सामग्री पर जाएँ
भारतकोश
संग्रह पर लौटें

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

☸ निर्वाण प्रकरण ☸

वर्तता है। कभी वेद विद्या के अर्थ अदृश्य ही होते हैं और नाना प्रकार के आश्चर्य भासित होते हैं। हे मुनीश्वर ! जब इन युगों की एक सहस्र चौकड़ी व्यतीत होती है, तब ब्रह्माजी का एक दिन होता है। एक बार दो दिन तक ब्रह्मा समाधिस्थ रहे और सृष्टि शून्य हो रही—यह भी स्मरण है। और भी कई देश क्रिया आदि विचित्र रूप स्मरण आते हैं; क्या-क्या कहूँ।

इति श्रीयोगवाशिष्टे निर्वाणप्रकरणे चिरातीतवर्णनन्नामैकोनविंशतितमस्सर्गः ॥ १९ ॥

बशिष्ठजी बोले, हे राम ! इस प्रकार जब भुशुण्डिजी ने कहा, तब मैंने फिर जिज्ञासा से पूछा कि हे पक्षियों के ईश्वर ! तुम तो चिरकाल पर्यन्त जगत् में व्यवहार करते रहे हो, तो तुम्हारे शरीर को मृत्यु ने किस कारण नहीं नष्ट किया ? भुशुण्डि बोले, हे मुनीश्वर ! तुम सब जानते हो, परन्तु ब्रह्मजिज्ञासा के कारण पूछते हो। इसलिए जैसे विद्यार्थी वेदार्थ पढ़कर फिर गुरु के आगे दोहराते हैं, वैसे ही मैं आज्ञा मानकर कहता हूँ। हे मुनीश्वर ! मृत्यु किसको मारती है और किसको नहीं मारती, सो सुनो। दुःखरूपी मोती वासनारूपी सूत से पिरोये हैं। यह माला जिसके हृदयरूपी गले में पड़ी हुई है उसको मृत्यु मारती है। जिसके कण्ठ में यह माला नहीं पड़ी, उसकी मृत्यु नहीं मारती। शरीररूपी वृक्ष में चित्तरूपी सर्प बैठा है। आशारूपी अग्नि जिस वृक्ष को नहीं जलाती, वह मृत्यु के वश नहीं होता। जिसका रागद्वेषरूपी विष से पूर्ण चित्तरूपी सर्प तृष्णा से चूर्ण होता है और लोभरूपी व्याधि से नष्ट होता है, उसी को मृत्यु मारती है और ग्रस लेती है। जिसको इनका दुःख नहीं स्पर्श करता, उसको मृत्यु भी नहीं नष्ट करती। हे मुनीश्वर ! शरीररूपी समुद्र क्रोधरूपी बड़वाग्नि से जलता है। जिसको क्रोधरूपी अग्नि नहीं जलाती, उसको मृत्यु भी नहीं मारती। जिसका मन परम पावन और निर्मल पद में दृढ़ विश्रान्त और स्थित हुआ है, उसका नाश मृत्यु नहीं करती। हे मुनीश्वर ! जिसमें काम, क्रोध, लोभ, मोह, भय, तृष्णा, चिन्ता,

५० ❇ योगवाशिष्ठ ❇

चञ्चलता, अभिमान, प्रमाद इत्यादि दुःख होते हैं, उसको मृत्यु मारती है और जिसको संसारबन्धन का कारण काम, क्रोध, लोभादिक रोग बाँध नहीं सकते और जो इनसे लिप्त नहीं होता, उसको आधि-व्याधि-रूपी मल नहीं स्पर्श करता ।

जो मनुष्य लेता है, देता है और सब कार्य करता है, पर जिसके चित्त को अनात्म अभिमान स्पर्श नहीं करता, उसको समाहितचित्त कहते हैं । जो पुरुष इष्ट की कामना नहीं करता और अनिष्ट में दुःखी नहीं होता, दोनों अवस्थाओं में सम रहता है, उसको समाहितचित्त कहते हैं । हे मुनीश्वर ! जो कुछ ऐश्वर्यसूचक सुन्दर पदार्थ हैं, वे सब असत्-रूप हैं । पृथ्वी पर चक्रवर्ती राजा और स्वर्ग में गन्धर्व, विद्याधर, किन्नर, देवता और उनकी स्त्रियाँ और सुरों की सेना आदि सब नाशवान् हैं । मनुष्य, दैत्य, देवता, असुर, पहाड़, सरोवर, नदियाँ जो कुछ बड़े पदार्थ हैं, वे सभी नाशवान् हैं । स्वर्ग, पृथ्वी और पाताललोक में जो कुछ भोग हैं, वे सब असत् और अशुभ हैं । कोई पदार्थ श्रेष्ठ नहीं । न पृथ्वी का राज्य श्रेष्ठ है, न देवताओं का रूप श्रेष्ठ है, न नागों का पाताललोक श्रेष्ठ है, न शास्त्रों का पठन-मनन श्रेष्ठ है, न काव्य का जानना श्रेष्ठ है, न पुरातन कथाक्रम वर्णन करना श्रेष्ठ है, न बहुत जीना श्रेष्ठ है, न मूढ़ता से मर जाना श्रेष्ठ है, न नरक में पड़ना श्रेष्ठ है और न इस त्रिलोकी में और कोई पदार्थ श्रेष्ठ है; जहाँ सन्त का मन स्थित है, वही श्रेष्ठ है । यह नाना प्रकार का जगत्क्रम चल है । जो ज्ञानवान् पुरुष हैं, वे मूढ़ होकर चल पदार्थ में नहीं मरते और बहुत जीने की इच्छा भी नहीं करते ।

इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे भुशुण्डोपाख्याने सङ्कल्पनिराकरणनाम विशतितमस्सर्गः ॥ २० ॥

भुशुण्डिजी बोले, हे मुनीश्वर ! केवल एक आत्मदृष्टि सबसे श्रेष्ठ है; जिसे पाने से सब दुःख नष्ट होते हैं और परमपद प्राप्त होता है । वह आत्मचिन्तन सब दुःखों का नाशक है । वह चिरकाल के तीनों तापों से तपे और जन्म-मरण के मार्ग में चलने से थके हुए जीवों के

❇ निर्वाण प्रकरण ❇ ५१

श्रम को दूर करता और तपन मिटाता है। अनर्थकारिणी समस्त दुःखों की खानि अविद्या को यह आत्मचिन्तन नष्ट करता है। जैसे अन्धकार को प्रकाश नष्ट करता है, वैसे ही यह जीव के हृदय में शीतल प्रकाश उपजाता है। हे भगवन्! सब संकल्पों से रहित ऐसा आत्मचिन्तन है। तुम जैसों को सुगम है और हम जैसों को कठिन है; क्योंकि वह समस्त कल्पना से अतीत है। हे मुनीश्वर! उस आत्मचिन्तन की ओर भी कोई सखी यदि प्राप्त हो तो सब ताप मिट जायँ और परम शान्ति प्राप्त हो। उनमें से मुझको एक सखी प्राप्त हुई है। वह सब दुःखों को नाश करती है, सब सौभाग्य देनेवाली और जीने का मूल है। उसका नाम प्राणचिन्तन है। हे राम! जब काकभुशुण्डि ने इस प्रकार मुझसे कहा, तब मैंने जानकर भी क्रीड़ा के निमित्त फिर उनसे पूछा कि हे सब संशयों को निवृत्त करनेवाले, चिरंजीवी पुरुष! सच कहो, प्राण-चिन्ता किसे कहते हैं?

