योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 858, कुल 1734 में से
संदर्भ में पढ़ें☸ निर्वाण प्रकरण ☸ २७
इसी प्रकार बहुत कुछ देखा है, क्या क्या तुम्हारे आगे वर्णन करूँ । इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे भुशुण्ड्युपाख्याने जीवित- वृत्तान्तवर्णनं नामाष्टादशस्सर्गः ॥ १८ ॥
भुशुण्डिजी बोले, हे मुनीश्वर ! जब फिर सृष्टि उत्पन्न हुई, तब तुम भरद्वाज, पुलस्त्य, नारद, इन्द्र, मरीचि, उद्दालक, क्रतु, भृगु, अङ्गिरा, सनत्कुमार, भार्गवेश आदि उपजे । फिर सुमेरु, मन्दराचल, कैलास, हिमालय आदि पर्वत उपजे । अत्रि, वासुदेव, बाल्मीकि इत्यादि तो अल्पकाल के उपजे हैं । हे मुनीश्वर ! तुम ब्रह्मा के पुत्र हो और तुम्हारे आठ जन्म मुझको स्मरण हैं । कभी तुम आकाश से उपजे हो, कभी जल से उपजे, कभी पहाड़ से उपजे, कभी पवन से उपजे और कभी अग्नि से उपजे हो । हे मुनीश्वर ! मन्दराचल पर्वत को क्षीरसमुद्र में डालकर जब देवता और दैत्य मथने लगे और उन्हें क्षोभ हुआ कि मन्दराचल नीचे चला जाता है, तब विष्णुजी ने कच्छपरूप धारणकर पर्वत को रोका और सागर से अमृत निकाला था, यह घटना मुझको द्वादश बार स्मरण आती है । तीन बार हिरण्याक्ष पृथ्वी को पाताल में समेट ले गया है और छः बार परशुराम रेणुका माता के पुत्र हुए हैं । यह सृष्टि के बहुत पीछे हुए हैं । जब क्षत्रियों में दैत्य उपजने लगे तो उनके नाश निमित्त विष्णु ने परशुराम का अवतार लिया था ।
हे मुनीश्वर ! एक सृष्टि ऐसी हुई है, जिसमें शास्त्र और पुराणों के अर्थ पहले के विपरीत उलटे लगाये जाने लगे । एक कल्प में शास्त्र के और ही पाठ, और ही युक्ति, और ही अर्थ हुए; क्योंकि युग युग प्रति और ही पुराण होते हैं । किसी को देवता बनाते हैं और किसी को ऋषीश्वर-मुनीश्वर कहते हैं । कथा और इतिहास भी मुझे बहुत स्मरण हैं । बाल्मीकिजी ने द्वादश बार रामायण बनाई और विलय हो गई । व्यासजी ने दो बार महाभारत बनाई और उन्होंने सात बार अवतार लिया है । हे मुनीश्वर ! इस प्रकार आख्यान, कथा, इतिहास और शास्त्र जो जो हुए हैं, वे सब मुझको अच्छी तरह स्मरण हैं । हे साधो ! दैत्यों के मारने के निमित्त विष्णुजी युग युग प्रति