जो कुछ जगत् भासता है, वह सब आभासमात्र ही है।
हे राम! प्रथम सत्य और असत्य को जानकर असत्य का निरादर करो और सत्य का अभ्यास करो। तब चित्त सब कल्पनाओं से रहित होकर शान्तपद प्राप्त होता है। जो तत्त्वज्ञान से सम्यक्दर्शी हुआ है, उसको जगत् के इष्ट पदार्थ पाने से हर्ष नहीं होता और अनिष्ट को पाने मे शोक नहीं होता। वह न किसी की स्तुति करता है, न किसी की निंदा। वह हृदय में शीतल और शान्तरूप हो जाता है। जब कोई बान्धव मृतक हो, तब उससे दुःख क्यों होता है? वह तो अवश्य ही मरता। जब अपनी मृत्यु आवे, तब अदृश्य शरीर छूटता है। फिर वृथा क्यों संताप होता है। जब सम्पदा प्राप्त हो तो उससे उसे हर्ष नहीं होता; क्योंकि जो कुछ भोगना था सो भोगा; हर्ष किससे हुआ? दुःख आकर प्राप्त हो, तब शोक क्यों करना? शरीर का व्यवहार सुख-
६२
<div align="center"> * योगवाशिष्ठ * </div>दुःख आता जाता है और अमिट है । जब अपना किया कर्म उदय होता है, तब शोक क्यों करे ? हे राम ! जो सत्य है, वह असत्य नहीं और जो असत्य है सो सत्य नहीं । फिर रागद्वेष किस निमित्त करना ? जिसको ऐसा निश्चय हुआ है कि न मैं हूँ, न जगत् है और न पृथ्वी है, वह शोक किसका करे ? जब देह अन्य है और मैं चैतन्य हूँ तो चैतन्य का तो नाश नहीं होता । तब शोक किसका करना ? हे राम ! दुःख तो किसी प्रकार नहीं है; पर जब तक विचार नहीं तब तक दुःख होता है और विचार किये से कोई दुःख नहीं रहता । जो सम्यग्दर्शी मुनीश्वर है, वह सत्य को सत्य और असत्य को असत्य जानता है, इस कारण दुःख नहीं पाता । जो असम्यग्दर्शी है वह अज्ञान से दुःख पाता है । जैसे दिन के अन्त में पृथ्वी-मण्डल शीतल हो जाता है, वैसे ही सम्यग्दर्शी का हृदय शीतल होता है । जिसको कर्तव्य में कर्तृत्व का अभिमान नहीं है, वही सम्यग्दर्शी है ।
हे राम ! जितने जगत् के पदार्थ हैं, उनको हृदय से आभासमात्र जानो और बाहर जैसे आचार हों वैसे करो । अथवा उनका भी त्याग करो और निराभास होकर स्थित होओ । मैं चिदाकाश, नित्य, सर्वज्ञ और सबसे रहित हूँ, ऐसा अभ्यास करके अपने को एकान्त और निर्मल देखोगे । अथवा ऐसी धारणा करो कि न मैं हूँ, न ये भोग हैं, न अर्थरूप जगत् का आडम्बर है । अथवा ऐसे सोचो कि मैं ही नित्य, शुद्ध, चिदात्मा और आकाशरूप सब कुछ हूँ, मुझसे कुछ भिन्न नहीं । मैं अपने आपमें स्थित हूँ । इन दोनों पक्षों में जो इच्छा हो सो ग्रहण करो तो तुमको सिद्धि प्राप्त होगी । जगत् को आभासमात्र जानो, परन्तु यह भी कलङ्करूप है अतः इस चिन्तना को भी त्यागकर निराभास हो । तुम चिदाकाश, नित्य, सर्वव्यापी और सबसे रहित हो; आभास को त्यागकर निर्मल अद्वैत हो रहो, अथवा विधिनिषेध दोनों दृष्टियों का आश्रय करो । हे राम ! क्रिया को करो, परन्तु रागद्वेष से रहित हो । जब रागद्वेष से रहित होगे, तब उत्तम पदार्थ ब्रह्मानन्द को पाओगे; जो सबका अधिष्ठान है, उसको पाओगे । हे राम ! जिसका
- निर्वाण प्रकरण * ६३
हृदय रागद्वेषरूपी अग्नि से जलता है, उसको सन्तोष वैराग्य आदिक गुण नहीं प्राप्त होते । जैसे दग्ध भूतल के वन में हरिण प्रवेश नहीं करते, वैसे ही रागद्वेषादिकयुक्त हृदय में सन्तोषादिक नहीं प्रवेश करते ।
हे राम ! हृदय कल्पतरु है । ऐसा वृक्ष, जो रागद्वेषादिक सर्पों से रहित है, उसमे कौन पदार्थ है, जो प्राप्त न हो—शुद्ध हृदय से सब कुछ प्राप्त होता है । हे राम ! जो बुद्धिमान् है और शास्त्र का ज्ञाता भी है, परन्तु रागद्वेष-संयुक्त है, वह सियार की तरह नीच है । उसको धिक्कार है । जिन पदार्थों को पाने के निमित्त लोग यत्न करते हैं, वे तो आते-जाते रहते हैं । धन, को इकट्ठा कोई करता है और ले कोई जाता है । तब रागद्वेष किसका करिये ? जो कुछ प्रारब्ध है सो अवश्य होता है, धन का व्यर्थ यत्न क्यों करिये ? बान्धव और वस्त्र आते हैं, और फिर जाते भी हैं । जैसे समुद्र में जलजन्तुओं