योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
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और अपान का उदय नहीं हुआ होता, वह कुम्भक है। अपान जब प्राण में स्थित हुआ और प्राण का जब उदय नहीं हुआ, उस कुम्भक में जो शान्त तत्त्व है, वह आत्मा का स्वरूप, शुद्ध और परम चैतन्य है। जो उसको प्राप्त होता है वह फिर शोकयुक्त नहीं होता। जैसे पुष्प में गन्ध से प्रयोजन होता है वैसे ही प्राण-अपान के भीतर जो अनुभव-तत्त्व स्थित है, उससे प्रयोजन है। वह न प्राण है, न अपान, उस अनुभवस्वरूप आत्मतत्त्व की हम उपासना करते हैं। प्राण अपानकोट में क्षय को प्राप्त होता है और अपान प्राणकोट में क्षय को प्राप्त होता है; उस प्राण-अपान के मध्य में जो चिदात्मा है, उसकी हम उपासना करते हैं।
हे मुनीश्वर ! जो प्राण का प्राण, अपान का अपान, जीव का जीव और देह का आधारभूत है, उस चिदात्मा की हम उपासना करते हैं। जिसमें सर्व है, जिससे यह सर्व है और जो यह सर्व है, ऐसा जो चिदात्मा है उसकी हम उपासना करते हैं। जो सब प्रकाशों का प्रकाश है, सब पावनों का पावन है और सब भाव-अभाव पदार्थों का अपना आप है, उस चिदात्मा की हम उपासना करते हैं। जो पवन परस्पर हृदय में संपुटरूप है, उसमें स्थित जो साक्षीरूप और भीतर बाहर सब जगह है, उस चिदात्मा की हम उपासना करते हैं। जब अपान अस्त हुआ और प्राण नहीं उपजा, उस क्षण में जो कलंक से रहित है, उस चैतन्यतत्त्व की हम उपासना करते हैं। जब प्राण अस्त हुआ और अपान नहीं उपजा, ऐसा जो नासिका के अग्र भाग में शुद्ध आकाश है और उसमें जो सत्यता है, उस चित्तसत्ता की हम उपासना करते हैं। जो प्राण-अपान की उत्पत्ति का स्थान, भीतर बाहर सब ओर व्याप्त और सब योगकला का आधारभूत है, उस चित्ततत्त्व की हम उपासना करते हैं। जो प्राण-अपान के रथ पर आरूढ़ है और शक्ति का शक्तिरूप है; उस चित्ततत्त्व की हम उपासना करते हैं। हे मुनीश्वर ! जो सम्पूर्ण कला-कलंक से रहित है और सब कला जिसके आश्रय में हैं, ऐसा जो अनुभवतत्त्व है, और सब देवता जिसकी