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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 853, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 853

४२ ❊ योगवाशिष्ठ ❊

व्यतीत हुई है । जैसे सूर्य को कई दिन-रात्रि व्यतीत हो जाते हैं, वैसे ही मुझको युग व्यतीत हुए हैं । कुछ काल में मेरे भाई भी रहे थे, पर समय पाकर उन्होंने शरीर त्याग दिये और तृण की नाईं तनु त्यागकर शिव आत्मपद को प्राप्त हुए । हे मुनीश्वर ! बड़ी आयुवाला हो अथवा सिद्ध महन्त हो, बली हो, अथवा ऐश्वर्यवान् हो, काल सबको ग्रस लेता है । तब फिर मैंने पूछा, हे साधो ! जब प्रलयकाल आता है, तब सूर्य, चन्द्रमा, वायु, मेघ, ये सब अपनी-अपनी मर्यादा त्याग देते हैं और बड़ा क्षोभ होता है । पर उस समय तुमको खेद किस कारण नहीं होता ? सूर्य की तपन से अस्ताचल, उदयाचल आदि पर्वत भस्म हो जाते हैं, पर उस क्षोभ में तुम खेदयुक्त क्यों नहीं होते ?

भुशुण्डिजो बोले, हे मुनीश्वर ! कई जीव जगत् में आधार से रहते हैं और कई निराधार रहते हैं । जिनके सेना आदि ऐश्वर्य के पदार्थ होते हैं, वे आधारसहित हैं और जो इन पदार्थों से रहित हैं, वे निराधार हैं । पर दोनों को हम तुच्छ देखते हैं, सत् कोई नहीं । बड़े-बड़े ऐश्वर्यवान् और बली भी हैं, परन्तु सत्य कोई नहीं । उनमें पक्षी की जाति महातुच्छ है । उनका उजाड़ वन में निवास है और वहीं उनका दाना-पानी है । ये निरालम्ब या बेसहारे हैं और उनकी जीविका दैव ने ऐसे ही बनाई है । हे भगवन् ! मैं तो सदा सुखी हूँ और अपने आप में स्थित, आत्मसन्तोष से तृप्त हूँ । कदापि इस जगत् के क्षोभ से खेद को नहीं प्राप्त होता और स्वभावमात्र में सन्तुष्ट और कष्टचेष्टा से मुक्त हूँ । हे ब्राह्मण ! अब मैं केवल काल को व्यतीत करता हूँ और जगत् के इष्ट-अनिष्ट मुझको विचलित नहीं कर सकते । न मरने की मुझको इच्छा है और न जीने की; क्योंकि जीना और मरना शरीर की अवस्था है, आत्मा की नहीं । मुझे जीने का राग नहीं और मरने में द्वेष नहीं-जैसी अवस्था प्राप्त हो, उसी में सन्तुष्ट हूँ । हे मुनीश्वर ! ऐसे-ऐसे देखे हैं कि वे फिर भस्म हो गये हैं; उनकी अवस्था देखकर मेरे मन की चपलता जाती रही है । मैं इस कल्पवृक्ष पर बैठा हूँ, जिसमें रत्नों की वेलि लगी हैं । इस पर बैठकर मैं प्राण-अपान की गति को