का आश्रय बुद्धिमान् नहीं लेते, वैसे ही जगत् के पदार्थों का आश्रय ज्ञानवान् नहीं लेते । भाव-अभावरूप परमेश्वर की माया है । संसार की रचना स्वप्न की तरह है । उसमें जो आसक्त होते हैं, उनको वह सर्पिणी की तरह डसता है । धन, बान्धव और जगत् वास्तव में मिथ्या ही हैं, अज्ञान से सत्य भासित होते हैं । हे राम ! जो आदि में न हो और अन्त में भी न रहे, पर मध्य में भासित हो, उसको भी असत्य जानिये । जैसे आकाश में फूल असत्य हैं, वैसे ही, संसार-रचना असत्य है । जैसे संकल्प की रचना असत्य है, जैसे गन्धर्वनगर सुन्दर भासित होता है, पर नष्ट हो जाता है और जैसे स्वप्नपुर दीर्घकाल का भासित होता है, पर भ्रमरूप है, वैसे ही यह जगत् असत्यरूप और भ्रममात्र है; केवल संकल्परूप अभ्यास के वश से दृढ़ता को प्राप्त हुआ है । दीवार जो साकार भासित होती है, वह आकार से रहित प्रकाशरूप है और आत्मपद सुषुप्ति की तरह अद्वैतरूप है । उस सुषुप्ति पद से जीव जब गिरता है, तब दीर्घ स्वप्न को देखता है ।
हे राम ! अज्ञानरूपी निद्रा में जो अपने स्वभाव से गिरा है, वह
६४
<div align="center">❊ योगवाशिष्ठ ❊</div>संसाररूपी स्वप्नश्रम को देखता है । जब अज्ञानरूपी निद्रा का अभाव हो, तब यह आत्मराज्य और निर्विकल्प मुदित आत्मपद को प्राप्त होता है । जैसे सूर्य को देखकर कमल प्रफुल्लित होते हैं, वैसे ही ज्ञान से शुभगुण विकसित होते हैं । आत्मरूपी सूर्य सब दुःखों से रहित है । जो पुरुष निद्रा में होता है, वह सूक्ष्म वचनों से नहीं जागता, पर बड़े शब्द करने और जल डालने से जागता है, वैसे ही मैंने मेघ की तरह गरजकर तुम पर वचनरूपी जल की वर्षा की है । ज्ञानरूपी शीत-लता सहित ये वचन हैं उनसे अब तुम ज्ञानरूपी जाग्रत् बोध को प्राप्त हुए । ऐसे ज्ञानरूपी सूर्य से जगत् को भ्रमरूप देखोगे । हे राम ! तुमको न जन्म है, न मृत्यु है, न कोई दुःख है, न भ्रम है । तुम सब संकल्पों से रहित आत्मपुरुष अपने आपमें स्थित हो । तुम्हारी वृत्ति सम, शान्त और सुषुप्ति की भाँति है । तुम अति विस्तृत, सम, शुद्ध और अपने स्वरूप में स्थित हो ।
<div align="center">इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे परमार्थ योगोपदेशो नाम चतुर्विंशतितमसर्गः ॥ २४ ॥
</div>इतना कहकर वाल्मीकिजी बोले कि इस प्रकार जब वशिष्ठजी ने कहा, तब रामजी, सम, शान्त और चेतनतत्त्व में विश्राम पाकर परमानन्द को प्राप्त हुए । समस्त सभा जो बैठी थी, वह भी वशिष्ठजी के वचन सुनकर सम और आत्मसमाधि में स्थित हुई और बोलने का व्यवहार शान्त हो गया । पिंजड़े में जो पक्षी बोलते थे, वे भी शान्त हो गये । वन के जो वानर थे, वे भी वचन सुनकर स्थित हो रहे । सब ओर शान्ति छा गई । जैसे अर्द्धरात्रि के समय भूमि शान्त हो जाती है, वैसे ही सभा के लोग चुप हो रहे और वचनों पर विचारने लगे कि क्या उपदेश मुनीश्वर ने किया है । एक घड़ी तक शान्ति रही ।
उसके अनन्तर फिर वशिष्ठजी बोले, हे राम ! अब तुम सम्यक् प्रबुद्ध हुए हो और अपने आपमें स्थित हो । जो कुछ तुमने जाना है, उसके अभ्यास का त्याग न करना, इसी में दृढ़ रहना । हे राम ! संसार-रूपी चक्र का नाभिस्थान चित्त है । उसी चित्तनाभि के स्थिर होने
☸ निर्वाण प्रकरण ☸ <span style="float:right;">६५</span>
पर संसारचक्र भी स्थिर हो जाता है। इस संसाररूपी चक्र का बड़ा तीव्र वेग है। रोकने से भी नहीं रुकता। इससे दृढ़ प्रयत्न करके इसको रोकिये। सन्तों के संग और सतशास्त्रों के वचनों से शुद्ध हुई बुद्धि ही इसे रोक सकती है। हे राम! अज्ञान से जो दैव कल्पा है, उसका त्यागकर अपने पुरुषार्थ का आश्रय लो। इसी से परम शान्तपद प्राप्त होता है। ब्रह्मा से लेकर चींटी तक यह अज्ञानरूपी संसारचक्र असतरूप है और भ्रम से सत् की नाईं भासित होता है। इसका त्याग करो। हे राम! असतरूप पदार्थों में जो राग या द्वेष