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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 854, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 854

❇ निर्वाण प्रकरण ❇

४३

देखता हूँ। इनकी कला की जो सूक्ष्म गति है, उसका मैं ज्ञाता हूँ, और दिन-रात्रि का मुझको कुछ ज्ञान नहीं। सत्बुद्धि से मैं काल को जानता हूँ और सार-असार को भी भली प्रकार जानता हूँ। हे मुनीश्वर ! जो कुछ विस्तार भासित होता है, वह सब झूठ है, सत् कुछ नहीं। इसी कारण मुझे किसी दृश्य पदार्थ की इच्छा नहीं। मैं परम उपशमपद में स्थित हूँ और सब जगत् भी मेरे लिए शान्तरूप है। जो कोई इस जगज्जाल का आश्रय करता है, वह सुखी नहीं होता यह सब जगत् चञ्चल है और स्थिर कदापि नहीं होता। इसकी अवस्था में मैं पत्थर सा अचल हूँ; न किसी का मुझे राग फुरता है और न द्वेष है। न मैं किसी की इच्छा करता हूँ। सब जगत् मुझको तुच्छ भासित होता है। यह सब भूतरूपी नदियाँ कालरूपी समुद्र में जा पड़ती हैं। पर हम किनारे खड़े हैं, इससे कदापि नहीं डूबते, और जितने जीव हैं वे डूब जाते हैं। पर कई एक तुम जैसे उससे निकले हुए हैं। तुम्हारी कृपा से हम भी निर्विकारपद को प्राप्त हुए हैं।

हे मुनीश्वर ! मैं निर्विकार और सब जगत् के क्षोभ से रहित हूँ और आत्मपद को पाकर उपशमरूप हूँ। हे मुनीश्वर ! तुम्हारे दर्शन से मैं अब पूर्ण आनन्द को प्राप्त हुआ। सन्त की संगति चन्द्रमा की चाँदनी सी शीतल और अमृत की नाईं आनन्द को देनेवाली है। ऐसा कौन है, जो सन्त के संग से आनन्द को न प्राप्त हो ? अर्थात् सब आनन्द को प्राप्त होते हैं। हे मुनीश्वर ! सन्त का संग चन्द्रमा के अमृत से भी अधिक है; क्योंकि वह शीतल गौण है, हृदय की तपन नहीं मिटाता और सन्त का संग अन्तःकरण की तपन मिटाता है। वह अमृत क्षीरसमुद्र मंथन के क्षोभ से निकला है और सन्त का संग सहज में सुख से प्राप्त होता है और आत्मानन्द को प्राप्त कराता है-इससे यह परम उत्तम है। मैं तो इससे उत्तम और कोई वस्तु नहीं मानता। सन्त का संग सबसे उत्तम है। सन्त भी वे ही हैं, जिनकी आरंभ में रमणीय सब इच्छाएँ निवृत्त हुई हैं, अर्थात् अविचार से जो दृश्य पदार्थ सुन्दर जान पड़ते हैं और नाशवान् हैं, वे उनको तुच्छ