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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 859, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 859

४८ ✻ योगवाशिष्ठ ✻

अवतार लेते हैं। मुझको एकादश बार रामजी स्मरण आते हैं। वसुदेव के गृह में पृथ्वी का भार उतारने के निमित्त कृष्णजी ने सोलह बार अवतार लिया है, सो भी मुझको स्मरण है। तीन बार नरसिंह अवतार धारण कर विष्णु ने हिरण्यकशिपु को मारा है। हे मुनीश्वर ! इसी प्रकार मुझको अनेक सृष्टि स्मरण हैं, परन्तु सभी भ्रममात्र हैं, कोई उपजी नहीं। जब आत्मतत्त्व में देखता हूँ, तब कोई सृष्टि नहीं भासती, सब सत्तामात्र है। जैसे जल में बुलबुले उपजकर लीन हो जाते हैं, वैसे ही आत्मा में मन के फुरने से अनेक सृष्टि उपजती हैं और लीन हो जाती हैं। उस स्फुरण से मैंने कई सृष्टि देखी हैं। कोई सदृश ही उपजती हैं, कोई अर्धसदृश और कोई विपर्ययरूप हैं। हे मुनीश्वर ! किसी-किसी सृष्टि में एक से ही आकार और कर्म-आचार होते हैं। मन्वन्तर मन्वन्तर प्रति कोई और ही सृष्टि होती है। किसी में ऐसा होता है कि पुत्र पिता हो जाता है, शत्रु मित्र हो जाता है, बान्धव अबान्धव और अबान्धव बान्धव हो जाते हैं। इस प्रकार भी विपर्यय होते देख पड़े हैं। कभी इसी कल्पवृक्ष पर मेरा घर होता है, कभी मन्दराचल में, कभी हिमालय पर्वत में, और कभी मालव पर्वत में होता है। इसी प्रकार कभी वन, वृक्ष और बेलों पर होता है और कभी इस कल्पवृक्ष के ऊपर होता है। पर अब तो बहुत काल से इसी कल्प-वृक्ष पर रहता हूँ।

जब सृष्टि का नाश हो जाता है, तब भी मेरा यही शरीर रहता है। मैं आसन लगाकर अपने पुर्यष्टक को ब्रह्मसत्ता में स्थित करता हूँ, इसी कारण मुझको फिर यही शरीर प्राप्त होता है। हे मुनीश्वर ! यह सब जगत् संकल्पमात्र है। जैसा संकल्प फुरता है, वैसा ही आगे भासित होता है। यह जगत् सत्य भी नहीं और असत्य भी नहीं, केवल भ्रमरूप है। इस भ्रममय जगत्-प्रपंच में अनेक आश्चर्य देखे जाते हैं; पिता पुत्र हो जाता है, मित्र शत्रु हो जाता है, स्त्री पुरुष हो जाती है और पुरुष स्त्री हो जाता है। कभी कलियुग में सतयुग और कभी सतयुग में कलियुग वर्तने लगता है, कभी द्वापर में त्रेता और त्रेता में द्वापर

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