रखते हैं, वे मूर्ख हैं। उनसे तो चित्र-लिखित पुरुष भी श्रेष्ठ है। जब इष्टविषय प्राप्त होता है, तब ये हर्ष से प्रफुल्लित होते और अनिष्ट की प्राप्ति से द्वेष करते हैं; पर चित्र के पुरुष को किसी में रागद्वेष नहीं होता। इस कारण मैं कहता हूँ कि चित्र का पुरुष भी इनसे श्रेष्ठ है। ये आधि-व्याधि से जलते हैं, पर वह सदा ज्यों-का-त्यों है। चित्र का पुरुष तब नष्ट होता है, जब उसके आधार का नाश करिये; अधिष्ठान के नाश बिना उसका नाश नहीं होता। पर मनुष्य का आधार अविनाशी है, उसका नाश नहीं होता। वह मूर्खता से अपने को नष्ट होता मानता है और रागद्वेष से संयुक्त है, इस कारण चित्र के पुरुष से भी तुच्छ है। मनोराज्य संकल्प रूप देह भी इस देह से श्रेष्ठ है; क्योंकि जो कुछ दुःख इसको होते हैं वे बहुत काल तक रहते हैं, पर दुःख और संकल्प के आने से मनोराज्य का अभाव हो जाता है, इससे वह थोड़ा है। संकल्पदेह से भी स्थूलदेह तुच्छ है। हे राम! जो थोड़े समय से देह हुई है; उसमें दुःख भी थोड़ा है और जो दीर्घ संकल्परूपी देह है, वह दीर्घ दुःख को ग्रहण करती है, इससे महानीच है।
हे राम! यह देह भी संकल्पमात्र है। न सत् है, न असत् है; इसके भोग के लिये यत्न मूर्ख करते हैं और क्लेश पाते हैं। देह का अभिमान करके इसके सुख से वे सुखी होते हैं और दुःख से दुःखी। इसके नष्ट होने से आपको नष्ट हुआ मानते हैं। जैसे मनोराज्य का नाश होने से पुरुष का और दूसरे चन्द्रमा का नाश होने से चन्द्रमा का नाश नहीं होता, वैसे ही इस देह का नाश होने पर देही पुरुष का नाश नहीं
६६ ❊ योगवाशिष्ठ ❊
होता। जैसे संकल्प-पुरुष का नाश होने से पुरुष का नाश नहीं होता और जैसे स्वप्नभ्रम के नाश से पुरुष का नाश नहीं होता, वैसे ही देह के नाश से आत्मा का नाश नहीं होता। जैसे घनी धूप के कारण रेणुका में जल भासित होता है और भली प्रकार जाकर देखिये, तब जल का अभाव हो जाता है, परन्तु देखनेवाले का अभाव नहीं होता, वैसे ही संकल्प से रचा नश्वर देह के नाश से तुम्हारा नाश तो नहीं होता। हे राम! दीर्घकाल का रचा जो स्वप्नमय देह है, उसके दुःख और नाश से आत्मा को दुःख या उसका नाश नहीं होता। चैतन्य आत्म-सत्ता नष्ट नहीं होती और स्वप्न से चलायमान भी नहीं होती; न विकार को प्राप्त होती है। वह तो सर्वदा शुद्ध और अच्युतरूप अपने आपमें स्थित है और देह के नाश से उसका नाश नहीं होता। अज्ञान के दृढ़ अभ्यास से देह के धर्म अपने में भासित होने लगे हैं। जब आत्मा का दृढ़ अभ्यास हो तो देहाभिमान और देह के धर्मों का अभाव हो जायगा। जैसे कोई चक्र पर चढ़कर घूमता है तो उतरने पर कुछ काल तक घूमता सा लगता है। पर जब चिरकाल व्यतीत होता है, तब स्थिर हो जाता है, इसी प्रकार देहरूपी चक्र पर चढ़ा हुआ जीव अज्ञान से भ्रमा हुआ अपने को भ्रमता देखता है और जब अज्ञान का वेग निवृत्त होता है, तब भी कुछ काल तक देहभ्रम भासित होता है, जिससे जानता है कि मेरा नाश होता है, मुझको दुःख होता है इत्यादिक। यह कल्पना अज्ञान से होती है। पर जब उस भ्रमदृष्टि को धैर्य से निवृत्त करते हैं, तब उसका अभाव हो जाता है।
हे राम! जैसे भ्रम से रस्सी में सर्प भासता है, वैसे ही आत्मा में देह भासती है। वह असत् और जड़ है। न कर्म करती है और न मुक्त होने की इच्छा करती है। देव परमात्मा भी कुछ नहीं करता। वह सदा शुद्ध द्रष्टा और प्रकाशक है। जैसे निर्वाण दीप अपने आपमें स्थिर होता है, वैसे ही तुम भी शुद्ध स्वरूप अपने आपमें स्थित हो। जैसे सूर्य आकाश में स्थित होता है, पर सब जगत् को प्रकाशित करता है और उसके आश्रय से लोग चेष्टा करते हैं, परन्तु सूर्य कुछ नहीं
☸ निर्वाण प्रकरण ☸ ६७
