योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 861, कुल 1734 में से
संदर्भ में पढ़ें५० ❇ योगवाशिष्ठ ❇
चञ्चलता, अभिमान, प्रमाद इत्यादि दुःख होते हैं, उसको मृत्यु मारती है और जिसको संसारबन्धन का कारण काम, क्रोध, लोभादिक रोग बाँध नहीं सकते और जो इनसे लिप्त नहीं होता, उसको आधि-व्याधि-रूपी मल नहीं स्पर्श करता ।
जो मनुष्य लेता है, देता है और सब कार्य करता है, पर जिसके चित्त को अनात्म अभिमान स्पर्श नहीं करता, उसको समाहितचित्त कहते हैं । जो पुरुष इष्ट की कामना नहीं करता और अनिष्ट में दुःखी नहीं होता, दोनों अवस्थाओं में सम रहता है, उसको समाहितचित्त कहते हैं । हे मुनीश्वर ! जो कुछ ऐश्वर्यसूचक सुन्दर पदार्थ हैं, वे सब असत्-रूप हैं । पृथ्वी पर चक्रवर्ती राजा और स्वर्ग में गन्धर्व, विद्याधर, किन्नर, देवता और उनकी स्त्रियाँ और सुरों की सेना आदि सब नाशवान् हैं । मनुष्य, दैत्य, देवता, असुर, पहाड़, सरोवर, नदियाँ जो कुछ बड़े पदार्थ हैं, वे सभी नाशवान् हैं । स्वर्ग, पृथ्वी और पाताललोक में जो कुछ भोग हैं, वे सब असत् और अशुभ हैं । कोई पदार्थ श्रेष्ठ नहीं । न पृथ्वी का राज्य श्रेष्ठ है, न देवताओं का रूप श्रेष्ठ है, न नागों का पाताललोक श्रेष्ठ है, न शास्त्रों का पठन-मनन श्रेष्ठ है, न काव्य का जानना श्रेष्ठ है, न पुरातन कथाक्रम वर्णन करना श्रेष्ठ है, न बहुत जीना श्रेष्ठ है, न मूढ़ता से मर जाना श्रेष्ठ है, न नरक में पड़ना श्रेष्ठ है और न इस त्रिलोकी में और कोई पदार्थ श्रेष्ठ है; जहाँ सन्त का मन स्थित है, वही श्रेष्ठ है । यह नाना प्रकार का जगत्क्रम चल है । जो ज्ञानवान् पुरुष हैं, वे मूढ़ होकर चल पदार्थ में नहीं मरते और बहुत जीने की इच्छा भी नहीं करते ।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे भुशुण्डोपाख्याने सङ्कल्पनिराकरणनाम विशतितमस्सर्गः ॥ २० ॥
भुशुण्डिजी बोले, हे मुनीश्वर ! केवल एक आत्मदृष्टि सबसे श्रेष्ठ है; जिसे पाने से सब दुःख नष्ट होते हैं और परमपद प्राप्त होता है । वह आत्मचिन्तन सब दुःखों का नाशक है । वह चिरकाल के तीनों तापों से तपे और जन्म-मरण के मार्ग में चलने से थके हुए जीवों के