भुशुण्डिजी बोले, हे सब वेदान्त के ज्ञाता और सब संशयों को मिटानेवाले! मेरे उपहास के निमित्त तुम मुझसे यह पूछते हो। तुम तो सब कुछ जानते हो। तथापि मैं तुमसे शिष्य की भाँति कहता हूँ, क्योंकि गुरु के आगे कहना भी कल्याण के निमित्त है। मेरे चिर-जीवन का कारण और मुझको आत्मलाभ देनेवाली प्राणचिन्ता ही है। हे भगवन्! इसी दृष्टि का आश्रय लेकर मैं परमपद को प्राप्त हुआ हूँ। मुझको बन्धन नहीं होता। सब अवस्थाओं में, बैठते, चलते, जागते, सोते सब ठौर, मेरा चित्त सावधान रहता है, इस कारण मुझे कोई बन्धन नहीं होता। हे मुनीश्वर! मैंने प्राण और अपान के संसरण की गति पाई है; उस युक्ति से मुझको आत्मबोध हुआ है और उस बोध से मेरे मद, मोहादिक सब विकार नष्ट हो गये हैं और मैं शान्त-रूप होकर स्थित हुआ हूँ। हे मुनीश्वर! जिसको प्राण-अपान की गति प्राप्त हुई है वह चाहे सब आरब्ध कर्म करे अथवा सबका आरम्भ त्याग करे, परन्तु सदा शान्तरूप रहता है; उसका काल सुख से व्यतीत होता है।

५२

<div align="center">☸ योगवाशिष्ठ ☸</div>

हे मुनीश्वर ! अब प्राण-अपान का संस्मरण कहता हूँ, सुनो। प्राण हृदय से उपजकर द्वादश अंगुल पर्यन्त बाहर जाता है और वहाँ जाकर स्थित होता है; फिर उस स्थान से अपानरूप हो हृदय में आकर स्थित होता है। हे मुनीश्वर ! बाहर आकाश के सम्मुख जो प्राण जाता है, वह अग्नि-सा उष्ण होता है और जो हृदयाकाश के सम्मुख आता है, वह शीतल नदी के प्रवाह-सा आती है। अपान चन्द्रमारूप है और बाहर से भीतर आता है और जो प्राण भीतर से बाहर जाता है, वह अग्नि, उष्ण और सूर्यरूप है। प्राणवायु हृदयाकाश को तपाता है और अन्न को पचाता है और अपान हृदय को चन्द्रमा की तरह शीतल करता है। हे मुनीश्वर ! अपानरूपी चन्द्रमा जब प्राणरूपी सूर्य में जहाँ तत्त्व है, लीन होता है तो उसमें स्थित हुआ मन फिर शोक को नहीं प्राप्त होता। और प्राणरूपी सूर्य जब अपानरूपी चन्द्रमा के घर में लीन होता है, उस अवस्था में स्थित हुआ मन फिर जन्म का भागी नहीं होता।

हे मुनीश्वर ! सूर्यरूपी प्राण अपने सूर्यभाव को त्यागकर अपान-रूपी चन्द्रमा को जब तक नहीं प्राप्त हुआ, उस अवस्था के देशकाल को विचारे तो फिर शोक नहीं पाता और सब भ्रम नष्ट हो जाते हैं। द्वादश अंगुल पर्यन्त जो आकाश है, उससे अपानरूपी चन्द्रमा उपज-कर हृदय के प्राणरूपी सूर्य में लीन होता है। पर सूर्यभाव को जब तक नहीं प्राप्त होता उस मध्यभाव की अवस्था में जिसका मन लगा है, वह परमपद को प्राप्त होता है। हृदय में चन्द्रमा और सूर्य के अस्त और उदय होने का ज्ञाता और इसका आधारभूत जो आत्मा है, उसको जानकर फिर मन नहीं उपजता। हे मुनीश्वर ! प्राण और अपानरूपी जो सूर्य और चन्द्रमा हृदयाकाश में उदय और अस्त होते हैं, उनके प्रकाश से हृदय में जो भास्कर देव है उसको जो देखता है, वही यथार्थ में देखता है। बाहर सूर्य कभी प्रकाश और कभी अंधकार करता है। उस प्रकाश के उदय और तम के क्षीण होने से कुछ सिद्ध नहीं होता। जब हृदय का तम दूर होता है, तभी परमसिद्धता प्राप्त होती है। बाहर

☸ निर्वाण प्रकरण ☸ ५३

का तम नष्ट होने से लोकों में प्रकाश होता है और हृदय का तम नष्ट होने से आत्मप्रकाश का उदय और अज्ञान-अन्धकार का अभाव होता है, उसी प्रकाश में परमपद को जानकर जीव मुक्त होता है। प्राणअपान की युक्ति जानने से तम नष्ट हो जाता है।

हे मुनीश्वर ! प्राण अपानरूपी जो चन्द्रमा और सूर्य हैं, वे यत्न बिना उदय और अस्त होते हैं। जब प्राणरूपी सूर्य हृदयकोट से उपज कर बाहर जाता है तब उसी क्षण अपानरूपी चन्द्रमा में लीन होता है और अपानरूपी चन्द्रमा उदय हो आता है। और जब अपानरूपी चन्द्रमा हृदयकोट के प्राणवायूरूपी सूर्य में स्थित होता है, तब उसी क्षण में प्राणरूपी सूर्य उदय होता है। प्राण के अस्त होने पर अपान का उदय होता है और अपान के अस्त होने पर प्राण का उदय होता है। जैसे छाया के अस्त होने पर धूप निकलती है और धूप के अस्त होने पर छाया प्रकट होती है, वैसे ही प्राण-अपान की गति है। हे मुनीश्वर ! जब हृदयकोट से प्राण का उदय होता है, तब प्राण का रेचक और अपान का पूरक होने लगता है, और जब प्राण अपान में स्थित होता है, तब अपान का कुम्भक होता है, उस कुम्भक में जब स्थित होती है, तब फिर तीनों ताप नहीं तपाते। जब अपान का रेचक होता है, तब प्राण का पूरक होने लगता है और जब अपान जाकर स्थित होता है, तब प्राण का कुम्भक होता है। उसमें जब मन स्थित होता है, तब भी तीन तापों से तप्त नहीं होता। हे मुनीश्वर ! प्राण-अपान के भीतर जो शान्तरूप आत्मतत्त्व है उसमें जब स्थिति होती है, तब मन तप्त नहीं होता। जब अपान आकर स्थित होता है और प्राण का उदय नहीं हुआ होता उस अवस्था में जो साक्षीभूत सत्ता है, वह आत्मतत्त्व है। उसमें जब स्थिति होती है, तब फिर वह साधना कठिन नहीं होती। जब अपान के स्थान में प्राण जाकर स्थित होता है, और अपान जब तक उदय नहीं हुआ होता, वहाँ जो देश, काल, अवस्था है उसमें जब मन स्थित होता है, तब मन का मनत्व जाता रहता है और फिर नहीं उपजता । हे मुनीश्वर ! प्राण जब अपान में स्थित हुआ होता है