करता, वह केवल सबका साक्षी है, वैसे ही आत्मा के आश्रय से देहा- दिक की चेष्टा होती है। परन्तु आत्मा साक्षीरूप और पापपुण्य से रहित है। हे राम ! इस देहरूपी शून्य गृह में अहंकाररूपी पिशाच कल्पित है। जैसे बालक परछाईं में वैताल की कल्पना करके भय पाता है, वैसे ही अहंकाररूपी पिशाच की कल्पना कर जीव भय पाता है। वह अहंकाररूपी पिशाच महानीच है। सब सन्तजन उसकी निन्दा करते हैं। जब अहंकाररूपी वैताल निकले, तब आनन्द हो। देहरूपी शून्य गृह में इसका निवास है। जो पुरुष इसका दास हो रहा है, उसको यह नरक में ले जाता है। इससे तुम इसके दास न होना। जब इसके नाश का उपाय करोगे, तब आनन्द पाओगे। हे राम ! यह चित्तरूपी उन्मत्त वैताल जिसको स्पर्श करता है, उसको अशुद्ध करता है, अर्थात् उसका धैर्य और निश्चय अस्तव्यस्त करके उसे दुःख देता है और निज स्वरूप से गिरा देता है। जो बड़े बड़े साधु-महन्त हैं, वे भी इसके भय से समाधि में स्थित होते हैं कि किसी प्रकार अहंकार का अभाव हो ।
हे राम ! अहंकाररूपी पिशाच जिसको स्पर्श करता है, उसको आप-सा कर लेता है। यह जैसे आप तुच्छ है, वैसे ही और को भी तुच्छ बनाता है। जहाँ सत्संग, सतशास्त्र का विचार और आत्मज्ञान का निवास नहीं होता, उस शून्य और उजाड़ देहमन्दिर में यह रहता है, और जो कोई ऐसे स्थान में प्रवेश करता है उसमें प्रवेश कर जाता है। हे राम ! जिसको अहंकाररूपी पिशाच लगा है, उसका धन से कल्याण नहीं होता, और न मित्र-बान्धव से कल्याण होता है। अहं- कार-पिशाच से मिला हुआ जो कुछ कर्म वह करता है, वह अपने नाश के निमित्त करता है और विष की बेलि को उपजाता और बढ़ाता है। हे राम ! जो पुरुषविवेक और धैर्य से रहित है उसको अहं- काररूपी पिशाच शीघ्र ही खा जाता है। वह सर्वरूप है और जिसको स्पर्श करता है, उसको मुर्दा करके छोड़ता है। जिसको अहंकाररूपी पिशाच लगा है, वह नरकरूपी अग्नि में काष्ठ की नाईं जलेगा। अहं- काररूपी सर्प देहरूपी वृक्ष के छिद्र में विष से भरा बैठा है। उसके निकट
६८ ❊ योगवाशिष्ठ ❊
जो जायगा, उसको वह मार डालेगा। जो अहं-मम भाव को प्राप्त होगा, वह मृतक-समान होगा और जन्म-मरण पावेगा। अहंकाररूपी पिशाच जिसको लगता है, उसे मलिन करता है और स्वरूप से गिरा-कर संसाररूपी गढ़े में डालता है। बड़ी आपदाएँ उस पर ढाता है। जितनी आपदाएँ हैं, उन्हें अहंकार ढाता है। बहुत वर्षों तक भी उन आपदाओं का वर्णन न हो सकेगा।
हे राम ! यह जो मलिन कल्पनाएँ उठती हैं कि 'मैं हूँ', 'मैं मरता हूँ', 'मैं दग्ध होता हूँ', 'मैं दुःखी हूँ', 'मैं मनुष्य हूँ', उनका मूल अहंकार-रूपी पिशाच की शक्ति है। आत्मस्वरूप नित्य, शुद्ध, चिदाकाश, सर्व-गत, सच्चिदानन्द, जीव सबका अपना है, पर अहंकार के वश होकर यह जीव अपने को परिच्छिन्न और निर्लिप्त होकर भी दुःखी मानता है। जैसे आकाश सर्वगत और निर्लेप है, वैसे ही आत्मा सबमें निर्लेप है और सबका सम्बन्धी, पर अहंकार के सम्बन्ध से रहित है। हे राम ! ग्रहण त्याग, चलना, बैठना इत्यादिक जो कुछ कर्म हैं, उन्हें देहरूपी यन्त्र और वायुरूपी रस्सी से अहंकाररूपी यन्त्री कराता है। आत्मा सदा निर्लेप, सबका अधिष्ठान और कारणकार्य भाव से रहित है। जैसे वृक्ष की ऊँचाई का कारण यह आकाश निर्लेप है, वैसे ही आत्मा सर्वचेष्टा का कारण, अधिष्ठान और निर्लेप है। जैसे आकाश और पृथ्वी का सम्बन्ध नहीं, वैसे ही आत्मा और अहंकार का सम्बन्ध नहीं है। चित्त को जो 'आप' जानते हैं वे महामूर्ख हैं। आत्मा प्रकाशरूप, नित्य और सर्वगत विभु है; चित्त मूर्ख, जड़ और आवरण करता है। हे राम ! आत्म सर्वज्ञ और चैतन्यरूप है; पर चित्त मूढ़ और पत्थर सा जड़ है। इसको दूर करो। इसका और तुम्हारा कुछ सम्बन्ध नहीं। तुम इस मोह को त्यागो। देहरूपी शून्य गृह में चित्तरूपी वैताल का निवास है। जिसको वह अपने वश करता है, जिसको बान्धव नहीं छुड़ा सकते, और शास्त्र भी नहीं छुड़ा सकते। जिसका देहाभिमान क्षीण हो गया है, उसको गुरु और शास्त्र भी छुड़ा सकते हैं, जैसे थोड़ी कीचड़ से हरिण को निकाल लेते हैं वैसे ही गुरु और शास्त्र उसे निकाल लेते हैं।
