योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 864, कुल 1734 में से
संदर्भ में पढ़ें☸ निर्वाण प्रकरण ☸ ५३
का तम नष्ट होने से लोकों में प्रकाश होता है और हृदय का तम नष्ट होने से आत्मप्रकाश का उदय और अज्ञान-अन्धकार का अभाव होता है, उसी प्रकाश में परमपद को जानकर जीव मुक्त होता है। प्राणअपान की युक्ति जानने से तम नष्ट हो जाता है।
हे मुनीश्वर ! प्राण अपानरूपी जो चन्द्रमा और सूर्य हैं, वे यत्न बिना उदय और अस्त होते हैं। जब प्राणरूपी सूर्य हृदयकोट से उपज कर बाहर जाता है तब उसी क्षण अपानरूपी चन्द्रमा में लीन होता है और अपानरूपी चन्द्रमा उदय हो आता है। और जब अपानरूपी चन्द्रमा हृदयकोट के प्राणवायूरूपी सूर्य में स्थित होता है, तब उसी क्षण में प्राणरूपी सूर्य उदय होता है। प्राण के अस्त होने पर अपान का उदय होता है और अपान के अस्त होने पर प्राण का उदय होता है। जैसे छाया के अस्त होने पर धूप निकलती है और धूप के अस्त होने पर छाया प्रकट होती है, वैसे ही प्राण-अपान की गति है। हे मुनीश्वर ! जब हृदयकोट से प्राण का उदय होता है, तब प्राण का रेचक और अपान का पूरक होने लगता है, और जब प्राण अपान में स्थित होता है, तब अपान का कुम्भक होता है, उस कुम्भक में जब स्थित होती है, तब फिर तीनों ताप नहीं तपाते। जब अपान का रेचक होता है, तब प्राण का पूरक होने लगता है और जब अपान जाकर स्थित होता है, तब प्राण का कुम्भक होता है। उसमें जब मन स्थित होता है, तब भी तीन तापों से तप्त नहीं होता। हे मुनीश्वर ! प्राण-अपान के भीतर जो शान्तरूप आत्मतत्त्व है उसमें जब स्थिति होती है, तब मन तप्त नहीं होता। जब अपान आकर स्थित होता है और प्राण का उदय नहीं हुआ होता उस अवस्था में जो साक्षीभूत सत्ता है, वह आत्मतत्त्व है। उसमें जब स्थिति होती है, तब फिर वह साधना कठिन नहीं होती। जब अपान के स्थान में प्राण जाकर स्थित होता है, और अपान जब तक उदय नहीं हुआ होता, वहाँ जो देश, काल, अवस्था है उसमें जब मन स्थित होता है, तब मन का मनत्व जाता रहता है और फिर नहीं उपजता । हे मुनीश्वर ! प्राण जब अपान में स्थित हुआ होता है