५४ ❁ योगवाशिष्ठ ❁

और अपान का उदय नहीं हुआ होता, वह कुम्भक है। अपान जब प्राण में स्थित हुआ और प्राण का जब उदय नहीं हुआ, उस कुम्भक में जो शान्त तत्त्व है, वह आत्मा का स्वरूप, शुद्ध और परम चैतन्य है। जो उसको प्राप्त होता है वह फिर शोकयुक्त नहीं होता। जैसे पुष्प में गन्ध से प्रयोजन होता है वैसे ही प्राण-अपान के भीतर जो अनुभव-तत्त्व स्थित है, उससे प्रयोजन है। वह न प्राण है, न अपान, उस अनुभवस्वरूप आत्मतत्त्व की हम उपासना करते हैं। प्राण अपानकोट में क्षय को प्राप्त होता है और अपान प्राणकोट में क्षय को प्राप्त होता है; उस प्राण-अपान के मध्य में जो चिदात्मा है, उसकी हम उपासना करते हैं।

हे मुनीश्वर ! जो प्राण का प्राण, अपान का अपान, जीव का जीव और देह का आधारभूत है, उस चिदात्मा की हम उपासना करते हैं। जिसमें सर्व है, जिससे यह सर्व है और जो यह सर्व है, ऐसा जो चिदात्मा है उसकी हम उपासना करते हैं। जो सब प्रकाशों का प्रकाश है, सब पावनों का पावन है और सब भाव-अभाव पदार्थों का अपना आप है, उस चिदात्मा की हम उपासना करते हैं। जो पवन परस्पर हृदय में संपुटरूप है, उसमें स्थित जो साक्षीरूप और भीतर बाहर सब जगह है, उस चिदात्मा की हम उपासना करते हैं। जब अपान अस्त हुआ और प्राण नहीं उपजा, उस क्षण में जो कलंक से रहित है, उस चैतन्यतत्त्व की हम उपासना करते हैं। जब प्राण अस्त हुआ और अपान नहीं उपजा, ऐसा जो नासिका के अग्र भाग में शुद्ध आकाश है और उसमें जो सत्यता है, उस चित्तसत्ता की हम उपासना करते हैं। जो प्राण-अपान की उत्पत्ति का स्थान, भीतर बाहर सब ओर व्याप्त और सब योगकला का आधारभूत है, उस चित्ततत्त्व की हम उपासना करते हैं। जो प्राण-अपान के रथ पर आरूढ़ है और शक्ति का शक्तिरूप है; उस चित्ततत्त्व की हम उपासना करते हैं। हे मुनीश्वर ! जो सम्पूर्ण कला-कलंक से रहित है और सब कला जिसके आश्रय में हैं, ऐसा जो अनुभवतत्त्व है, और सब देवता जिसकी

☸ निर्वाण प्रकरण ☸ ५५

शरण को प्राप्त होते हैं, उस आत्मतत्त्व की हम उपासना करते हैं।

इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे भुशुण्ड्युपाख्याने समाधिवर्णनं नाम एकविंशतितमसर्गः ॥ २१ ॥

भुशुण्डिजी बोले, हे मुनीश्वर ! इस प्रकार मैंने प्राणसमाधि प्राप्त की है और इस क्रम से मैं आत्मपद को पहुँचा हूँ। इसी निर्मल दृष्टि का आश्रय लेकर स्थित हूँ और एक पल भी इससे चलायमान नहीं होता। सुमेरु पर्वत की भाँति स्थित हूँ और चलता हुआ भी स्थिर हूँ। जाग्रत् में सुषुप्ति स्वप्न में स्थित हूँ और सर्वदा आत्मसमाधि में लगा रहता हूँ; विक्षेप कभी नहीं होता। हे मुनीश्वर ! नित्य-अनित्य भाव से जो जगत् स्थित है, उसको त्यागकर मैं अन्तर्मुख अपने आपमें स्थित हूँ। प्राण-अपान की कला जो तुम्हारे सामने कही है, उसका सदा ऐसे ही प्रवाह चला जाता है; उसमें मेरी अचल समाधि है, इसमें मैं सदा सुखी रहता हूँ, कुछ कष्ट नहीं होता। जिसको यह कला नहीं प्राप्त हुई, वही कष्ट पाता है। हे मुनीश्वर ! अज्ञानी जीव महाप्रलय-पर्यन्त संसार-समुद्र में गोते खाते हैं। उभर कर फिर डूबते हैं और इसी प्रकार गोते खाते रहते हैं। जिन पुरुषों ने पुरुषार्थ करके आत्मपद पाया है, वे सुख से विचरते हैं। हे मुनीश्वर ! भूतकाल की मुझको चिन्ता नहीं और भविष्य की इच्छा नहीं; वर्तमान में यथाप्राप्त राग-द्वेष से रहित होकर विचरता हूँ। मैं सुषुप्त की तरह स्थित हूँ, इससे केवल 'स्वरूप' में भाव-अभाव पदार्थों से रहित हूँ और इसी कारण चिरंजीवी हो दुःख से रहित हूँ। प्राण-अपान की कला को शान्त करके स्वरूप में स्थित हूँ। आज यह कुछ पाया है और कल यह पाऊँगा; यह चिन्ता मेरी दूर हो गई है, इसी कारण दुःखरहित होकर जीता हूँ। न किसी की प्रशंसा करता हूँ और न किसी की निन्दा करता हूँ; सब आत्मस्वरूप देखता हूँ, इसी कारण सुखी जीता हूँ। मुझे इष्ट की प्राप्ति में हर्ष और अनिष्ट प्राप्ति में शोक नहीं होता। मैंने परम त्याग किया है, सर्वत्र आत्मभाव देखता हूँ और मेरा जीवभाव दूर हो गया है, इसी कारण दुःखरहित जीता हूँ। हे मुनीश्वर ! मेरे मन की चपलता मिट

५६ ☸ योगवाशिष्ठ ☸

गई है और राग-द्वेष दूर हो गये हैं, मन शान्त हुआ है। इस कारण अरोग जीता हूँ। मैं काष्ठ, सुन्दर स्त्री, पहाड़, तृण, अग्नि और सुवर्ण को सम देखता हूँ।

हे मुनीश्वर ! मैं जरामरण के दुःख और राजलाभ के सुख और शोक से रहित समभाव में स्थित हूँ और दुःखरहित जीता हूँ। ये मेरे बांधव हैं, ये अन्य हैं, यह मैं हूँ, यह मेरा है, यह सब कलना मुझको नहीं, इसी से सुखी जीता हूँ। आहार-व्यवहार करता, बैठता, चलता, सूँघता, स्पर्श करता और श्वास लेता हूँ; परन्तु यह जो अभिमान है कि मैं 'देह हूँ,' इस अभिमान से रहित हो सुखी जीता हूँ। इस संसार की ओर से मैं सुषुप्तरूप हूँ और इस संसार की गति को देखकर हँसता हूँ कि वास्तव में यह है ही नहीं। इस कारण शान्ति से जीता हूँ। हे मुनीश्वर ! मैं सब कालों में सब प्रकार, सभी पदार्थों में समबुद्धि हूँ; विषमता मुझको नहीं भासित होती । न किसी से सुखी होता हूँ और न दुखी। जैसे हाथ फैलाइये तो भी शरीर है और सिकोड़िए तो भी शरीर है, इसी प्रकार मैंने सर्वात्मा आपको जाना है । इसी से मुझको कोई दुःख नहीं । मेरी बोली और निश्चय स्निग्ध, कोमल और सबको हृदयगम्य है । सर्वत्र इसी दृष्टि के कारण मैं दुःखरहित जीता हूँ । चरण से मस्तक पर्यन्त देह में मुझको ममता नहीं है । अहंकाररूपी कीच से मैं निकल गया हूँ, इस कारण अरोग जीता हूँ। मैं कार्यकर्त्ता और भोजनकर्त्ता भी देख पड़ता हूँ, परन्तु मेरे मन में दृढ़ निष्कर्मता है।