☸ निर्वाण प्रकरण ☸ ६६
हे राम ! जितने देहरूपी शून्य मंदिर हैं, उन सबमें अहंकाररूपी पिशाच रहता है। कोई देहरूपी गृह अहंकार-पिशाच से खाली नहीं है। इस पर भय सवार है। जैसे पिशाच अपवित्र स्थान में रहता है, पवित्र स्थान में नहीं, वैसे ही जहाँ सन्तोष, विचार, अभ्यास, सत्सङ्ग से रहित देह है, उसी स्थान में अहंकार निवास करता है। जहाँ सन्तोष, विचार, अभ्यास और सत्संग होता है, वहाँ से वह मिट जाता है। जितने शरीररूपी शमशान हैं, वे चित्तरूपी वैताल से पूर्ण हैं। अपरिमित मोहरूपी वैताल के वश जीव जगतरूपी महावन में मोह को प्राप्त होते हैं, जैसे बालक मोह के वश होता और डरता है। हे राम ! तुम आप अपना उद्धार करो और सत्य विचार करके धैर्य धरो। इस जगतरूपी पुरातन वन में जीवरूपी मृग विचरते हैं और भोगरूपी तृण चरते हैं। पर वे भोगरूपी तृण देखने में तो सुन्दर लगते हैं, परन्तु उनके नीचे गढ्ढा है। जैसे हरियाली और तृण से ढका हुआ गढ्ढा देख मृग के बालक घास चरने लगते हैं और गढ्हे में गिर पड़ते हैं, वैसे ही जीवरूपी मृग भोगों को रमणीय जानकर भोगने लगते हैं और उनकी तृष्णा से नरक आदिक में गिरते और दुःख की अग्नि में जलते हैं। हे राम ! तुम ऐसे न होना। जो कोई भोगों की तृष्णा करेगा, वह नरकरूपी गड्ढे में गिरेगा। इससे तुम मृग-बुद्धि को त्यागकर सिंहवृत्ति को धारण करो। मोहरूपी हाथी को सिंह होकर अपने नखों से विदीर्ण करो और भोग की तृष्णा से रहित बनो। भोग की तृष्णावाले जीव जम्बूद्वीपरूपी जंगल में मृग की तरह भटकते हैं—उनकी तरह तुम न विचरना। हे राम ! स्त्री जो रमणीय लगती है, उसका स्पर्श अल्पकाल ही शीतल और सुखदायक लगता है। परन्तु वह कीचड़ की तरह है। कीचड़ का लेप भी शीतल लगता है, परन्तु तुच्छ है। जैसे दलदल में फँसा हुआ हाथी उसमे निकल नहीं सकता, वैसे ही यह भोगरूपी दलदल में फँसा हुआ जीव नहीं निकल सकता। इसमें तुम सन्त की वृत्ति को ग्रहण करो। ग्रहण करना किसको कहते हैं और त्याग किसका नाम है, ऐसे विचार से असद्वृत्ति को त्याग करो और आत्मतत्त्व का आश्रय लो।
७० ❊ योगवाशिष्ठ ❊
हे राम ! यह अपवित्र देह अस्थि, मांस, रुधिर से पूर्ण और तुच्छ है। इसका आचार दुष्ट है। देह के निमित्त भोग की इच्छा करने से परमार्थ नहीं सिद्ध होता। देह रची और ने है, यह चेष्टा और से करती है और इसमें प्रवेश और ने किया है। दुःख को ग्रहण और करता है. जो दुःख का भागी होता है। संकल्प ने देह रची है, प्राण से यह चेष्टा करती है, अहंकार-पिशाच ने इसमें प्रवेश किया है और गर्जता है। मन की वृत्ति सुख-दुःख को ग्रहण करती है और जीव दुःखी होता है। यह आश्चर्य है। हे राम ! परमार्थसत्ता एक है और सर्वत्र समान है। इससे भिन्न सत्ता नहीं। जैसे पत्थर घनजड़ होता है और उसमें और कुछ नहीं उपजता, वैसे ही सत्तामात्र से भिन्न दूसरी सत्ता किसी पदार्थ की नहीं है। जैसे पत्थर घनरूप है, वैसे ही परमात्मा घनरूप है। जड़ और चेतन भिन्न नहीं हैं। यह मिथ्या संकल्प की रचना है। जैसे बालक को परछाहीं में बेताल भासता है, वैसे ही सब कल्पना मन की है। जैसे एक ऊख के रस से गुड़, शक्कर इत्यादि बनती है, वैसे ही एक परमोत्तम सत्तासमान सब है। उसमें जड़-चेतन की कल्पना मिथ्या है। जब तक सम्यकदृष्टि नहीं प्राप्त हुई, तब तक जड़-चेतन की दृष्टि होती है और जब यथार्थदृष्टि प्राप्त होती है; तब सब भेदकल्पना मिट जाती है। जैसे सीपी में जो चाँदी भासती है सो न सत्य होती है और न असत्य होती है, वैसे ही आत्मा में जड़-चेतन; सत्य-असत्य की विलक्षण कल्पना है। हे राम ! जो सत्य है वह असत्य नहीं होता और जो असत्य है वह सत्य नहीं होता। आत्मा सदा सत्यरूप और अपने आपमें स्थित है। उसमें द्वैत और एक का अभाव है। जैसे पत्थर में अन्य सत्ता का अभाव है, वैसे ही आत्मा में द्वैतसत्ता का अभाव है। नानारूप भासित होने पर भी द्वैत कुछ नहीं है। वह सदा अनुभवरूप है। उसमें विभागकल्पना कुछ नहीं—सदा अद्वैतरूप है। भेदकल्पना चित्त से भासती है। जब चित्त का अभाव होता है, तब जड़-चेतन की कल्पना मिट जाती है। जैसे बन्ध्या के पुत्र और आकाश में वृक्ष का अभाव है, वैसे ही आत्मा में कल्पना का अभाव है।
