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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 860, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 860

☸ निर्वाण प्रकरण ☸

वर्तता है। कभी वेद विद्या के अर्थ अदृश्य ही होते हैं और नाना प्रकार के आश्चर्य भासित होते हैं। हे मुनीश्वर ! जब इन युगों की एक सहस्र चौकड़ी व्यतीत होती है, तब ब्रह्माजी का एक दिन होता है। एक बार दो दिन तक ब्रह्मा समाधिस्थ रहे और सृष्टि शून्य हो रही—यह भी स्मरण है। और भी कई देश क्रिया आदि विचित्र रूप स्मरण आते हैं; क्या-क्या कहूँ।

इति श्रीयोगवाशिष्टे निर्वाणप्रकरणे चिरातीतवर्णनन्नामैकोनविंशतितमस्सर्गः ॥ १९ ॥

बशिष्ठजी बोले, हे राम ! इस प्रकार जब भुशुण्डिजी ने कहा, तब मैंने फिर जिज्ञासा से पूछा कि हे पक्षियों के ईश्वर ! तुम तो चिरकाल पर्यन्त जगत् में व्यवहार करते रहे हो, तो तुम्हारे शरीर को मृत्यु ने किस कारण नहीं नष्ट किया ? भुशुण्डि बोले, हे मुनीश्वर ! तुम सब जानते हो, परन्तु ब्रह्मजिज्ञासा के कारण पूछते हो। इसलिए जैसे विद्यार्थी वेदार्थ पढ़कर फिर गुरु के आगे दोहराते हैं, वैसे ही मैं आज्ञा मानकर कहता हूँ। हे मुनीश्वर ! मृत्यु किसको मारती है और किसको नहीं मारती, सो सुनो। दुःखरूपी मोती वासनारूपी सूत से पिरोये हैं। यह माला जिसके हृदयरूपी गले में पड़ी हुई है उसको मृत्यु मारती है। जिसके कण्ठ में यह माला नहीं पड़ी, उसकी मृत्यु नहीं मारती। शरीररूपी वृक्ष में चित्तरूपी सर्प बैठा है। आशारूपी अग्नि जिस वृक्ष को नहीं जलाती, वह मृत्यु के वश नहीं होता। जिसका रागद्वेषरूपी विष से पूर्ण चित्तरूपी सर्प तृष्णा से चूर्ण होता है और लोभरूपी व्याधि से नष्ट होता है, उसी को मृत्यु मारती है और ग्रस लेती है। जिसको इनका दुःख नहीं स्पर्श करता, उसको मृत्यु भी नहीं नष्ट करती। हे मुनीश्वर ! शरीररूपी समुद्र क्रोधरूपी बड़वाग्नि से जलता है। जिसको क्रोधरूपी अग्नि नहीं जलाती, उसको मृत्यु भी नहीं मारती। जिसका मन परम पावन और निर्मल पद में दृढ़ विश्रान्त और स्थित हुआ है, उसका नाश मृत्यु नहीं करती। हे मुनीश्वर ! जिसमें काम, क्रोध, लोभ, मोह, भय, तृष्णा, चिन्ता,