हे मुनीश्वर ! सामर्थ्य करके कार्य करूँ तो भी मुझको अभिमान नहीं और दरिद्री होऊँ तो भी संपत्ति और सुख की इच्छा नहीं; अर्थात् किमी में आसक्त नहीं होता। इस असतरूप शरीर का नाश होने पर भी अभिमान नष्ट नहीं होता। भूतों का समूह सब असतरूप है, केवल आत्मा सतरूप है, ऐसा जानकर मैं स्थित हूँ। आशारूपी फाँसी से मेरे मुक्तचित्त की वृत्ति समाहित हुई है । मुझे अनात्म में आत्माभिमान की वृत्ति नहीं फुरती ।

हे मुनीश्वर ! मैंने जगत् को असत्य जाना है और आत्मा को

☸ निर्वाण प्रकरण ☸ ५७

सत्य और हाथ में रखे बिल्वफल सा प्रत्यक्ष जाना है। इस जगत् में मैं सुसुप्त, प्रबुद्ध हूँ। सुख पाकर मैं सुखी नहीं होता और दुःख पाकर दुःखी नहीं होता। सबका परममित्र हूँ, इसी कारण मैं दुःखरहित जीता हूँ। आपदा में अचलचित्त हूँ; संपदा में सब जगत् का मित्र हूँ और भाव-अभाव से ज्यों का त्यों हूँ; इस कारण सदा सुखी जीता हूँ। न मैं परिच्छिन्न अहं हूँ; न मेरी दृष्टि में कोई अन्य है; न कोई मेरा है और न मैं किसी का हूँ; यह भावना मेरे चित्त में दृढ़ है। मैं जगत् हूँ; मैं ही आकाश, देश, काल, क्रिया, सब हूँ; मुझे यह दृढ़ निश्चय है। घट भी चैतन्य है, पट भी चैतन्य है, रथ भी चैतन्य है और यह सब प्रपंच चैतन्य तत्त्व है; यह मुझको दृढ़ निश्चय है, इसी कारण दुःख-रहित जीता हूँ। हे मुनिशार्दूल ! यह सब जो मैंने तुमसे कहा, सो भुशुण्डि नाम काक ने, जो त्रिलोकीरूपी कमल का भँवरा है, मुझसे कहा था।

इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे भुशुण्ड्युपाख्याने चिरञ्जीविहेतुकथनं नाम द्वाविंशतितमस्सर्गः ॥ २२ ॥

भुशुण्डिजी बोले, हे मुनीश्वर ! जैसा मैं हूँ, सो तुम्हारी आज्ञा का पालन करने के लिए कहा है; नहीं तो गुरु के आगे कहना भी ढिठाई है। तुम ज्ञान के पारगामी हो। फिर मैं बोला, हे भगवन् ! आश्चर्य है और आश्चर्य से भी आश्चर्य है कि तुमने श्रवण का भूषण इस कथा को कहा। आत्मउदितरूप जो वचन तुमने कहे, वे परम विस्मय-जनक हैं। हे भगवन् ! तुम धन्य हो। तुम महात्मा पुरुष हो और चिरंजीवियों में तुम मुझको साक्षात् दूसरे ब्रह्मा जान पड़ते हो। आज मैं भी धन्य हूँ कि तुम जैसे महापुरुष के मुख से इस प्रकार आत्मतत्त्व सुना। जैसे मैंने पूछा, वैसे ही तुमने कहा। हे साधो ! मैंने सब भूतल के लोक, दिशाएँ, आकाश और पाताल के लोक भी देखे हैं; त्रिलोकी में तुम सा कोई बिरला ही होगा। जैसे बाँस बहुत हैं, पर मोती उपजानेवाला बिरला ही होता है, वैसे ही तुम जैसे बिरले हैं। हे साधो ! आज मैं पुण्यरूप हुआ, आज मेरी देह पवित्र हुई, जो तुम जैसे मुक्त आत्मा

५८ ☸ योगवाशिष्ठ ☸

का दर्शन हुआ। हे साधो! अब सप्तर्षियों के बीच जाता हूँ; मेरी मध्याह्न सन्ध्या का समय हुआ है।

जब मैंने ऐसे कहा, तब भुशुण्डि कल्पवृक्ष से उठ खड़ा हुआ। उसने सुवर्ण का पात्र मोती और रत्नों से भरा और अर्घ्यपाद्य से पूजन किया। जैसे सदाशिव की पूजा करते हैं, वैसे ही उसने चरणों से लेकर मस्तक पर्यन्त मेरा पूजन किया और बहुत नम्र होकर प्रणाम किया। मैंने भी उसको प्रणाम किया। इस प्रकार परस्पर नमस्कार करके मैं वहाँ से उठ खड़ा हुआ और आकाशमार्ग को चला। जैसे पक्षी उड़ता है, वैसे ही मैं उड़ा और वह भी मेरे साथ उड़ा। परस्पर हम दोनों हाथ मिलाये जब एक योजन पर्यन्त चले गये, तब मैंने उससे कहा, हे साधो! तुम अब यहाँ से लौट जाओ। इस प्रकार बारम्बार कहकर मैंने उसको रोका और मैं चला गया। जब तक मैं उसको देख पड़ता रहा, तब तक वह देखता रहा। जब मैं न दिखा, तब वह अपने स्थान में जा बैठा। मैं सप्तर्षियों के मण्डल में जा पहुँचा और अरुन्धती ने मेरा पूजन किया।

हे राम! भुशुण्डि के आश्चर्यजनक वचन मैंने तुमको सुनाये। अब भी सुमेरु के शिखर पर उस कल्पवृक्ष की लता में वह कल्याणरूप वैसे ही स्थित है। वह शान्तिरूप मान करने के योग्य और सदा समाधिस्थ है। हे राम! यह मेरा और उसका समागम सतयुग के दो सौ वर्ष व्यतीत होने पर हुआ था। अब सतयुग बीत गया और त्रेतायुग चल रहा है, जिसमें तुम उपजे हो। हे राम! अभी आठ वर्ष पहले मेरा और उसका फिर समागम हुआ था। वह उसी वृक्षलता पर है। हे राम! यह इतिहास जो मैंने तुमसे कहा है, सो परम उत्तम है। जब इसको विचारोगे, तब संसारभ्रम निवृत्त हो जायगा। मुनि वशिष्ठ और भुशुण्डि की कथा को जो निर्मल बुद्धि से विचारेगा, वह भवरूप संसार के भय से छूट जायगा।

इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे भुशुण्ड्यु पाख्यानसमाप्तिर्नाम त्रयोविंशतितमस्सर्गः ॥ २३ ॥

