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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 867, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 867

५६ ☸ योगवाशिष्ठ ☸

गई है और राग-द्वेष दूर हो गये हैं, मन शान्त हुआ है। इस कारण अरोग जीता हूँ। मैं काष्ठ, सुन्दर स्त्री, पहाड़, तृण, अग्नि और सुवर्ण को सम देखता हूँ।

हे मुनीश्वर ! मैं जरामरण के दुःख और राजलाभ के सुख और शोक से रहित समभाव में स्थित हूँ और दुःखरहित जीता हूँ। ये मेरे बांधव हैं, ये अन्य हैं, यह मैं हूँ, यह मेरा है, यह सब कलना मुझको नहीं, इसी से सुखी जीता हूँ। आहार-व्यवहार करता, बैठता, चलता, सूँघता, स्पर्श करता और श्वास लेता हूँ; परन्तु यह जो अभिमान है कि मैं 'देह हूँ,' इस अभिमान से रहित हो सुखी जीता हूँ। इस संसार की ओर से मैं सुषुप्तरूप हूँ और इस संसार की गति को देखकर हँसता हूँ कि वास्तव में यह है ही नहीं। इस कारण शान्ति से जीता हूँ। हे मुनीश्वर ! मैं सब कालों में सब प्रकार, सभी पदार्थों में समबुद्धि हूँ; विषमता मुझको नहीं भासित होती । न किसी से सुखी होता हूँ और न दुखी। जैसे हाथ फैलाइये तो भी शरीर है और सिकोड़िए तो भी शरीर है, इसी प्रकार मैंने सर्वात्मा आपको जाना है । इसी से मुझको कोई दुःख नहीं । मेरी बोली और निश्चय स्निग्ध, कोमल और सबको हृदयगम्य है । सर्वत्र इसी दृष्टि के कारण मैं दुःखरहित जीता हूँ । चरण से मस्तक पर्यन्त देह में मुझको ममता नहीं है । अहंकाररूपी कीच से मैं निकल गया हूँ, इस कारण अरोग जीता हूँ। मैं कार्यकर्त्ता और भोजनकर्त्ता भी देख पड़ता हूँ, परन्तु मेरे मन में दृढ़ निष्कर्मता है।

हे मुनीश्वर ! सामर्थ्य करके कार्य करूँ तो भी मुझको अभिमान नहीं और दरिद्री होऊँ तो भी संपत्ति और सुख की इच्छा नहीं; अर्थात् किमी में आसक्त नहीं होता। इस असतरूप शरीर का नाश होने पर भी अभिमान नष्ट नहीं होता। भूतों का समूह सब असतरूप है, केवल आत्मा सतरूप है, ऐसा जानकर मैं स्थित हूँ। आशारूपी फाँसी से मेरे मुक्तचित्त की वृत्ति समाहित हुई है । मुझे अनात्म में आत्माभिमान की वृत्ति नहीं फुरती ।

हे मुनीश्वर ! मैंने जगत् को असत्य जाना है और आत्मा को

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