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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 862, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 862

❇ निर्वाण प्रकरण ❇ ५१

श्रम को दूर करता और तपन मिटाता है। अनर्थकारिणी समस्त दुःखों की खानि अविद्या को यह आत्मचिन्तन नष्ट करता है। जैसे अन्धकार को प्रकाश नष्ट करता है, वैसे ही यह जीव के हृदय में शीतल प्रकाश उपजाता है। हे भगवन्! सब संकल्पों से रहित ऐसा आत्मचिन्तन है। तुम जैसों को सुगम है और हम जैसों को कठिन है; क्योंकि वह समस्त कल्पना से अतीत है। हे मुनीश्वर! उस आत्मचिन्तन की ओर भी कोई सखी यदि प्राप्त हो तो सब ताप मिट जायँ और परम शान्ति प्राप्त हो। उनमें से मुझको एक सखी प्राप्त हुई है। वह सब दुःखों को नाश करती है, सब सौभाग्य देनेवाली और जीने का मूल है। उसका नाम प्राणचिन्तन है। हे राम! जब काकभुशुण्डि ने इस प्रकार मुझसे कहा, तब मैंने जानकर भी क्रीड़ा के निमित्त फिर उनसे पूछा कि हे सब संशयों को निवृत्त करनेवाले, चिरंजीवी पुरुष! सच कहो, प्राण-चिन्ता किसे कहते हैं?

भुशुण्डिजी बोले, हे सब वेदान्त के ज्ञाता और सब संशयों को मिटानेवाले! मेरे उपहास के निमित्त तुम मुझसे यह पूछते हो। तुम तो सब कुछ जानते हो। तथापि मैं तुमसे शिष्य की भाँति कहता हूँ, क्योंकि गुरु के आगे कहना भी कल्याण के निमित्त है। मेरे चिर-जीवन का कारण और मुझको आत्मलाभ देनेवाली प्राणचिन्ता ही है। हे भगवन्! इसी दृष्टि का आश्रय लेकर मैं परमपद को प्राप्त हुआ हूँ। मुझको बन्धन नहीं होता। सब अवस्थाओं में, बैठते, चलते, जागते, सोते सब ठौर, मेरा चित्त सावधान रहता है, इस कारण मुझे कोई बन्धन नहीं होता। हे मुनीश्वर! मैंने प्राण और अपान के संसरण की गति पाई है; उस युक्ति से मुझको आत्मबोध हुआ है और उस बोध से मेरे मद, मोहादिक सब विकार नष्ट हो गये हैं और मैं शान्त-रूप होकर स्थित हुआ हूँ। हे मुनीश्वर! जिसको प्राण-अपान की गति प्राप्त हुई है वह चाहे सब आरब्ध कर्म करे अथवा सबका आरम्भ त्याग करे, परन्तु सदा शान्तरूप रहता है; उसका काल सुख से व्यतीत होता है।