❊ निर्वाण प्रकरण ❊ ५६

वशिष्ठजी बोले, हे अनघ ! यह जो मैंने तुमसे भुशुण्डि का वृत्तान्त कहा, इसे बोध करके भुशुण्डि महासंकट से तरा है। इस दशा को तुम भी आश्रय करके प्राणों की युक्ति से अभ्यास करो। तब तुम भी भुशुण्डि की नांई भवसमुद्र के पार होगे। जैसे भुशुण्डि ने ज्ञानयोग द्वारा पाने के योग्य पद पाया है, वैसे ही तुम भी पाओ और जैसे प्राण-अपान के अभ्यास से भुशुण्डि को परमतत्त्व प्राप्त हुआ, वैसे ही तुम भी अभ्यास करके पाओगे। विज्ञानदृष्टि जो तुमने सुनी है, उसकी ओर चित्त को लगाकर आत्मपद को पाओ, फिर जैसी इच्छा हो, वैसा करो।

राम ने पूछा, हे भगवन् ! पृथ्वी में आपके ज्ञानरूपी सूर्य की किरणों के प्रकाश से मेरे हृदय से अज्ञानरूपी तम दूर हो गया और अब प्रबुद्ध होकर अपने आनन्दरूप में स्थित हुआ हूँ। मैंने जानने योग्य पद को जान लिया, मानो दूसरा वशिष्ठ हो गया हूँ। हे भगवन् ! यह भुशुण्डि का चरित्र आपने परमार्थबोध के निमित्त कहा, अब, मेरा प्रश्न यह है कि रक्त, मांस और अस्थि का शरीररूपी गृह किसने रचा है, कहाँ से उपजा है, कैसे स्थित हुआ है और कौन इसमें स्थित है ? वशिष्ठजी बोले, हे राम ! परमार्थतत्त्व के बोध और दुःख की निवृत्त के अर्थ ये मेरे वचन हैं, सुनो। अस्थि इस शरीररूपी गृह का खम्भा है और इसके नव द्वार हैं। रक्त-मांस से जो यह लेपन किया है, सो किसी ने बनाया नहीं आभासमात्र है और मिथ्या भ्रम से भासित होता है। जैसे आकाश में दूसरा चन्द्रमा भ्रम से भासित हो, वैसे ही असतरूप यह शरीर भी भ्रम से भासित होता है। हे राम ! जब तक अज्ञान है, तब तक देह सत्य भासित होता है, और जब ज्ञान होता है, तब देह असतरूप भासित होता है। जैसे स्वप्नकाल में स्वप्न के पदार्थ सत्य जान पड़ते हैं और जाग्रतकाल में स्वप्न असत्य लगता है, वैसे अज्ञानकाल में अज्ञान के देहादिक पदार्थ सत्य लगते हैं, और ज्ञानकाल में असत्य हो जाते हैं। जैसे जल में बुलबुला जल के अज्ञान से सत्य लगता है और जल के जाने से असत्य लगता है, या सूर्य की किरणों में मरुस्थल की नदी दिखती है, वैसे ही आत्मा में देह की भावना होती है। हे राम ! जो कुछ जगत्-

६० ❇ योगवाशिष्ठ ❇

प्रपंच भासित होता है वह सब आभासमात्र है और अज्ञान से भासित होता है और 'अहं', 'त्वं' आदिक कल्पना सब मनोमात्र मन में फुरती हैं । तुम जो कहते हो कि देह अस्थि और मांस का गृह रचा है, सो अस्थि-मांस से नहीं रचा, केवल संकल्पमात्र है । संकल्प से भासित होता है और संकल्प के अभाव में देह नहीं पाई जाती । हे राम ! स्वप्न में जो देह रखकर दिशा, तट, पर्वत इत्यादि तुम देखते फिरते हो, जाग्रत् में वह तुम्हारी देह कहाँ जाती है ? जो देह सत्य होती तो जाग्रत् में भी रहती । जीव मनोराज्य से स्वर्ग को जाता है तथा सुमेरु और भूमिलोक में फिरता है । हे राम ! इन स्थानों में जैसे मन का फुरना देह होकर भासित होता है सो असत्यरूप है, वैसे ही यह शरीर मन के स्फुरणमात्र है, इससे असत्य जानो ।

यह मेरा धन है, यह मेरी देह है, यह मेरा देश है इत्यादिक कल्पना मन की रची हुई है-सबका बीज चित्त ही है । हे राम ! जगत् को दीर्घकाल का सपना जानो या दीर्घ चित्त का भ्रम जानो अथवा दीर्घ मनोराज्य जानो । वास्तव में जगत् कुछ नहीं है । जब जीव अपने वास्तव परमात्मस्वरूप को अभ्यास करके जानता है, तब जगत् असत्य-रूप भासित होता है । हे राम ! मैंने पहले भी तुमसे ब्रह्माजी के वचनों से कहा है कि सब जगत् मन का रचा हुआ है-इससे संकल्पमात्र है । चिरकाल के अभ्यास से सत् प्रतीत होता है । जब दृढ़ प्रयत्न से पुरुष को आत्म-अभ्यास हो तब असत्य जान पड़ेगा । हे राम ! जो भावना हृदय में दृढ़ होती है, उसका अभाव भी सुगम नहीं होता; पर जब उसके विपरीत भावना का अभ्यास करिये, तब उसका अभाव हो जाता है । यह मैं हूँ, यह और है इत्यादिक कलना जो हृदय में दृढ़ हो रही है, जब इसके विपरीत आत्मभावना हो, तब वह मिटे और सर्वत्र सब आत्मा ही देख पड़े । हे राम ! जिसकी तीव्र भावना होती है, वही रूप उसका हो जाता है । जैसे कामी पुरुष को सुन्दर स्त्री की कामना रहती है, वैसे ही जीव को जब आत्मपद की चिन्ता रहे; तब वही रूप होता है । जैसे कीट भृङ्गी हो जाता है और जैसे दिन में जिस व्यापार

❄ निर्वाण प्रकरण ❄ ६१

का अभ्यास होता है तो रात्रि को स्वप्न में भी वही देख पड़ता है, वैसे ही जीव को जिसका दृढ़ अभ्यास होता है, वही अनुभव होता है। जैसे सूर्य आकाश में तपता है और मरुस्थल में जल होकर भासित होता है, पर वहाँ जल का अभाव है, वैसे ही भाव से रहित पृथ्वी आदिक पदार्थ भ्रम से भावरूप भासित होते हैं। जैसे दृष्टि-दोष से आकाश में तारे मोर-पुच्छ जैसे भासित होते हैं, वैसे ही अज्ञान से यह जगज्जाल भासित होता है। हे राम! यह सब जगत् आभासरूप है। स्वरूप के प्रमाद से जीव भय और दुःख को प्राप्त होता है, पर वह जब स्वरूप को जानता है, तब भ्रम, भय और दुःख से रहित होता है। जैसे स्वप्न में चित्त के भ्रम से सिंहों से भय पाता है, और जब जाग्रत् स्वरूप में चित्त आता है तब सिंह का भय निवृत्त हो जाता है, वैसे ही आत्मज्ञान से निर्भय होता है। जब वैराग्य का अभ्यास करके जीव निर्मल आत्म-पद पा जाता है, तब फिर क्षोभ को नहीं प्राप्त होता और रागद्वेष-रूपी मल उसको नहीं स्पर्श करते। जैसे ताँबा जब पारस के स्पर्श से सुवर्ण होता है, तब वह ताँबे के भाव को नहीं ग्रहण करता, वैसे ही जीव फिर मलिन नहीं होता। अहं, त्वं आदिक जो कुछ जगत् भासता है, वह सब आभासमात्र ही है।

