योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 863, कुल 1734 में से
संदर्भ में पढ़ें५२
<div align="center">☸ योगवाशिष्ठ ☸</div>हे मुनीश्वर ! अब प्राण-अपान का संस्मरण कहता हूँ, सुनो। प्राण हृदय से उपजकर द्वादश अंगुल पर्यन्त बाहर जाता है और वहाँ जाकर स्थित होता है; फिर उस स्थान से अपानरूप हो हृदय में आकर स्थित होता है। हे मुनीश्वर ! बाहर आकाश के सम्मुख जो प्राण जाता है, वह अग्नि-सा उष्ण होता है और जो हृदयाकाश के सम्मुख आता है, वह शीतल नदी के प्रवाह-सा आती है। अपान चन्द्रमारूप है और बाहर से भीतर आता है और जो प्राण भीतर से बाहर जाता है, वह अग्नि, उष्ण और सूर्यरूप है। प्राणवायु हृदयाकाश को तपाता है और अन्न को पचाता है और अपान हृदय को चन्द्रमा की तरह शीतल करता है। हे मुनीश्वर ! अपानरूपी चन्द्रमा जब प्राणरूपी सूर्य में जहाँ तत्त्व है, लीन होता है तो उसमें स्थित हुआ मन फिर शोक को नहीं प्राप्त होता। और प्राणरूपी सूर्य जब अपानरूपी चन्द्रमा के घर में लीन होता है, उस अवस्था में स्थित हुआ मन फिर जन्म का भागी नहीं होता।
हे मुनीश्वर ! सूर्यरूपी प्राण अपने सूर्यभाव को त्यागकर अपान-रूपी चन्द्रमा को जब तक नहीं प्राप्त हुआ, उस अवस्था के देशकाल को विचारे तो फिर शोक नहीं पाता और सब भ्रम नष्ट हो जाते हैं। द्वादश अंगुल पर्यन्त जो आकाश है, उससे अपानरूपी चन्द्रमा उपज-कर हृदय के प्राणरूपी सूर्य में लीन होता है। पर सूर्यभाव को जब तक नहीं प्राप्त होता उस मध्यभाव की अवस्था में जिसका मन लगा है, वह परमपद को प्राप्त होता है। हृदय में चन्द्रमा और सूर्य के अस्त और उदय होने का ज्ञाता और इसका आधारभूत जो आत्मा है, उसको जानकर फिर मन नहीं उपजता। हे मुनीश्वर ! प्राण और अपानरूपी जो सूर्य और चन्द्रमा हृदयाकाश में उदय और अस्त होते हैं, उनके प्रकाश से हृदय में जो भास्कर देव है उसको जो देखता है, वही यथार्थ में देखता है। बाहर सूर्य कभी प्रकाश और कभी अंधकार करता है। उस प्रकाश के उदय और तम के क्षीण होने से कुछ सिद्ध नहीं होता। जब हृदय का तम दूर होता है, तभी परमसिद्धता प्राप्त होती है। बाहर