- निर्वाण प्रकरण *
हे राम ! यह चेतन है, यह जड़ है, यह उपजता है, यह मिट जाता है इत्यादि सब कल्पना मिथ्या है। जैसे रस्सी में सर्प मिथ्या है, वैसे ही केवल निर्विकल्प चिन्मात्र आत्मा में कल्पना मिथ्या है। गुरु और शास्त्र भी जो आत्मा को चैतन्य और अनात्मा को जड़ कहते हैं, वह भी बोध के निमित्त कहते हैं और दृष्टान्त युक्ति से दृश्य की आत्मस्वरूप में स्थिति कराते हैं। जब स्वरूप में दृढ़ स्थिति होगी, तब जड़-चेतन की भेद-कल्पना जाती रहेगी; केवल अचिन्त्य चिन्मात्र सत्ता भासित होगी, जो तत्त्व है। इस प्रकार गुरु जड़-चेतन के विभाग का उपदेश करते हैं। तो भी मूर्ख नहीं ग्रहण कर सकते। जब प्रथम ही अचिन्त्य-चिन्मात्र-अवाच्यपद का उपदेश करे, तब कैसे ग्रहण करे। हे राम ! और आश्चर्य देखो। चित्त और है, इन्द्रियाँ और हैं, देह और है, देह का कर्त्ता कोई दृष्टिगोचर नहीं होता। देह अहंकार से घिरी है। यह जीव ऐसा मूर्ख है कि देह को अपना रूप जानता है और दुःख पाता है। पर जो विचारवान् पुरुष आत्मपद में स्थित हुए हैं उन महानुभावों को कोई क्रिया दुःखबन्धन में नहीं डाल सकती। जैसे मन्त्र जानने-वाले को सर्प दुःख नहीं दे सकता, वैसे ही ज्ञानवान् को कर्म बन्धन नहीं करते। हे राम ! न तुम शीश हो, न नेत्र हो, न रक्त हो, न मांस हो, न अस्थि आदिक हो, न मन हो और न भूतजात हो। तुम चित्त से रहित चैतन्य केवल चिन्मात्र साक्षीरूप हो। इसीलिए शरीर की ममता त्यागकर नित्य शुद्ध और सर्वगत आत्मस्वरूप में स्थित हो।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे देहसत्ताविचारो नाम पञ्चविंशतितमस्सर्गः ॥ २५ ॥
वशिष्ठजी बोले, हे राम ! इसी दृष्टि को ऐसे ग्रहण करो और भेद कष्टदृष्टि का त्याग और नाश करो। जब कष्टदृष्टि नष्ट होगी, तब ऐसा आत्मानन्द प्रकट होगा, जिस आनन्द के पाने से अष्टसिद्धि का ऐश्वर्य भी अनिष्ट जानकर त्याग दोगे। अब और ऐसी दृष्टि का वर्णन सुनो जो महामोह का नाश करती है और दुर्लभ कठिन आत्मपद को सुखपूर्वक प्राप्त कराती है, जिसका नाश कभी नहीं होता। इस दृष्टि का
७२ ❇ योगवाशिष्ट ❇
वर्णन दुःख से रहित आनन्दरूप शिवजी से मैंने सुना है। इसे पूर्वकाल में कैलास की कन्दरा में संसारदुःख की शान्ति के लिए अर्धचन्द्रधारी सदाशिव ने मुझसे कहा था। हे राम ! पूर्ण चन्द्रमा की तरह शीतल और प्रकाशमान हिमालय पर्वत का एक शिखर कैलास है, जहाँ गौरी के रमणीय स्थान और मन्दिर हैं, गङ्गा का प्रवाह झरनों से चलता है, पक्षी शब्द करते हैं और मन्द-मन्द सुखदायक पवन चलता है। कुबेर मोर वहाँ विचरते हैं, कल्पवृक्ष लगे हुए हैं और महाउज्ज्वल, शीतल, सुन्दर कन्दरा में मन्दार और तमाल के वृक्ष लगे हुए हैं, जिनमें ऐसे फूल लगे हैं, जैसे श्वेत मेघ हों। वहाँ गन्धर्व और किन्नर आते और गाते हैं और देवताओं के रमणीय सुन्दर स्थान हैं। उस पर्वत पर त्रिनेत्र सदाशिव हाथ में त्रिशूल लिये, गणों से घिरे हुए, अर्धांग में भगवती को लिए बिराजते हैं। सब लोकों के कारण ईश्वर, जिन्होंने कामदेव का गर्व नष्ट किया, षट्मुख सहित स्वामीकार्तिक जिनके पास बैठे हैं और महाभयानक शून्य शमशानों में जिनका निवास है, उन देव की मैंने पूजा की। फिर एक कुटी बनाकर, एक कमण्डलु और फूल और माला पूजन के निमित्त रखे, यथाशास्त्र पुण्य क्रिया से उस कंदरा में तप करने लगा। जलपान करता, फल भोजन करता, विद्यार्थी जो साथ थे उनको पढ़ाता और शास्त्र का अर्थ विचारता था।