हे राम! प्रथम सत्य और असत्य को जानकर असत्य का निरादर करो और सत्य का अभ्यास करो। तब चित्त सब कल्पनाओं से रहित होकर शान्तपद प्राप्त होता है। जो तत्त्वज्ञान से सम्यक्दर्शी हुआ है, उसको जगत् के इष्ट पदार्थ पाने से हर्ष नहीं होता और अनिष्ट को पाने मे शोक नहीं होता। वह न किसी की स्तुति करता है, न किसी की निंदा। वह हृदय में शीतल और शान्तरूप हो जाता है। जब कोई बान्धव मृतक हो, तब उससे दुःख क्यों होता है? वह तो अवश्य ही मरता। जब अपनी मृत्यु आवे, तब अदृश्य शरीर छूटता है। फिर वृथा क्यों संताप होता है। जब सम्पदा प्राप्त हो तो उससे उसे हर्ष नहीं होता; क्योंकि जो कुछ भोगना था सो भोगा; हर्ष किससे हुआ? दुःख आकर प्राप्त हो, तब शोक क्यों करना? शरीर का व्यवहार सुख-

६२

<div align="center"> * योगवाशिष्ठ * </div>

दुःख आता जाता है और अमिट है । जब अपना किया कर्म उदय होता है, तब शोक क्यों करे ? हे राम ! जो सत्य है, वह असत्य नहीं और जो असत्य है सो सत्य नहीं । फिर रागद्वेष किस निमित्त करना ? जिसको ऐसा निश्चय हुआ है कि न मैं हूँ, न जगत् है और न पृथ्वी है, वह शोक किसका करे ? जब देह अन्य है और मैं चैतन्य हूँ तो चैतन्य का तो नाश नहीं होता । तब शोक किसका करना ? हे राम ! दुःख तो किसी प्रकार नहीं है; पर जब तक विचार नहीं तब तक दुःख होता है और विचार किये से कोई दुःख नहीं रहता । जो सम्यग्दर्शी मुनीश्वर है, वह सत्य को सत्य और असत्य को असत्य जानता है, इस कारण दुःख नहीं पाता । जो असम्यग्दर्शी है वह अज्ञान से दुःख पाता है । जैसे दिन के अन्त में पृथ्वी-मण्डल शीतल हो जाता है, वैसे ही सम्यग्दर्शी का हृदय शीतल होता है । जिसको कर्तव्य में कर्तृत्व का अभिमान नहीं है, वही सम्यग्दर्शी है ।

हे राम ! जितने जगत् के पदार्थ हैं, उनको हृदय से आभासमात्र जानो और बाहर जैसे आचार हों वैसे करो । अथवा उनका भी त्याग करो और निराभास होकर स्थित होओ । मैं चिदाकाश, नित्य, सर्वज्ञ और सबसे रहित हूँ, ऐसा अभ्यास करके अपने को एकान्त और निर्मल देखोगे । अथवा ऐसी धारणा करो कि न मैं हूँ, न ये भोग हैं, न अर्थरूप जगत् का आडम्बर है । अथवा ऐसे सोचो कि मैं ही नित्य, शुद्ध, चिदात्मा और आकाशरूप सब कुछ हूँ, मुझसे कुछ भिन्न नहीं । मैं अपने आपमें स्थित हूँ । इन दोनों पक्षों में जो इच्छा हो सो ग्रहण करो तो तुमको सिद्धि प्राप्त होगी । जगत् को आभासमात्र जानो, परन्तु यह भी कलङ्करूप है अतः इस चिन्तना को भी त्यागकर निराभास हो । तुम चिदाकाश, नित्य, सर्वव्यापी और सबसे रहित हो; आभास को त्यागकर निर्मल अद्वैत हो रहो, अथवा विधिनिषेध दोनों दृष्टियों का आश्रय करो । हे राम ! क्रिया को करो, परन्तु रागद्वेष से रहित हो । जब रागद्वेष से रहित होगे, तब उत्तम पदार्थ ब्रह्मानन्द को पाओगे; जो सबका अधिष्ठान है, उसको पाओगे । हे राम ! जिसका

  • निर्वाण प्रकरण * ६३

हृदय रागद्वेषरूपी अग्नि से जलता है, उसको सन्तोष वैराग्य आदिक गुण नहीं प्राप्त होते । जैसे दग्ध भूतल के वन में हरिण प्रवेश नहीं करते, वैसे ही रागद्वेषादिकयुक्त हृदय में सन्तोषादिक नहीं प्रवेश करते ।

हे राम ! हृदय कल्पतरु है । ऐसा वृक्ष, जो रागद्वेषादिक सर्पों से रहित है, उसमे कौन पदार्थ है, जो प्राप्त न हो—शुद्ध हृदय से सब कुछ प्राप्त होता है । हे राम ! जो बुद्धिमान् है और शास्त्र का ज्ञाता भी है, परन्तु रागद्वेष-संयुक्त है, वह सियार की तरह नीच है । उसको धिक्कार है । जिन पदार्थों को पाने के निमित्त लोग यत्न करते हैं, वे तो आते-जाते रहते हैं । धन, को इकट्ठा कोई करता है और ले कोई जाता है । तब रागद्वेष किसका करिये ? जो कुछ प्रारब्ध है सो अवश्य होता है, धन का व्यर्थ यत्न क्यों करिये ? बान्धव और वस्त्र आते हैं, और फिर जाते भी हैं । जैसे समुद्र में जलजन्तुओं का आश्रय बुद्धिमान् नहीं लेते, वैसे ही जगत् के पदार्थों का आश्रय ज्ञानवान् नहीं लेते । भाव-अभावरूप परमेश्वर की माया है । संसार की रचना स्वप्न की तरह है । उसमें जो आसक्त होते हैं, उनको वह सर्पिणी की तरह डसता है । धन, बान्धव और जगत् वास्तव में मिथ्या ही हैं, अज्ञान से सत्य भासित होते हैं । हे राम ! जो आदि में न हो और अन्त में भी न रहे, पर मध्य में भासित हो, उसको भी असत्य जानिये । जैसे आकाश में फूल असत्य हैं, वैसे ही, संसार-रचना असत्य है । जैसे संकल्प की रचना असत्य है, जैसे गन्धर्वनगर सुन्दर भासित होता है, पर नष्ट हो जाता है और जैसे स्वप्नपुर दीर्घकाल का भासित होता है, पर भ्रमरूप है, वैसे ही यह जगत् असत्यरूप और भ्रममात्र है; केवल संकल्परूप अभ्यास के वश से दृढ़ता को प्राप्त हुआ है । दीवार जो साकार भासित होती है, वह आकार से रहित प्रकाशरूप है और आत्मपद सुषुप्ति की तरह अद्वैतरूप है । उस सुषुप्ति पद से जीव जब गिरता है, तब दीर्घ स्वप्न को देखता है ।

