योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 852, कुल 1734 में से
संदर्भ में पढ़ें☸ निर्वाण प्रकरण ☸ ४१
पहले रह आया हूँ। जब देवीजी समाधि में स्थित हुई थीं, तब मैं वहाँ आलय बनाकर रहा था। चिन्तामणि की उसमें शलाका लगी हैं और वह महारत्नों से बना है। वहाँ जाकर तुम निवास करो। वहाँ और कौओं के बच्चे भी रहते हैं, जिनका हृदय आत्मज्ञान से शान्त है और बाहर से भी वे शान्त हैं। तुमको वहाँ भोग भी हैं और मोक्ष भी है। हे वशिष्ठजी! जब इस प्रकार पिता ने हमसे कहा, तब हम सबने पिता के चरण छुए और पिता ने हमारा मस्तक चूमा। निदान हम विन्ध्याचल पर्वत से उड़े और आकाशमार्ग से मेघ, नक्षत्र-चक्र और लोकान्तर होकर ब्रह्मलोक में पहुँच देवीजी को प्रणाम किया। उन्होंने भली प्रकार हमारे ऊपर कृपादृष्टि की। दया और स्नेहसहित गले लगाया और मस्तक चूमा। हम भी माथा टेककर सुमेरु को चले और सूर्य और चन्द्रमा के लोक और तारागण, लोकपाल और देवताओं के लोक मेघ और पवन के स्थान लाँघकर सुमेरुपर्वत के कल्पवृक्ष पर पहुँचे। हे मुनीश्वर! जिस प्रकार हम उपजे और जिससे ज्ञान प्राप्त हुए हैं और जिस प्रकार यहाँ आकर रहे हैं, वह सब समाचार हमने तुम्हारे आगे सम्पूर्ण कहा।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे भुशुण्ड्युपाख्याने अस्ताचललाभो नाम षोडशस्सर्गः ॥ १६ ॥
भुशुण्डिजी बोले, हे मुनीश्वर! यह चिरकाल की वार्ता तुमसे कही है। वह सृष्टि इस सृष्टि से बहुत पहले की है, परन्तु मैंने तुमको वर्तमान की नाईं अभ्यास के बल मे सुनाया है। हे मुनीश्वर! मेरा कोई पुण्य था, जो फला है, जिससे तुम्हारा निर्विघ्न दर्शन हुआ और यह आलय, शाखा और वृक्ष आज पवित्र हुए। अब जो कुछ संशय हो तो पूछो, मैं कहूँ। वशिष्ठजी बोले, हे राम! इस प्रकार कहकर उसने मेरा भली प्रकार अर्ध्यपाद्य से आदर सहित पूजन किया। तब मैंने उससे कहा, हे पक्षियों के ईश्वर! तुम्हारे वे भाई कहाँ हैं, जो तुम्हारे समान तत्त्ववेत्ता थे? वे तो देख नहीं पड़ते, अकेले तुम्हीं दीखते हो।
भुशुण्डिजी बोले, हे मुनीश्वर! यहाँ मुझको बहुत युगों की परम्परा