ब्रह्मविद्या की पुस्तकों का समूह आगे था। आसपास मृग और उनके बालक विचरते थे। इस प्रकार वेद पढ़ता, ब्रह्मविद्या को विचारता और शास्त्र के अनुसार तप करता मैं कैलास वनकुञ्ज में रहता था। निदान श्रावण बदी अष्टमी की अर्धरात्रि को जब मैं समाधि से उठा तो क्या देखता हूँ कि दसो दिशा काष्ठवत् मौन और शान्तरूप हैं। महातम घिरा है और मन्द-मन्द पवन चलता है। ओस के कन गिरते हैं जैसे पवन हँस रहा हो। उसी समय महाशीतल अमृतरूपी किरणों से चन्द्रमा प्रकाशित होकर ओषधियों को रस से पुष्ट करने लगा। चन्द्रमुखी कमल खिल आये। चकोर अमृत की किरणों को पानकर मानों चन्द्रमारूप हो गये। प्रातःकाल के तारों की तरह मणियाँ ऊपर
- निर्वाण प्रकरण * ७३
आकर गिरने लगीं और सप्तर्षि सिर पर स्थित हुए–मानो मेरे तप को देखने आये हों। सप्तर्षियों में पिछले जो तीन तारे हैं, उनके मध्य में मेरा मन्दिर है; वहाँ मैं सदा विराजता हूँ। चन्द्रमा से सब स्थान शीतल हो गये और पवन से फूल गिरने लगे।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे वशिष्ठआश्रमवर्णनं नाम षड्विंशतितमस्सर्गः ॥ २६ ॥
वशिष्ठजी बोले, हे राम! तब मुझको तेज का प्रकाश देख पड़ने लगा। जैसे मन्दराचल पर्वत के मंथन से क्षीरसमुद्र उछल पड़ा है; या हिमालय पर्वत मूर्तिमान स्थित है; या माखन का पहाड़ खड़ा है; या सब शंखों की उज्ज्वलता स्पष्ट स्थित हुई है; या मोतियों का समूह इकट्ठा होकर उड़ने लगा है। वह महातीव्र प्रकाश ऐसा था, मानो गङ्गा का प्रवाह उछलने लगा हो। उस प्रकाश की शीतलता से सब दिशाएँ और उनके किनारे भर गये और मैं देखकर आश्चर्य करने लगा कि क्या असमय ही प्रलय होने लगा। तब मैं बोधदृष्टि से मन में विचारने लगा कि यह क्या है। तब देखा कि देवताओं के गुरु ईश्वर सदाशिव चन्द्रकला को धारण किये और गौरी भगवती का हाथ पकड़े गणों के समूह से घिरे चले आते हैं। उनके कानों में सर्प पड़े थे, कण्ठ में मुण्डों की माला थी, शीश पर जटा थी और उन पर कदम्ब वृक्ष और तमाल वृक्ष के फूल पड़े हुए थे। उनको प्रथम मैंने मन से देखा। मन ही से मन्दार वृक्ष के पुष्प लेकर अर्घ्य पाद्य किया। मन ही से प्रणाम किया और मन ही से प्रदक्षिणा कर अपने आसन से उठ खड़ा हुआ। फिर अपने शिष्य को जगाकर अर्घ्य पाद्य लेकर चला और त्रिनेत्र शिवजी को पुष्प अञ्जली दे और प्रदक्षिणा कर प्रणाम किया।
तब चन्द्रधारी ने मुझको कृपादृष्टि से देखा और सुन्दर मधुर वाणी में कहा—हे ब्राह्मण! अर्घ्य पाद्य ले आओ, हम तुम्हारे आश्रम में अतिथि आये हैं। हे निष्पाप! तुमको कल्याण तो प्राप्त है? तुम मुझको महाशान्तरूप देख पड़ते हो और महासुन्दर उज्ज्वल तप की शोभा तथा तेज से शोभित हो। चलो, हम तुम्हारे आश्रम को चलें। हे राम! फूलों से आच्छादित
७४ ❊ योगवाशिष्ठ ❊
स्थान में सदाशिव बैठे थे; सो ऐसे कहकर उठ खड़े हुए और अपने गणों सहित मेरी कुटी में आये। वहाँ मैंने पुष्प और अर्घ्य से उनके चरणों की पूजा करके फिर हाथों की पूजा की। इसी प्रकार चरणों से लेकर शीश पर्यन्त सब अङ्गों की पूजा की। फिर गौरी भगवती का पूजन करके उनकी सखियों और शिव के गणों को पूजा। हे रामजी! इस प्रकार भक्तिपूर्वक जब मैं पार्वती परमेश्वर का पूजन कर चुका, तब शशिकलाधारी शिवजी ने शीतल वाणी से मुझसे कहा कि हे ब्राह्मण! नाना प्रकार की बिन्तनेवाली जो चित्तवृत्ति है, वह तुम्हारे स्वरूप में विश्रान्ति को प्राप्त हुई है और तुम्हारी संवित् आत्मपद में स्थित हुई है। तुम्हारे शिष्यों का कल्याण तो है और तुम्हारे पास जो हरिण विचरते हैं, वे भी सुख में हैं? मन्दार वृक्ष तुमको पूजा के निमित्त फूल-फल भली प्रकार देते हैं और गङ्गाजी तुमको भली प्रकार स्नान कराती हैं? देह के इष्ट-अनिष्ट की प्राप्ति में तुमको खेद तो नहीं होता? इस पर्वत में कुबेर के अनुचर यक्ष और राक्षस जो रहते हैं, वे तुमको दुःख तो नहीं देते और मेरे गण जो निशाचर हैं, वे तो तुमको कष्ट नहीं पहुँचाते?