हे राम ! अज्ञानरूपी निद्रा में जो अपने स्वभाव से गिरा है, वह

६४

<div align="center">❊ योगवाशिष्ठ ❊</div>

संसाररूपी स्वप्नश्रम को देखता है । जब अज्ञानरूपी निद्रा का अभाव हो, तब यह आत्मराज्य और निर्विकल्प मुदित आत्मपद को प्राप्त होता है । जैसे सूर्य को देखकर कमल प्रफुल्लित होते हैं, वैसे ही ज्ञान से शुभगुण विकसित होते हैं । आत्मरूपी सूर्य सब दुःखों से रहित है । जो पुरुष निद्रा में होता है, वह सूक्ष्म वचनों से नहीं जागता, पर बड़े शब्द करने और जल डालने से जागता है, वैसे ही मैंने मेघ की तरह गरजकर तुम पर वचनरूपी जल की वर्षा की है । ज्ञानरूपी शीत-लता सहित ये वचन हैं उनसे अब तुम ज्ञानरूपी जाग्रत् बोध को प्राप्त हुए । ऐसे ज्ञानरूपी सूर्य से जगत् को भ्रमरूप देखोगे । हे राम ! तुमको न जन्म है, न मृत्यु है, न कोई दुःख है, न भ्रम है । तुम सब संकल्पों से रहित आत्मपुरुष अपने आपमें स्थित हो । तुम्हारी वृत्ति सम, शान्त और सुषुप्ति की भाँति है । तुम अति विस्तृत, सम, शुद्ध और अपने स्वरूप में स्थित हो ।

<div align="center">

इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे परमार्थ योगोपदेशो नाम चतुर्विंशतितमसर्गः ॥ २४ ॥

</div>

इतना कहकर वाल्मीकिजी बोले कि इस प्रकार जब वशिष्ठजी ने कहा, तब रामजी, सम, शान्त और चेतनतत्त्व में विश्राम पाकर परमानन्द को प्राप्त हुए । समस्त सभा जो बैठी थी, वह भी वशिष्ठजी के वचन सुनकर सम और आत्मसमाधि में स्थित हुई और बोलने का व्यवहार शान्त हो गया । पिंजड़े में जो पक्षी बोलते थे, वे भी शान्त हो गये । वन के जो वानर थे, वे भी वचन सुनकर स्थित हो रहे । सब ओर शान्ति छा गई । जैसे अर्द्धरात्रि के समय भूमि शान्त हो जाती है, वैसे ही सभा के लोग चुप हो रहे और वचनों पर विचारने लगे कि क्या उपदेश मुनीश्वर ने किया है । एक घड़ी तक शान्ति रही ।

उसके अनन्तर फिर वशिष्ठजी बोले, हे राम ! अब तुम सम्यक् प्रबुद्ध हुए हो और अपने आपमें स्थित हो । जो कुछ तुमने जाना है, उसके अभ्यास का त्याग न करना, इसी में दृढ़ रहना । हे राम ! संसार-रूपी चक्र का नाभिस्थान चित्त है । उसी चित्तनाभि के स्थिर होने

☸ निर्वाण प्रकरण ☸ <span style="float:right;">६५</span>

पर संसारचक्र भी स्थिर हो जाता है। इस संसाररूपी चक्र का बड़ा तीव्र वेग है। रोकने से भी नहीं रुकता। इससे दृढ़ प्रयत्न करके इसको रोकिये। सन्तों के संग और सतशास्त्रों के वचनों से शुद्ध हुई बुद्धि ही इसे रोक सकती है। हे राम! अज्ञान से जो दैव कल्पा है, उसका त्यागकर अपने पुरुषार्थ का आश्रय लो। इसी से परम शान्तपद प्राप्त होता है। ब्रह्मा से लेकर चींटी तक यह अज्ञानरूपी संसारचक्र असतरूप है और भ्रम से सत् की नाईं भासित होता है। इसका त्याग करो। हे राम! असतरूप पदार्थों में जो राग या द्वेष रखते हैं, वे मूर्ख हैं। उनसे तो चित्र-लिखित पुरुष भी श्रेष्ठ है। जब इष्टविषय प्राप्त होता है, तब ये हर्ष से प्रफुल्लित होते और अनिष्ट की प्राप्ति से द्वेष करते हैं; पर चित्र के पुरुष को किसी में रागद्वेष नहीं होता। इस कारण मैं कहता हूँ कि चित्र का पुरुष भी इनसे श्रेष्ठ है। ये आधि-व्याधि से जलते हैं, पर वह सदा ज्यों-का-त्यों है। चित्र का पुरुष तब नष्ट होता है, जब उसके आधार का नाश करिये; अधिष्ठान के नाश बिना उसका नाश नहीं होता। पर मनुष्य का आधार अविनाशी है, उसका नाश नहीं होता। वह मूर्खता से अपने को नष्ट होता मानता है और रागद्वेष से संयुक्त है, इस कारण चित्र के पुरुष से भी तुच्छ है। मनोराज्य संकल्प रूप देह भी इस देह से श्रेष्ठ है; क्योंकि जो कुछ दुःख इसको होते हैं वे बहुत काल तक रहते हैं, पर दुःख और संकल्प के आने से मनोराज्य का अभाव हो जाता है, इससे वह थोड़ा है। संकल्पदेह से भी स्थूलदेह तुच्छ है। हे राम! जो थोड़े समय से देह हुई है; उसमें दुःख भी थोड़ा है और जो दीर्घ संकल्परूपी देह है, वह दीर्घ दुःख को ग्रहण करती है, इससे महानीच है।

हे राम! यह देह भी संकल्पमात्र है। न सत् है, न असत् है; इसके भोग के लिये यत्न मूर्ख करते हैं और क्लेश पाते हैं। देह का अभिमान करके इसके सुख से वे सुखी होते हैं और दुःख से दुःखी। इसके नष्ट होने से आपको नष्ट हुआ मानते हैं। जैसे मनोराज्य का नाश होने से पुरुष का और दूसरे चन्द्रमा का नाश होने से चन्द्रमा का नाश नहीं होता, वैसे ही इस देह का नाश होने पर देही पुरुष का नाश नहीं

६६ ❊ योगवाशिष्ठ ❊

होता। जैसे संकल्प-पुरुष का नाश होने से पुरुष का नाश नहीं होता और जैसे स्वप्नभ्रम के नाश से पुरुष का नाश नहीं होता, वैसे ही देह के नाश से आत्मा का नाश नहीं होता। जैसे घनी धूप के कारण रेणुका में जल भासित होता है और भली प्रकार जाकर देखिये, तब जल का अभाव हो जाता है, परन्तु देखनेवाले का अभाव नहीं होता, वैसे ही संकल्प से रचा नश्वर देह के नाश से तुम्हारा नाश तो नहीं होता। हे राम! दीर्घकाल का रचा जो स्वप्नमय देह है, उसके दुःख और नाश से आत्मा को दुःख या उसका नाश नहीं होता। चैतन्य आत्म-सत्ता नष्ट नहीं होती और स्वप्न से चलायमान भी नहीं होती; न विकार को प्राप्त होती है। वह तो सर्वदा शुद्ध और अच्युतरूप अपने आपमें स्थित है और देह के नाश से उसका नाश नहीं होता। अज्ञान के दृढ़ अभ्यास से देह के धर्म अपने में भासित होने लगे हैं। जब आत्मा का दृढ़ अभ्यास हो तो देहाभिमान और देह के धर्मों का अभाव हो जायगा। जैसे कोई चक्र पर चढ़कर घूमता है तो उतरने पर कुछ काल तक घूमता सा लगता है। पर जब चिरकाल व्यतीत होता है, तब स्थिर हो जाता है, इसी प्रकार देहरूपी चक्र पर चढ़ा हुआ जीव अज्ञान से भ्रमा हुआ अपने को भ्रमता देखता है और जब अज्ञान का वेग निवृत्त होता है, तब भी कुछ काल तक देहभ्रम भासित होता है, जिससे जानता है कि मेरा नाश होता है, मुझको दुःख होता है इत्यादिक। यह कल्पना अज्ञान से होती है। पर जब उस भ्रमदृष्टि को धैर्य से निवृत्त करते हैं, तब उसका अभाव हो जाता है।

