योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 866, कुल 1734 में से
संदर्भ में पढ़ें☸ निर्वाण प्रकरण ☸ ५५
शरण को प्राप्त होते हैं, उस आत्मतत्त्व की हम उपासना करते हैं।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे भुशुण्ड्युपाख्याने समाधिवर्णनं नाम एकविंशतितमसर्गः ॥ २१ ॥
भुशुण्डिजी बोले, हे मुनीश्वर ! इस प्रकार मैंने प्राणसमाधि प्राप्त की है और इस क्रम से मैं आत्मपद को पहुँचा हूँ। इसी निर्मल दृष्टि का आश्रय लेकर स्थित हूँ और एक पल भी इससे चलायमान नहीं होता। सुमेरु पर्वत की भाँति स्थित हूँ और चलता हुआ भी स्थिर हूँ। जाग्रत् में सुषुप्ति स्वप्न में स्थित हूँ और सर्वदा आत्मसमाधि में लगा रहता हूँ; विक्षेप कभी नहीं होता। हे मुनीश्वर ! नित्य-अनित्य भाव से जो जगत् स्थित है, उसको त्यागकर मैं अन्तर्मुख अपने आपमें स्थित हूँ। प्राण-अपान की कला जो तुम्हारे सामने कही है, उसका सदा ऐसे ही प्रवाह चला जाता है; उसमें मेरी अचल समाधि है, इसमें मैं सदा सुखी रहता हूँ, कुछ कष्ट नहीं होता। जिसको यह कला नहीं प्राप्त हुई, वही कष्ट पाता है। हे मुनीश्वर ! अज्ञानी जीव महाप्रलय-पर्यन्त संसार-समुद्र में गोते खाते हैं। उभर कर फिर डूबते हैं और इसी प्रकार गोते खाते रहते हैं। जिन पुरुषों ने पुरुषार्थ करके आत्मपद पाया है, वे सुख से विचरते हैं। हे मुनीश्वर ! भूतकाल की मुझको चिन्ता नहीं और भविष्य की इच्छा नहीं; वर्तमान में यथाप्राप्त राग-द्वेष से रहित होकर विचरता हूँ। मैं सुषुप्त की तरह स्थित हूँ, इससे केवल 'स्वरूप' में भाव-अभाव पदार्थों से रहित हूँ और इसी कारण चिरंजीवी हो दुःख से रहित हूँ। प्राण-अपान की कला को शान्त करके स्वरूप में स्थित हूँ। आज यह कुछ पाया है और कल यह पाऊँगा; यह चिन्ता मेरी दूर हो गई है, इसी कारण दुःखरहित होकर जीता हूँ। न किसी की प्रशंसा करता हूँ और न किसी की निन्दा करता हूँ; सब आत्मस्वरूप देखता हूँ, इसी कारण सुखी जीता हूँ। मुझे इष्ट की प्राप्ति में हर्ष और अनिष्ट प्राप्ति में शोक नहीं होता। मैंने परम त्याग किया है, सर्वत्र आत्मभाव देखता हूँ और मेरा जीवभाव दूर हो गया है, इसी कारण दुःखरहित जीता हूँ। हे मुनीश्वर ! मेरे मन की चपलता मिट