हे रघुनन्दन ! इस प्रकार जब देवेश ने मुझसे वाञ्छित प्रश्न किये, तब मैंने उनसे कहा—हे कल्याणरूप महेश्वर ! जो तुमको सदा स्मरण करते हैं, उनको इस लोक में ऐसा कोई पदार्थ नहीं जो पाना कठिन हो। उनको भय भी किसी का नहीं। जिनका चित्त तुम्हारे स्मरण के आनन्द में सब ओर से पूर्ण हुआ है, वे जगत में दीन नहीं होते। वही देश उन्हीं जनों के चरण और वही दिशा तथा पर्वत वन्दना करने के योग्य हैं, जहाँ एकान्त बुद्धि से बैठकर तुम्हारा स्मरण होता है। हे प्रभो ! तुम्हारा स्मरण पूर्वपुण्यरूपी वृक्ष का फल है, जो वर्तमान कर्मों से सिंचता है। तुम मन के परम मित्र हो। तुम्हारा स्मरण सब आपदाओं को हरनेवाला है। वह सर्व सम्पदारूपी लता को बढ़ानेवाला वसन्तऋतु है। हे प्रभो ! तुम्हारा स्मरण बड़ी महिमा और बड़े से बड़े कर्मों के कारण का भी कारण है। हे प्रभो ! तुम्हारा स्मरण विवेकरूपी
❊ निर्वाण प्रकरण ❊ ७५
समुद्र में परमार्थरूपी रत्न है; अज्ञानरूपी तम का नाशकर्ता सूर्य का समूह है; ज्ञान-अमृत का कलश, धैर्यरूपी चाँदनी का चन्द्रमा और मोक्ष का द्वार है । हे प्रभो ! तुम्हारा स्मरण अपूर्व उत्तम दीपक है । वह चित्त का मन्दिर जो संसार है, उस सबको प्रकाशित करता है । हे प्रभो ! तुम्हारा स्मरण उदार चिन्तामणि की नाईं सब आपदाओं को निवृत्त करनेवाला और बड़े उत्तम पद को देनेवाला है । हे प्रभो ! तुम्हारा स्मरण एक क्षण भी चित्त में स्थित हो तो सब दुःख और भय नष्ट करता है और वरदायक है । उसके बल से मैं भी तुम्हारी भाँति सुख से बसता हूँ ।
वाल्मीकिजी बोले कि इस प्रकार जब मुनीश्वर ने कहा, तब दिन का अन्त हुआ । सब लोग परस्पर नमस्कार करके अपने-अपने स्थान को गये और सूर्य की किरणों के उदय के साथ फिर अपने अपने आसन पर आ बैठे ।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे रुद्रवशिष्ठसमागमो नाम सप्तविंशतितमस्सर्गः ॥ २७ ॥
वशिष्ठजी बोले, हे राम ! जब मैंने इस प्रकार कहा, तब गौरी भगवती जगत्-माता, जैसे माता पुत्र से कहे, मुझसे बोलीं—हे वशिष्ठ ! पतिव्रताओं में मुख्य अरुन्धती कहाँ है ? उसको ले आओ । वह मेरी प्यारी सखी है । उससे मैं कथा-वार्ता करूँगी । हे रामजी ! इस प्रकार जब मुझसे पार्वती ने कहा, तब मैं शीघ्र ही जाकर अरुन्धती को ले आया । वे दोनों परस्पर कथा-वार्ता करने लगीं । मैंने विचारा कि मुझको ईश्वर मिले हैं और पूछने का अवसर भी पाया है, इससे सर्व ज्ञान के समुद्र से पूछकर संदेह दूर करूँ । हे राम ! ऐसे विचार करके मैंने गौरीश से जो पूछा और जो कुछ चन्द्रकलाधारी ने मुझसे कहा, वह तुमसे कहता हूँ । मैंने पूछा, हे भगवन् ! तुम भूत, भविष्य और वर्तमान, तीनों कालों के ईश्वर और सब कारणों के कारण हो । तुम्हारे प्रसाद से मैं कुछ पूछने को समर्थ हुआ हूँ । हे महादेव ! जो कुछ मैं पूछता हूँ, उसे प्रसन्नबुद्धि हो, उद्वेग को त्याग कर, शीघ्र ही कहौ ।
७६ $$\text{❊ योगवाशिष्ठ ❊}$$
हे सब पापों के नाशक और सब कल्याण की वृद्धि करनेवाले ! देव-अर्चन का विधान मुझसे कहो ।
ईश्वर बोले, हे ब्राह्मण ! जो उत्तम देव-अर्चन है और जिसके किये से संसारसमुद्र से जीव तर जाता है, सो सुनो । हे ब्राह्मणों में श्रेष्ठ ! पुण्डरीकाक्ष विष्णु देव नहीं और त्रिलोचन शिव भी देव नहीं । कमल से उपजा ब्रह्मा भी देव नहीं और सहस्रनेत्र इन्द्र भी देव नहीं । न देव पवन है, न सूर्य है, न अग्नि है, न चन्द्रमा है, न ब्राह्मण है, न क्षत्रिय है, न तुम हो, न में हूँ, न देह है, न चित्त है और न कलनारूप है । अकृत्रिम, अनादि, अनन्त और संवित्रूप ही देव कहाता है । आकारा-दिक परिच्छिन्नरूप हैं, वे वास्तव में कुछ नहीं । एक अकृत्रिम, अनादि, अनन्त, चैतन्यरूप देव हैं । वही देव शब्द का वाचक है और उसी का पूजन पूजन है । उस देव को, जिससे यह सब हुआ है और जो सत्ताशान्त-आत्मरूप है, सर्वत्र व्याप्त देखना ही उसका पूजन है पर जो उस संवित्तत्त्व को नहीं जानते, उनके लिए साकार की अर्चना का विधान है । जैसे जो पुरुष योजनपर्यन्त नहीं चल सकता, उसको एक कोस दो कोस का चलना भी भला है, वैसे ही जो पुरुष अकृत्रिम देव की पूजा नहीं कर सकता, उसको साकार का पूजना भी भला है । हे ब्राह्मण ! जिसकी भावना कोई करता है, उसके फल उसी के अनुसार भोगता है । जो परिच्छिन्न (खण्डित) की उपासना करता है, उसको फल भी परिच्छिन्न प्राप्त होता है और जो अकृत्रिम, आनन्द-रूप, अनन्त देव की उपासना करता है, उसको वही परमात्मरूपी फल प्राप्त होता है । हे साधो ! अकृत्रिम फल को त्याग कर जो कृत्रिम को चाहते हैं, वे ऐसे हैं जैसे कोई मन्दार वृक्ष के वन को त्याग कर कंटक के वन को प्राप्त हो । वह देव कैसा है, उसकी पूजा क्या है और क्योंकर होती है, सो सुनो ।
बोध, साम्य और शम, ये तीन फूल हैं । बोध सम्यक्ज्ञान का नाम है; अर्थात् आत्मतत्त्व को ज्यों का त्यों जानना । साम्य मनमें पूर्ण देखने को कहते हैं और शम का अर्थ यह है कि चित्त को निवृत्त