हे राम! जैसे भ्रम से रस्सी में सर्प भासता है, वैसे ही आत्मा में देह भासती है। वह असत् और जड़ है। न कर्म करती है और न मुक्त होने की इच्छा करती है। देव परमात्मा भी कुछ नहीं करता। वह सदा शुद्ध द्रष्टा और प्रकाशक है। जैसे निर्वाण दीप अपने आपमें स्थिर होता है, वैसे ही तुम भी शुद्ध स्वरूप अपने आपमें स्थित हो। जैसे सूर्य आकाश में स्थित होता है, पर सब जगत् को प्रकाशित करता है और उसके आश्रय से लोग चेष्टा करते हैं, परन्तु सूर्य कुछ नहीं

☸ निर्वाण प्रकरण ☸ ६७

करता, वह केवल सबका साक्षी है, वैसे ही आत्मा के आश्रय से देहा- दिक की चेष्टा होती है। परन्तु आत्मा साक्षीरूप और पापपुण्य से रहित है। हे राम ! इस देहरूपी शून्य गृह में अहंकाररूपी पिशाच कल्पित है। जैसे बालक परछाईं में वैताल की कल्पना करके भय पाता है, वैसे ही अहंकाररूपी पिशाच की कल्पना कर जीव भय पाता है। वह अहंकाररूपी पिशाच महानीच है। सब सन्तजन उसकी निन्दा करते हैं। जब अहंकाररूपी वैताल निकले, तब आनन्द हो। देहरूपी शून्य गृह में इसका निवास है। जो पुरुष इसका दास हो रहा है, उसको यह नरक में ले जाता है। इससे तुम इसके दास न होना। जब इसके नाश का उपाय करोगे, तब आनन्द पाओगे। हे राम ! यह चित्तरूपी उन्मत्त वैताल जिसको स्पर्श करता है, उसको अशुद्ध करता है, अर्थात् उसका धैर्य और निश्चय अस्तव्यस्त करके उसे दुःख देता है और निज स्वरूप से गिरा देता है। जो बड़े बड़े साधु-महन्त हैं, वे भी इसके भय से समाधि में स्थित होते हैं कि किसी प्रकार अहंकार का अभाव हो ।

हे राम ! अहंकाररूपी पिशाच जिसको स्पर्श करता है, उसको आप-सा कर लेता है। यह जैसे आप तुच्छ है, वैसे ही और को भी तुच्छ बनाता है। जहाँ सत्संग, सतशास्त्र का विचार और आत्मज्ञान का निवास नहीं होता, उस शून्य और उजाड़ देहमन्दिर में यह रहता है, और जो कोई ऐसे स्थान में प्रवेश करता है उसमें प्रवेश कर जाता है। हे राम ! जिसको अहंकाररूपी पिशाच लगा है, उसका धन से कल्याण नहीं होता, और न मित्र-बान्धव से कल्याण होता है। अहं- कार-पिशाच से मिला हुआ जो कुछ कर्म वह करता है, वह अपने नाश के निमित्त करता है और विष की बेलि को उपजाता और बढ़ाता है। हे राम ! जो पुरुषविवेक और धैर्य से रहित है उसको अहं- काररूपी पिशाच शीघ्र ही खा जाता है। वह सर्वरूप है और जिसको स्पर्श करता है, उसको मुर्दा करके छोड़ता है। जिसको अहंकाररूपी पिशाच लगा है, वह नरकरूपी अग्नि में काष्ठ की नाईं जलेगा। अहं- काररूपी सर्प देहरूपी वृक्ष के छिद्र में विष से भरा बैठा है। उसके निकट

६८ ❊ योगवाशिष्ठ ❊

जो जायगा, उसको वह मार डालेगा। जो अहं-मम भाव को प्राप्त होगा, वह मृतक-समान होगा और जन्म-मरण पावेगा। अहंकाररूपी पिशाच जिसको लगता है, उसे मलिन करता है और स्वरूप से गिरा-कर संसाररूपी गढ़े में डालता है। बड़ी आपदाएँ उस पर ढाता है। जितनी आपदाएँ हैं, उन्हें अहंकार ढाता है। बहुत वर्षों तक भी उन आपदाओं का वर्णन न हो सकेगा।

हे राम ! यह जो मलिन कल्पनाएँ उठती हैं कि 'मैं हूँ', 'मैं मरता हूँ', 'मैं दग्ध होता हूँ', 'मैं दुःखी हूँ', 'मैं मनुष्य हूँ', उनका मूल अहंकार-रूपी पिशाच की शक्ति है। आत्मस्वरूप नित्य, शुद्ध, चिदाकाश, सर्व-गत, सच्चिदानन्द, जीव सबका अपना है, पर अहंकार के वश होकर यह जीव अपने को परिच्छिन्न और निर्लिप्त होकर भी दुःखी मानता है। जैसे आकाश सर्वगत और निर्लेप है, वैसे ही आत्मा सबमें निर्लेप है और सबका सम्बन्धी, पर अहंकार के सम्बन्ध से रहित है। हे राम ! ग्रहण त्याग, चलना, बैठना इत्यादिक जो कुछ कर्म हैं, उन्हें देहरूपी यन्त्र और वायुरूपी रस्सी से अहंकाररूपी यन्त्री कराता है। आत्मा सदा निर्लेप, सबका अधिष्ठान और कारणकार्य भाव से रहित है। जैसे वृक्ष की ऊँचाई का कारण यह आकाश निर्लेप है, वैसे ही आत्मा सर्वचेष्टा का कारण, अधिष्ठान और निर्लेप है। जैसे आकाश और पृथ्वी का सम्बन्ध नहीं, वैसे ही आत्मा और अहंकार का सम्बन्ध नहीं है। चित्त को जो 'आप' जानते हैं वे महामूर्ख हैं। आत्मा प्रकाशरूप, नित्य और सर्वगत विभु है; चित्त मूर्ख, जड़ और आवरण करता है। हे राम ! आत्म सर्वज्ञ और चैतन्यरूप है; पर चित्त मूढ़ और पत्थर सा जड़ है। इसको दूर करो। इसका और तुम्हारा कुछ सम्बन्ध नहीं। तुम इस मोह को त्यागो। देहरूपी शून्य गृह में चित्तरूपी वैताल का निवास है। जिसको वह अपने वश करता है, जिसको बान्धव नहीं छुड़ा सकते, और शास्त्र भी नहीं छुड़ा सकते। जिसका देहाभिमान क्षीण हो गया है, उसको गुरु और शास्त्र भी छुड़ा सकते हैं, जैसे थोड़ी कीचड़ से हरिण को निकाल लेते हैं वैसे ही गुरु और शास्त्र उसे निकाल लेते हैं।